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ISSN 2292-9754

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03.09.2017


वहाँ पानी नहीं है : सदी के सत्य को सामने लाने वाली कविताएँ
मनोज कुमार झा

पुस्तक – वहाँ पानी नहीं है (कविता संग्रह)
लेखक - दिविक रमेश
प्रकाशक – बोधि प्रकाशन, जयपुर
प्रथम संस्करण – 2016
मूल्य – 125 रुपए

"वहाँ पानी नहीं है" दिविक रमेश का नवीनतम कविता-संग्रह है। इसके पूर्व इनके नौ कविता-संग्रह आ चुके हैं। "गेहूँ घर आया है" इनकी चुनी हुई कविताओं का प्रतिनिधि संग्रह है। गत वर्ष "माँ गाँव में है" संग्रह आया और बहुचर्चित हुआ। "फेदर" नाम से अँग्रेज़ी में अनूदित इनकी कविताओं का संकलन भी आ चुका है। "खण्ड-खण्ड अग्नि" काव्य-नाटक है। इसके अलावा "अष्टावक्र" नाम से मराठी में अनूदित कविताएँ आई हैं। कोरियाई भाषा में भी इनकी अनूदित कविताओं का संकलन आ चुका है। दिविक रमेश ने बाल साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किया है। बाल कविताओं के इनके कई संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। साथ ही, आलोचना के क्षेत्र में भी काम किया है।

20वीं शताब्दी के आठवें दशक में अपने पहले ही कविता संग्रह "रास्ते के बीच" से चर्चित हो जाने वाले आज के दिविक रमेश बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। 38 वर्ष की ही आयु में "रास्ते के बीच" और "खुली आँखों में आकाश" जैसी अपनी काव्य कृतियों पर "सोवियत लैंड नेहरू अवॉर्ड" पाने वाले ये पहले कवि हैं। दिविक रमेश का जीवन निरंतर संघर्षमय रहा। 11वीं कक्षा के बाद से ही आजीविका के लिए काम करते हुए शिक्षा पूरी की। 17-18 वर्षों तक दूरदर्शन के विविध कार्यक्रमों का संचालन किया। 1994 से 1997 में भारत सरकार की ओर से दक्षिण कोरिया में विज़िटिंग प्रोफेसर के रूप में भेजे गए, जहाँ इन्होंने साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किया।

प्रसिद्ध आलोचक नामवर सिंह ने दिविक रमेश को वृहत्तर सरोकार का कवि बताते हुए लिखा है कि लेखन के क्षेत्र में वे अभी भी एक युवा की तरह ही सक्रिय हैं। नामवर सिंह ने इन्हें सजग और ख़बरदार करने वाले कवियों में से एक बताया है। इनकी कविताओं के बारे में शमशेर बहादुर सिंह ने लिखा है कि ये उस गहरी वास्तविक चिंता को व्यक्त करती हैं, जिसका संबंध मानव-मात्र के जीने-मरने से है। उनमें संस्कृति और राजनीति के ठोस आधारों को स्पष्ट करने की माँग होती है, क्योंकि "आदर्शों" और आश्वासनों के आडंबर और ललित प्रचार से युवा पीढ़ी बहुत ऊब चुकी है। केदारनाथ सिंह ने लिखा है कि दिविक रमेश शायद अकेले ऐसे कवि हैं जिनकी भाषा में हरियाणवी प्रयोगों का एक अलग रंग दिखाई पड़ता है। जन-बोली के प्रयोगों को अपनी जड़ों से उठा कर कविता में ले आना इधर की हिंदी कविता का एक सुपरिचित चरित्र लक्षण माना जा सकता है। पर इसके ख़तरे भी हैं और एक अच्छी बात यह है कि दिविक रमेश उन ख़तरों के प्रति पूरी तरह सावधान हैं।

