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| 02.09.2008 |
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बेचारा गप्पी |
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गोपाल
भाँड भी कम नहीं थे। सूझ बूझ और तुरन्त उत्तर देने में उनका जवाब नहीं
था। क्या अच्छा जमाना था राजा-महाराजा बुद्धिमान लोगों को अपने दरबार
में जगह देते थे। आदर के साथ। गोपाल भाँड को भी पश्चिम बंगाल में कृष्ण
नगर के महाराजा कृष्णचन्द्र ने अपनी राजसभा में स्थान दिया था। ३०० साल
के बाद भी गोपाल भाँड बंगाल का बीरबल माना जाता है। किस्से भी तो उसके
कमाल के हैं।
एक
दिन लुहार के यहाँ से कड़ाही खरीदकर ला रहा था। जल्दी से जल्दी घर पहुँच
कर कड़ाही का उपयोग जो करना था। कड़ाही में तल कर खाना मजा ही कुछ और
देता है। मछली तो दोगुनी स्वाद हो जाती है। यूँ भी आज उसने एक मित्र को
घर बुलाया हुआ था। खाने पर। तभी तो चुपचाप तेजी से चला जा रहा था। उधर
से एक गप्पी महाशय चले आ रहे थे। गप्पी महाशय ने देखा कि गोपाल भाँड
छोटी सी कढ़ाई लिए चुपचाप भागा जा रहा है। वह मन ही मन खुश हुआ। उसे एक
शरारत सूझी। सोचा गोपाल भाँड को जरूर आज जल्दी है। आज इसे रोक कर मजा
लिया जाए। अपने को बड़ा चतुर समझता है। आज सारी चतुराई निकाली जाए।
जल्दी में है सो आज उसकी सूझ-बूझ धरी रह जाएगी।
यही
सोचते सोचते गप्पी ने जोर से आवाज लगाई --
’अरे
गोपाल भाँड भाई। यह पुदकी सी कढ़ाई लिए कहाँ दौड़े जा रहे हो।‘
गोपाल
भाँड रुका। गप्पी की ओर देखा और फिर चल पड़ा।
’क्यों
एक पुदकी सी कड़ाही जितनी ओकात पर ही इतना इतराते हो। जाओ जाओ।‘
गोपाल
भाँड समझ गया कि गप्पी आज उसे नीचा दिखाने पर तुल गया है। और यह बात
उसे कहाँ बर्दाश्त थी। सोचा -- घर थोड़ी देर से पहुँच जाऊँगा। पहले इसका
हिसाब चुकता कर दूँ।
गोपाल
भाँड अब गप्पी के सामने था। कहा -
’तुम्हारी
समस्या क्या है गप्पी भाई। इस छोटी कड़ाही से क्या दिक्कत है।‘
’अरे
गोपाल भाँड! ऐसी कड़ाहियाँ तो हमारे नौकर भी नहीं रखते थे।‘
गोपाल
भाँड को बुरा तो बहुत लगा। गप्प मारने का यह तो मतलब नहीं कि किसी का
अपमान किया जाए। वह जानता था कि गप्पी के यहाँ कभी कोई नौकर-वौकर नहीं
रहे। वह तो बस उसे नीचा दिखाना चाहता था। यह सब सोचते हुए गोपाल भाँड
ने अपने को शांत रखा। उसे पता था कि शांत रहकर ही गप्पी जैसे लोगों को
ठीक राह पर लाया जा सकता है। गुस्से और उत्तेजना से तो बात बिगड़ती ही
है। सो मुस्कुरा कर बोला --
’हाँ
तो गप्पी भाई तुम लोग तो बहुत बड़ी कड़ाही रखते थे।‘
गप्पी
ने छाती फुलाते हुए कहा,
’क्यों
नहीं,
क्यों
नहीं। जानते हो मेरे मामा के घर कितनी बड़ी कड़ाही थी।‘
’कितनी
बड़ी?‘,
गोपाल
भाँड ने झूठी जिज्ञासा दिखाते हुए पूछा।
’अरे,
तुम
जैसे लोग तो अनुमान भी नहीं लगा सकते।‘
गप्पी
ने कहा।
’अब
बता भी दो न गप्पी भाई,
कितनी
बड़ी कड़ाही थी। फिर मैं भी आपको कुछ बताऊँगा।‘
-
गोपाल
भाँड ने मजा लेते हुए कहा।
गप्पी
मन ही मन खुश था। उसे यकीन हो गया था कि गोपाल भाँड अब उसकी बातों में
आ गया था। बोला --
’तो
ध्यान से सुनो गोपाल भाँड। मेरे मामा की कड़ाही दो मील गहरी और दायरे
में दो मील चौड़ी थी।‘
’अच्छा!
गोपाल भाँड ने आँखें फाड़ी।‘
’अच्छा
अब तुम बताओ गोपाल भाँड। तुम भी तो कुछ बताने वाले थे।‘
’हाँ-हाँ।
मैं तो यही सच बताना चाहता हूँ कि तुम्हारे मामा के ही समय में मेरे
दादा एक ही बार में एक मील लम्बी और एक मील मोटी मछली साबुत की साबुत
तल कर खाते थे।‘
गोपाल
भाँड ने कहा।
गप्पी
ने मुँह बिचकाकर कहा,
’हाँकना
ही है तो जरा सोच समझ कर हाँको गोपाल भाँड। कोई सुनेगा तो तुम पर
हँसेगा ही। और अपने दादा की भी हँसी क्यों उड़वाना चाहते हो।‘
’क्यों
इसमें हँसी उड़वाने वाली क्ा बात है गप्पी भाई।‘
गोपाल
भाँड ने परेशान होने का नाटक करते हुए कहा।
’अरे
भाई,
पहले
तो इतनी लम्बी-मोटी मछली मिलती कहाँ है। चलो मान लिया कि तुम्हारे दादा
को मिल गई होगी,
पर
जरा यह तो बताओ अक्ल के दुश्मन कि इतनी बड़ी मछली को तुम्हारे दादा तलते
किस कड़ाही में थे।‘
मुँह
पर जीत का भाव लाते हुए गप्पी ने कहा।
’अरे
गप्पी भाई,
तुम
भी कमाल करते हो। इसमें इतना परेशान होने की क्या बात है। जब मैंने कहा
कि मेरे दादा तलते थे,
तो बस
तलते थे।‘
’यह
क्या गोपाल भाँड। अगर तलते थे तो बताओ न किस कड़ाही में तलते थे। बोलती
बंद क्यों हो गई तुम्हारी।‘
’गप्पी
भाई मैं तो तुम्हें समझदार समझता था। क्या तुम्हें सच में नहीं मालूम
कि मेरे दादा किस कड़ाही में तलते थे।‘
नहीं
तो।
’अरे
तुम्हारे मामा की कड़ाही में। और किसमें। तुम्हारे मामा मेरे दादा के
मित्र जो थे।‘
आश्चर्य है कि तुम्हारे मामा ने यह बात तुम्हें नहीं बतायी।
सुनकर
गप्पी ठगा सा रह गया। अब बोलता भी तो क्या।
गोपाल
हँसता-मटकता चल पड़ा अपने घर की ओर। अपनी छोटी कड़ाही को निहारता। |
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