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| 09.05.2007 |
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डर |
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बस इतना ही मालूम था मुझे
कहाँ है दूसरा सिरा
डर भी था कितना
तभी किसी विचार की तरह
मेरा हिलना डुलना
मैं स्वयं
उसकी उँगलियों से ही
और मैं
कितनी कठोर होती है सच की समझ
झटक दिया था
आश्चर्य! |
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