दिविक रमेश अस्सी के दशक में आए कवियों में महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं। त्रिलोचन ने हमेशा इन्हें जन-जीवन से जुड़ा लोकवादी कवि माना, पर थोथी प्रगतिशीलता के दंभ में घिरी हिन्दी आलोचना में उन कवियों का ज़िक्र होता रहा जो संगठनों से जुड़े रहे और फ़ॉर्मूलाबद्ध टकसाली कविता लिखते रहे। ऐसे कवि निम्न मध्यवर्गीय भाव-बोध की कविताएँ लिखते रहे, प्रगतिशील, जनवादी और जनसंस्कृति मंच के प्रकाशनों में लगातार छपते भी रहे, पुरस्कृत भी होते रहे, पर उनकी कविताओं में निराला, नागार्जुन, केदार, त्रिलोचन की जन से सहज जुड़ाव की प्रवृत्ति कहीं नहीं दिखाई पड़ती। वहीं, दिविक रमेश की कविताएँ कभी भी फ़ॉर्मूलाबद्ध नहीं रहीं, न ही उनकी कविताएँ निम्न मध्यवर्गीय जीवन की सीमाओं में बँधी रहीं, फिर भी जैसी चर्चा अरुण कमल, राजेश जोशी और उदय प्रकाश की तिकड़ी की होती रही, इनकी नहीं हुई। इसके पीछे वजह है कि दिविक रमेश सहज भाव से काव्य-रचना में लगे रहे, लेखक संघों की राजनीति और तिकड़मों से हमेशा ही दूर रहे। कभी इन्होंने पिटे-पिटाए ढर्रे पर रचना नहीं की, हमेशा काव्य में नये प्रयोग किए और हिन्दी की उस प्रगतिशील जातीय चेतना को आगे बढ़ाया, जिस चेतना के वाहक निराला, नागार्जुन, त्रिलोचन, केदार, मुक्तिबोध और शमशेर रहे हैं। यह उल्लेखनीय है कि दिविक रमेश के पहले कविता संग्रह के लिए कविताओं का चयन शमशेर बहादुर सिंह ने ही किया था और भूमिका भी लिखी थी। तब से आज तक लगातार रमेश दिविक रचनारत हैं। दूसरी तरफ़, आलोचकों ने जिन्हें हिन्दी कविता का सिरमौर बताया था, उनमें से कुछ तो अपनी पुरानी रचानओं को ही दोहरा कर साहित्य में स्थापित हैं, कुछ प्रगतिशीलता से अध्यात्म की दुनिया में चले गए तो कुछ जादुई यथार्थवाद के रहस्यलोक में प्रवेश कर गए। लेकिन दिविक रमेश की काव्य-यात्रा से परिचित कोई भी पाठक यह अवश्य स्वीकार करेगा कि इनकी कविताओं में कहीं भी यथार्थ से विचलन नहीं मिलता है। दूसरी तरफ़ इनकी कविताओं में कहीं भी सपाटबयानी, गद्यात्मकता और जुमलेबाज़ी नहीं मिलती जो इनके दौर के कुछ कवियों में बहुतायत में मिलती है। दिविक रमेश ने अपनी कविता में कला को साधा है और उनका जो शिल्प है, वह सहज रूप में विकसित हुआ है, वो सायास निर्मित नहीं है, कविता की जो अंतर्वस्तु है, वही शिल्प की रचना कर देती है। इस अर्थ में कह सकते हैं कि दिविक रमेश की कविताएँ गढ़ाऊ नहीं हैं। जबकि उनकी पीढ़ी के कई कवि कविता की सायास रचना करते रहे, उसे गढ़ते रहे, धूमिल आदि कवियों से जुमले चुराते रहे या उन जुमलों की तर्ज़ पर नये जुमले गढ़ते रहे। कुछ राजनीतिक नारेबाज़ी, बैनरबाज़ी, पोस्टरबाज़ी कर कविता को क्रांतिकारी बनाने में लगे रहे। यह एक ख़ास बात है कि दिविक रमेश की कविताओं में हमें कहीं नारेबाज़ी, राजनीतिक जुमलेबाज़ी नहीं मिलती और न ही यथार्थ का सरलीकृत रूप मिलता है। इनकी कविताओं में यथार्थ संश्लिष्ट और संगुफित रूप में आता है। उनमें अर्थबोध की व्यापकता भी दिखाई पड़ती है, पर फ़ॉर्मूलाबद्ध कविताएँ लिखने वाले सरलीकरण करते हैं या जुमलों से पाठकों को चमत्कृत करने की कोशिश करते हैं।

