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ISSN 2292-9754

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11.30.2014


बलात्कृता

मूल ओड़िया कहानी सरोजिनी साहू
हिंदी अनुवाद दिनेश कुमार माली

यह कहानीकार की सद्यतम प्रकाशित कहानियों में से है, जो न तो किसी दूसरी भाषा में अनूदित हुई है, न किसी कहानी संग्रह में संकलित हुई है। यह कहानी 'टाईम्स ऑफ़ इंडिया ग्रुप' की ओडिया पत्रिका 'आमो समय' के जून, २००९ अंक में प्रकाशित हुई है। कहानी का मूल शीर्षक 'धर्षिता' था, पर 'धर्षिता' शब्द हिंदी में न होने के कारण मैंने उस कहानी का शीर्षक 'बलात्कृता' रखना उचित समझा। कहानीकार की सद्यतम कहानी का प्रथम हिंदी अनुवाद पेश करते हुए मुझे अत्यंत हर्ष हो रहा है।

बलात्कृता

क्या सभी आकस्मिक घटनाएँ पूर्व निर्धारित होती है? अगर कोई आकस्मिक घटना घटती है तो अचानक अपने आप यूँ ही घट जाती है; जिसका कार्यकरण से कोई सम्बन्ध है?

बहुत ही ज़्यादा आस्तिक नहीं थी सुसी, न बहुत ज़्यादा नास्तिक थी वह। कभी-कभी तो ऐसा लगता था कि ये सब बातें मन को सांत्वना देने के लिए केवल कुछ मनगढ़ंत दार्शनिक मुहावरों जैसी हैं।

सुबह से बहुत लोगों का ताँता लगने लगा था घर में। एक के बाद एक लोग पहुँच रहे थे या तो कौतुहल-वश देखने के लिए या फिर अपनी सहानुभूति प्रकट करने के लिए। घर पूरी तरह से अस्त-व्यस्त था। जीवन तो और भी अस्त-व्यस्त था! दस दिन हो गए थे, इधर-उधर घूमने-फिरने में, आज ही ये लोग अपने घर लौटे थे। रास्ते भर यही सोच-सोचकर आ रहे थे, घर पहुँचकर शांति से गहरी नींद में सो जायेंगे। रात के तीन बजे उनकी ट्रेन अपने स्टेशन पर आनेवाली थी। इसलिए मोबाईल फ़ोन में 'अलार्म' सेट करने के बाद भी, आँखों में नींद का नामोनिशान नहीं था। पलकें एक मिनट के लिए भी नहीं झपकी थी। थोड़ी-थोड़ी देर बाद नींद टूट जाती थी। ट्रेन से उतरकर घर लौटकर देखा था, कि घर अब और कोई आश्रय-स्थल नहीं रहा था।

सुबह से ही घर में लोग जुटने लगे थे। कभी-कभी तीन-चार मिलकर आ रहे थे तो कभी-कभी कोई अकेला ही। सभी को शुरू से उस बात का वर्णन करना पड़ता था, कि यह घटना कैसे घटी होगी। यहाँ तक कि डेमोंस्ट्रेशन करके भी दिखाना पड़ता था। सब कुछ देखने व सुन लेने के बाद, वे लोग यही कहते थे कि आप लोगों को इतना बड़ा ख़तरा नहीं उठाना चाहिए था। अगर कोई एक आदमी भी घर में रुक जाता तो, शायद आज यह घटना नहीं घटती। ऐसा प्रतीत होता था जैसे कि अपराधी को हर हालत में अपराध करने का पूरा-पूरा हक़ है। और सुसी के परिवार वालों की भूल है कि उन्होंने कोई सावधानी नहीं बरती।

इन्हीं 'सावधानी' व 'सतर्कता' की बातें सुनने से सुसी को लगता था, कि बारिश के लिए छतरी, साँप के लिए लाठी, अँधेरे के लिए टॉर्च का प्रयोग कर जैसे उसकी सारी ज़िंदगी बीत जायेगी! ऐसा कभी होता है क्या? चारों-दिशायें, चारों-कोने, ऊपर-नीचे देख-देखकर साबुत ज़िन्दगी जीना संभव है?
"आप इंश्योरेंस करवाए थे क्या?"
"इंश्योरेंस, नहीं, नहीं।"
"करवाना चाहिए था ना!"