दिविक रमेश की कविताओं में जन-जीवन और लोक से जो गहरा जुड़ाव दिखाई पड़ता है, वह इनकी पीढ़ी के उन कवियों में जो प्रगतिशील आलोचना में स्थापित किए गए, कहीं नहीं मिलता, न ही उनमें जिन्होंने अरुण कमल, राजेश जोशी, उदय प्रकाश आदि को अपना आदर्श मान कर कविताएँ लिखनी शुरू की और उनका आशीर्वाद प्राप्त कर साहित्य की दुनिया में स्थापित हो गए। उनके नाम गिनाने की ज़रूरत नहीं है। हिन्दी कविता के सुधी पाठक भली-भाँति उन्हें जानते और पहचानते हैं। दिविक रमेश की कविताओं में जो गाँव है, लोक जीवन की विभिन्न छवियाँ हैं, सामान्य लोगों का जो दैनंदिन संघर्ष है, प्रकृति के पल-पल बदलते रूप-रंग हैं, हुलास के साथ करुणा का जो स्थाई भाव है, वह उनके अपने जीवन के वास्तिवक अनुभवों-अनुभूतियों से उत्पन्न है। यह ड्रॉइंग रूम में बैठ कर कल्पना की उड़ान भर कर हासिल नहीं किया गया है। हिन्दी के बहुतेरे कथित प्रगतिशील और जनवादी कवि ड्रॉइंग रूमों में बैठ कर ही कल्पना की उड़ान भरते रहे और चमत्कृत करने वाला काव्य शिल्प गढ़ते रहे, जो नकली होने के कारण कभी पाठकों को प्रभावित नहीं कर पाया, पर विश्वविद्यालयों में बैठे लोगों ने अपनी आलोचना में उन्हें श्रेष्ठ कवि घोषित किया। ज़ाहिर है, ऐसी घोषणाओं से कोई श्रेष्ठ कवि नहीं होता। कविता जो पाठक के दिलो-दिमाग़ में बस जाए, उसकी स्मृति का अंग बन जाए, उसे एक नये यथार्थ से परिचित कराए और सौन्दर्य के बोध से उसे भर दे, वह कविता स्थाई मूल्यों वाली होती है। आलोचना में उपेक्षा के बावजूद साहित्य के इतिहास में ऐसी कविताएँ हमेशा जीवंत रहती हैं और समय के साथ उनका संधान भी होता है। दिविक रमेश की कविताएँ ऐसी ही कविताएँ हैं जो समय के विस्तृत फ़लक पर हमेशा जीवंत रहेंगी।

दिविक रमेश की शुरुआती कविताओं के साथ बाद की कविताओं में और फिलहाल जो कविताएँ आ रही हैं, उनमें भी लोक-जीवन के विविध रूपों, उसके संघर्षों और विडम्बनाओं की अभिव्यक्ति हुई है। साथ ही, ये कविताएँ टाइप्ड नहीं हैं, यानी उनमें विविधता है। दिविक रमेश की काव्य भाषा विशेष रूप से दृष्टव्य है। जैसा कि पहले कहा गया है कि इनकी काव्य भाषा में सहजता और संप्रेषणीयता है। इसे प्रगतिशील कविता का अनिवार्य गुण कहा गया है, लेकिन इनके साथ जो कवि आए, उनकी काव्य भाषा में सहजता-संप्रेषणीयता शायद ही मिलती है। ज़्यादातर चमत्कारपूर्ण उक्तियों से पाठकों को प्रभावित करने की कोशिश दिखाई पड़ती है। साथ ही रागात्मकता जो काव्य का अंतर्निहित गुण है, वह भी इनकी कविताओं में मौजूद है, जबकि इनकी ही पीढ़ी के अन्य कवियों में रागात्मकता की जगह विशुद्ध गद्य मिलता है। दिविक रमेश की कविताओं में एक आंतरिक लयात्मकता मिलती है, जो लोक से उनके स्वाभाविक लगाव के कारण आ सकी है, पर जो कवि लोकजीवन से दूर रह कर प्रगतिशील काव्य की रचना करते रहे, उनकी कविताओं को आलोचक ही समझ पाते हैं, पाठक नहीं। बहुत से कवियों ने प्रगतिशीलता के नाम पर पहेलियाँ बुझाने का प्रयास किया है। काव्य-भाषा के बारे में दिविक रमेश का कहना है, "कविता की भाषा कुछ तो कवि के पास सहज रूप में उपलब्ध होती है, कुछ अभ्यास से कवि अपनी भाषा के रूप में सुधार भी लाता है। कविता की भाषा जब-जब मुझे जड़ाऊ लगी है, मैं उससे बिदका हूँ। हर कवि के पास अपनी कविता की भाषा-शैली का ठाठ होता है, लेकिन वह उजागर नहीं प्रतीत होना चाहिए। हमारी पीढ़ी और आगे की पीढ़ी की कविता में भाषा की दृष्टि से भी स्थानिकता मिलती है। मेरे लिए यह स्थानिकता तभी ग्राह्य है, जब वह कविता में खपी हुई नज़र आए, आयातित अथवा सप्रयास ना लगे। मुझे जातीय तौर पर खपे हुए अन्य भाषाओं के शब्दों पर भी कोई आपत्ति नहीं है। भाषा में लोक और जन (बिम्ब, प्रतीक, मुहावरे आदि से युक्त) भाषा से बहुत ताक़त ली जा सकती है। दलित, आदिवासी और स्त्री विमर्श के तहत रची गई कविताओं से इस बात को समझा जा सकता है। त्रिलोचन से भी सीख सकते हैं। हाँ, यह ध्यान रखना होगा कि लोक या जन भाषा हूबहू कविता की भाषा नहीं होती, उसमें कवि की कुछ न कुछ सर्जना भी होती है।" (साक्षात्कार, वीणा भाटिया, लहक, संयुक्तांक, 2016) इस उद्धरण से समझा जा सकता है कि