सुसी और क्या जबाव देती? इस संसार में सब कुछ क्षणभंगुर और अस्थायी है। जो आज है, कल वह नहीं रहेगा। किस-किस चीज़ का इंश्योरेंस करवाएगी वह? और किस-किस का नहीं ! घर, गाड़ी, जीवन, आँखें, कान, नाक, हृदय, यकृत और वृक्क? इंश्योरेंस कर देने के बाद, 'पाने और खोने' का खेल बंद हो जायेगा? किसी भी रास्ते से तब भी आ पहुँचेगी दुःख और यंत्रणा, तक्षक साँप की तरह!
"कितना गया?"
"क्या-क्या गया? "धीरे-धीरे, कुछ -कुछ याद कर पा रही थी सुसी। एक के बाद एक चीज़ें याद आ रही थीं उसको। क्या बोल पाती वह? आते समय, जिस हालत में उसने अपने घर को देखा था बस उसी बात को दुहरा रही थी सभी के सामने।

उस दिन जब उन्होंने अपने घर की खिड़की के टूटे हुए शीशे के छेद में झाँककर देखा, तो दिखाई पड़ी थी अन्धेरे आँगन में चाँदनी की तरह फैली हुई रोशनी। आश्चर्य से सुसी ने पूछा था, "अरे! बेबी के कमरे की लाइट कैसे जल रही है?" जब कभी वे लोग बाहर जाते थे, तो घर की लाइट बंद करना और ताला लगाने का काम अजितेश का होता था। इसलिए यह प्रश्न अजितेश के लिए था। "आप क्या बेबी के कमरे की लाइट बुझाना भूल गए थे?" गाड़ी से सूटकेस व अन्य सामान उतार रहा था अजितेश। कहने लगा था, "मैंने तो स्विच ऑफ किया था।" बेबी बोली थी -"पापा, आप भूल गए होगे। याद कीजिये जाते समय लोड-शेडिंग हुआ था ना?"

ग्रिल का ताला खोल दी थी सुसी। इसके बाद वह मुख्य-द्वार का ताल खोलने लगी थी। ताला खोलकर, धक्का देने लगी थी। पर जितना भी धक्का दे पर दरवाज़ा नहीं खुल रहा था। "अरे! देखो," चिल्लाकर बोली थी सुसी, "पता नहीं क्यों, दरवाज़ा नहीं खुल रहा है। लगता है किसीने भीतर से बंद किया है? कौन है अंदर?" सुसी का दिल धड़कने लगा था। वह काँपने लगी थी। "दरवाज़ा क्यों नहीं खुल रहा है?" भागकर आया था अजितेश, पीछे-पीछे वह ड्राईवर भी। सुसी ग्रिल के दरवाज़े के पास आकर, टूटे शीशे से बने छेद में से झाँककर देखने लगी वह दृश्य। बड़ा ही हृदय विदारक था वह दृश्य! उसकी अलमीरा चित्त सोयी पड़ी थी। दोनों तरफ बाजू फैलाते हुए। खुले पड़े थे अलमीरा के दोनों पट। सुसी की छाती धक्-धक् काँपने लगी थी ज़ोर ज़ोर से रुआँसी होकर बोली थी,- "हे, देखो!""ऐसा क्यों कर रही हो?" बौखलाकर अजितेश बोला था। इसके बाद उसने बड़े ही धैर्य के साथ पड़ोसियों को जगाया था। ड्राईवर और पड़ोसियों को साथ लेकर पीछे वाले दरवाज़े की तरफ गया था अजितेश। पीछे का दरवाज़ा खुला था। पर किसीने बड़ी सावधानी के साथ, उस दरवाज़े को चौखट से सटा दिया था। दूर से ऐसा लग रहा था जैसे दरवाज़ा वास्तव में बंद है।

 ड्राईवर कहने लगा- "चलिए,सर! पुलिस स्टेशन चलेंगे।" पड़ोसी सहानुभूति जता रहे थे। कह रहे थे,- "दो-चार दिन पहले, आधी रात को, धड़-धड़ की आवाज़ें आ रही थीं आपके घर की तरफ़ से। हम तो सोच रहे थे कि शायद कोई पेड़ काट रहा होगा।"

अजितेश ड्राईवर को लेकर पुलिस स्टेशन जाते समय यह कहते हुए गया था- "किन्हीं भी चीज़ों को इधर-उधर मत करना। छूना भी मत। थाने में एफ.आई.आर देकर आ रहा हूँ।" अजितेश के जाने के बाद पड़ोसी भी आपस में चलो-चलो कहते हुए अपने घर को लौट गये।