काव्य-भाषा और काव्य-शिल्प को लेकर दिविक रमेश का एक सुचिंतित दृष्टिकोण है। संभवत: यही कारण है कि इनकी कविताएँ अपने समकालीनों से एक भिन्न भाव-भूमि पर रची गई हैं। जहाँ तक चर्चा का सवाल है, अंतर्वस्तु और शिल्पविधान में पूरी तरह मौलिक होने के कारण लीक पीटने वाले और चर्चाओं को प्रायोजित करने वाले मठाधीशों-आलोचकों ने इनके काव्य की उपेक्षा की है। आलोचना की इस संकीर्ण प्रवृत्ति पर दिविक रमेश कहते हैं, "मैंने व्यक्तिगत रूप से भी अनुभव किया है कि हिन्दी में विशुद्ध क़िस्म के अनेक ऐसे आलोचक हुए हैं, जिन्होंने कविता के परिदृश्य को भरपूर ढंग से प्रदूषित किया है। यह अलग बात है कि उनके पास अनेक कारणों से (जिनमें साहित्येतर भी सम्मिलित हैं) साहित्य में पाठ्यक्रमों में रचनाएँ लगवाने, प्रतिष्ठित पुरस्कारों को दिलवाने, पुस्तकों को बिकवाने, पत्र-पत्रिकाओं में सुर्खियों में लाने आदि के रूप में प्रभावशाली हस्तक्षेप करने की ताक़त रही है। इस कारण अनेक अच्छे, लेकिन उनकी गुटवादिता के संविधान को न मानने वाले कवियों को हलाल करने की भी भरपूर कोशिशें हुई हैं। विडम्बना यह भी है कि जिन कवियों की पताकाएँ ऐसे आलोचकों द्वारा (बहुत बार योग्यता से ऊपर) फहरायी गई हैं, उनमें से बहुतेरे स्वभाव से उनके जैसा ही व्यवहार करते पाए जाते हैं। ऐसी स्थिति में कुछ कवियों को आलोचना के क्षेत्र में भी उतरना पड़ा हो तो वह ग़ैरज़रूरी होते हुए भी स्वाभाविक कहा जाना चाहिए। यहाँ मैं उन तथाकथित कवियों या उनके दलों को बचाना नहीं चाहता जो हथकंडे के रूप में आलोचना कर्म को अपने प्रचार के लिए काम में लाने का काम करते हैं। वे बहुत दिन चलते नहीं। अधिक दुखदायी तो हिप्पोक्रेसी है। कोई आपको अपना प्रिय कवि कहेगा, कोई दो आदमियों के बीच कभी-कभार आपकी कविताओं की प्रशंसा भी कर देगा, लेकिन जहाँ-जहाँ (साहित्यिक चर्चाओं, पुरस्कारों, पाठ्य पुस्तकों, संपादित संकलनों, कुछ ख़ास (नामी) बना दी गई पत्र-पत्रिकाओं आदि के क्षेत्र में) आपके कवि नाम को रेखांकित होना चाहिए, वहाँ-वहाँ से ग़ायब कर या करवाता रहेगा और अपने पट्ठों को रेखांकित या प्रमोट करने कराने में जी-जान लगा देगा। रेखांकित हुए ऐसे धन्य कवियों में से अनेक उनके सुर में सुर मिलाकर गौरवान्वित भी होते रहते हैं। यह काम सिंडिकेट की तरह भी किया जाता है।" (साक्षात्कार, वीणा भाटिया, लहक, संयुक्ताक, 2016)

कहना नहीं होगा कि आलोचना की इस कुप्रवृत्ति के शिकार कई बड़े प्रगतिशील जनकवि हो चुके हैं। त्रिलोचन ने लिखा था –

प्रगतिशील कवियों की नई लिस्ट निकली है
देखा त्रिलोचन का कहीं नाम नहीं था।

बहरहाल, उपरोक्त विस्तृत चर्चा का उद्देश्य महज दिविक रमेश की रचनाधर्मिता पर प्रकाश डालने के साथ समकालीन आलोचना की विसंगतियों और संकीर्णता को उजागर करना है। दिविक रमेश स्थापित और समादृत कवि हैं, पर जिस सिंडिकेटी आलोचना की चर्चा पहले की गई है, उसने कई नक़ली कवियों को स्थापित करने की कोशिश प्रतिष्ठान का सहारा लेकर की है और सच्चे जनवादी युवा कवियों की उपेक्षा हो रही है।

दिविक रमेश के सद्य प्रकाशित कविता संग्रह "वहाँ पानी नहीं है" को पढ़ते हुए ऐसा लगता है कि इसमें शामिल कविताएँ कवि की दशकों की काव्य-यात्रा का एक नया ही पड़ाव है, जहाँ हिन्दी कविता अंतर्वस्तु और रूप-विधान, दोनों ही दृष्टि से लोक में समाहित हो गई है। संग्रह में कुल चौंसठ कविताएँ शामिल की गई हैं। हर कविता अपने कथ्य, संवेदना और शिल्प में भिन्न है। इन कविताओं को पढ़ते हुए लगता है कि कवि का लोगों से, पूरे परिवेश और प्रकृति से बहुत ही गहरा और आत्मीय रिश्ता है। कवि अपनी जानी-पहचानी दुनिया में विचरता है और संवाद करता है, वह संवेदना के अति सूक्ष्म स्तर पर अपना सरोकार बनाता है। कवि की दुनिया बहुत ही विस्तृत है और न जाने कितने लोगों से जो मनुष्य हैं और मनुष्य नहीं भी हैं, उसका संलाप चलता है। यह संलाप कई स्तरों पर चलता है, कई बार इतने सूक्ष्म स्तर पर कि उसे पकड़ पाना एकबारगी आसान नहीं होता। इसके लिए कविताओं को बार-बार पढ़ना पड़ता है और तब जाकर उसकी अर्थछवियाँ खुलती हैं, जब एक बार अर्थछवि खुलती है तो पाठक फिर से कविता के आकर्षण में बँधा उसे पढ़ने को मजबूर हो उठता है और नई अर्थछवियों और सन्दर्भों के साथ उसके सामने एक दुनिया सामने आती है। तब उसे लगता है कि यह जो उसकी परिचित दुनिया है, उसे तो उसने इस तरह नहीं देखा था। यही इस संग्रह में शामिल कविताओं की ख़ासियत है, जो पहले की कविताओं से इस रूप में भिन्न हैं कि इसमें काव्य-संवेदना और कला का चरमोत्कर्ष दिखाई देता है। एक ख़ास बात है कि दिविक रमेश की इधर की कविताओं में माँ बार-बार आती है। पिछले साल जो संग्रह आया, उसका शीर्षक ही है "माँ गाँव में है"। माँ के प्रति यह विशेष लगाव और आकर्षण निश्चय ही इस समाज में माँ की बदलती जा रही स्थिति को इंगित करती है, वह माँ कहीं उपेक्षित होती है तो कवि इसे लक्षित करता है और इस विडम्बना को सामने रखता है। इस संग्रह की पहली ही कविता है – माँ के पंख नहीं होते। यह शीर्षक ही अपने आप में बहुत कुछ कह देता है। "माँ के पंख नहीं होते/कुतर देते हैं उन्हें/होते ही पैदा/ खुद उसी के बच्चे। माँ के पंख नहीं होते।" यह उस माँ की कविता है जो पिटती थी और जब-जब पिटती थी माँ...लगभग गाती और रोती थी माँ। माँ को लेकर हिन्दी में न जाने कितनी कविताएँ लिखी गई होंगी, पर यह माँ पर ऐसी कविता है जो यथार्थ है और ऐसी विडम्बना को सामने लाती है जो इस अति आधुनिक समाज का नंगा कड़वा सच है। दूसरी कविता है "आवाज आग भी तो हो सकती है"। किस सांकेतिकता के साथ कहा है कवि ने - "आवाज आग भी तो हो सकती है/भले ही वह/ चूल्हे ही की क्यों न हो, ख़ामोश"। "तू तो है न मेरे पास" कविता में फिर माँ है। "सोचता हूँ क्या था कारण -/ माँ को ही नहीं लेना आया सपना/ या सपने की ही नहीं थी पहुँच माँ तक।" इस विडम्बनात्मक सच को कवि जब कविता में सामने लाता है तो ज़ाहिर है, इसकी रचना-प्रक्रिया बहुत ही दर्द भरी रही होगी। सूक्ष्म संवेदनाओं की बुनावट वाली कई कविताएँ इस संग्रह में हैं, वहीं राजनीतिक पतनशीलता पर बहुत ही सूक्ष्म प्रहार करती और इतिहास के सवालों से टकराती कविताएँ भी इस संग्रह में हैं। कुछ कविताओं में कवि की तीक्ष्ण व्यंग्य-भेदी दृष्टि की भंगिमा प्रहारात्मक है। संग्रह की प्रतिनिधि कविता "वहाँ पानी नहीं है" एक ऐसी कविता है जिसमें आज के समग्र यथार्थ का ही उद्भेदन हुआ है। यह कविता शोषण पर आधारित समाज-व्यवस्था पर ऐसी गहरी चोट करती है और जो सवाल करती है, वह मर्मभेदी है। यद्यपि पानी पर बहुत से कवियों ने कविताएँ लिखी हैं। रघुवीर सहाय की कविता "पानी पानी" तो बहुचर्चित रही है। पर "वहाँ पानी नहीं है" हिन्दी कविता की एक नई उपलब्धि है। निश्चय ही यह युग सत्य को सामने लाने वाली कविता है। इसका पहला और अंतिम अंश उद्धृत करना आवश्यक लग रहा है।

 

"वहाँ पानी नहीं है।"
सुन कर या पढ़ कर
क्यों नहीं उठता सवाल
कि वहाँ पानी क्यों नहीं है।

"वहाँ पानी नहीं है।"
सुन कर या पढ़ कर
अगर कोई हँस रहा है
तो वह है इक्कीसवीं सदी।

इस शुरुआत और अंत के बीच जिस विडम्बना को प्रस्तुत किया गया है, उसका बोध तो पूरी कविता को पढ़ने के बाद ही हो सकता है, पर इससे भी बहुत कुछ साफ़ हो जाता है। यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं कि इस एक कविता में यथार्थ के जितने आयाम खुलते हैं, उसकी व्याख्या करने के लिए आलोचकों में धैर्य की ज़रूरत होगी। निस्संदेह यह कविता हिन्दी की श्रेष्ठ कविताओं में एक है। इसमें जो यथार्थ है, वह संपूर्ण युगीन यथार्थ का संकेतक है। यह कविता दशकों में आई एक विशिष्ट कविता है, जो हमेशा उल्लेखनीय बनी रहेगी। "उनका दर्द-मेरी जुबान" भी गहरी त्रासदी को सामने लाने वाली कविता है। संग्रह में कुछ बहुत ही कोमल संवेदनाओं की भी कविताएँ है – प्रेम कविताएँ, पर उनका फ़लक बहुत ही विस्तृत है और उनकी रचना यथार्थ की ज़मीन पर हुई है। "शब्द भर होता प्यार", "तुम्हारी नाव के लिए", "करना प्रतीक्षा", "सबसे निजी और खूबसूरत", "बस बजता रहूँगा", "अपने पक्षी की तलाश में" बहुत ही सघन संवेदना और अनुभूतियों की कविताएँ हैं। "प्रियवर का फोन" वही प्रगतिशील कवियों की नई लिस्ट निकली है के संदर्भ वाली कविता है। दिविक रमेश का त्रिलोचन से गहरा जुड़ाव रहा, इसलिए यह कविता लिखना लगता है, उन्होंने ज़रूरी समझा। साहित्य की राजनीति पर प्रहार है यह कविता। ऐसे तो संग्रह में शामिल सभी कविताएँ उल्लेखनीय हैं, पर "जिसे चाहता हूँ भाषा में" कविता का ज़िक्र ज़रूरी है। यह गहन अर्थबोध की कविता है और बहुआयामी है।

कुल मिला कर, कहा जा सकता है कि दिविक रमेश के इस संग्रह में जो कविताएँ शामिल हैं, वो कथ्य, रूप-विधान, शिल्प और अर्थबोध की व्यापकता की दृष्टि से हिन्दी साहित्य की उपलब्धि हैं। जैसा कि पहले ही कहा गया है कि दिविक रमेश ने कभी जुमलों में कविता नहीं लिखी। कविता उनके लिए बहुत ही गंभीर और सूक्ष्म कला विधा है, जहाँ शोर-शराबे के लिए की जगह नहीं। दिविक रमेश कविताओं में जिस तरह शब्दों को बरतते हैं, उससे एक सांगीतिक रचना भी होती है। उनकी कविताओं में जो संगीत-तत्व है, उसे इस संग्रह को पढ़ते हुए महसूस किया जा सकता है। उनकी कविताएँ हृदय में संगीत-ध्वनियों की तरह बजने वाली हैं। यह भी एक विचित्र बात रही है कि हिन्दी कविता में क्रान्तिकारिता का मतलब हुंकार, तोड़-फोड़ वाली शब्दावली और नारेबाज़ी से लिया जाता रहा। इस संग्रह को पढ़ कर सुधी पाठक समझ सकेंगे कि क्रान्तिकारिता थोथे शब्दों में नहीं, जीवन-दृष्टि में होती है और कविता में वह सांकेतिक रूप में सामने आती है। सवाल ये है कि कवि की यथार्थ पर पकड़ कितनी है और उसकी अभिव्यक्ति कविता में वह कैसे करता है। दिविक रमेश लोक-जीवन से, गाँव की माटी से, अपनी जड़ों से जुड़े कवि होने के कारण यथार्थ को उसकी समग्रता में पकड़ने और उसकी सूक्ष्म कलात्मक अभिव्यक्ति में पूरी तरह सफल रहे हैं।

 मनोज कुमार झा
email – manojkumarjhamk@gmail.com
Mobile – 9301664223 / 7509664223


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