सुसी ने देखा था कि उसका पूरा घर बिखरा-बिखरा, अस्त-व्यस्त पड़ा था। जो चीज़ जहाँ होनी चाहिए थी, वहाँ पर नहीं थी। किसी ने सभी तकियों को फर्श पर बिछा कर, उसके उपर सुला दिया था उसकी अलमीरा को। पास में मूक-दर्शक बनकर खड़ी हुई थी बेबी की वह अलमीरा। ज़मीन पर बिखरी हुई थी बाज़ार से खरीदी हुई इमिटेशन ज्वैलरी जैसे कान के झुमके, बालियाँ और गले का हार। यहाँ तक कि, भगवान के पूजा-स्थल को भी किसी ने छेड़ दिया था। सुसी ने सभी कमरों में जाकर देखा था। टीवी अपनी जगह पर ज्यों का त्यों था, कंप्यूटर भी वैसे का वैसे ही पड़ा था। माइक्रो-ओवेन रसोई घर में झपकी लगाकर सोयी हुई थी। और बाकी सभी वस्तुयें अपनी-अपनी जगह पर सुरक्षित थी। पर चोर ने नोकिया का पुराना मोबाइल सेट और एक पुराने कैमरे को अनुपयोगी समझकर बेबी के बिस्तर में फेंक दिया था।

परन्तु जब सुसी ने बेड रूम के बाहर का पर्दा हटाकर देखा, तो वह आर्श्चय-चकित रह गयी यह देखकर कि उस रूम का ताला ज्यों का त्यों लगा हुआ था। अरे! किसीने उस कक्ष को छुआ तक नहीं, उसे ज्यों का त्यों अक्षत छोड़ दिया।
बेबी ने आवाज़ लगायी, "मम्मी, देखो, देखो।"
"क्या हुआ," बेबी के कमरे में घुसते हुए सुसी ने पूछा।
"जिस चोर ने तुम्हारी अलमीरा को तोड़ा, उसने मेरी अलमीरा को क्यों नहीं तोड़ा?" आस-पास ही थी दोनों अलमीरा, बेबी के कमरे में। एक सुसी की अलमीरा, तो दूसरी बेबी की। बेबी की अलमीरा में बेबी की हरेक चीज़ तथा कपड़ा रखा जाता था। सुसी की अलमीरा में लॉकर को छोड़ बची हुई जगह में साड़ी का इतना अधिक्य था कि और साड़ी रखने से उसे अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करना पड़ता था।देखते ही देखते सुबह हो गयी। ड्राईवर और अजितेश, पुलिस स्टेशन में थानेदार को न पाकर, उसके घर चले गए थे। थानेदार की किडनी में स्टोन था। वह वेल्लोर से कुछ दिन हुए लौटा था। "मैं सुबह नौ बजे से पहले नहीं आ पाऊँगा" बड़ी ही कटु आवाज़ में बोला था थानेदार, "आप लोग जाइये, सब कुछ सजा कर रख दीजिये, मैं नौ बजे तक पहुँचता हूँ।"

ड्राईवर की सहायता से नीचे मूर्छित पड़ी अलमीरा को उठाकर खड़ा किया था अजितेश ने। अब, दोनों अलमीरा पास-पास खड़ी हुई थीं। ड्राईवर ने जाने की इजाज़त माँगी, "तो, मैं जा रहा हूँ,सर।" अजितेश को थानेदार के ऊपर पहले से ही काफी असंतोष था, और ड्राईवर से कहने लगा, "ठीक है, तुम जाओ, और रुककर करोगे भी क्या?" ड्राईवर रात दो बजे से प्रतीक्षा कर रहा था स्टेशन पर। अजितेश की अनुमति पाते ही वह तुरंत रवाना हो गया। किस रस्ते से चोरी हुई होगी, छान-बीन करने के लिए सुसी और अजितेश इधर-उधर देखने लगे। पता चला कि बाथरूम के रोशन दान में लगा हुआ शीशा टूट कर नीचे गिरा हुआ था। चोर ज़रूर उसी इसी रास्ते से होकर अंदर घुसा होगा, जिसका वह प्रमाण छोड़कर गया कोमोड़ के ऊपर रखा हुआ था फूलदान। आरी-पत्ती की मदद से सब ताले टूटे हुए थे। सूटकेस, एयर बैग, तब तक ड्राइंग रूम में रखा जा चुका था। इतनी देर तक हाथ-मुँह धोने की भी फ़ुरसत नहीं थी सुसी को। सवेरे-सवेरे टहलते हुए लोग बाहर चारदीवारी का दरवाज़ा खोलकर घर के भीतर आ गये थे। पता नहीं, इतनी सुबह-सुबह इस घटना की जानकारी लोगों को कैसे मिल गयी?
"अरे, ये सब कैसे हो गया?"
"आप लोग कहाँ गये थे?"
"चार दिन पहले, मोर्निंग-वाक में जाते समय मैंने देखा था की आपके कमरे की एक लाइट जल रही थी। मैंने सोचा कि आप लोग बंद करना भूल गये होंगे।"
"दस दिन के लिए बाहर गये थे? किसी को तो बताकर जाना चाहिए था।"
"आपको पता नहीं है, ये जो जगह है, यहाँ चोरों की भरमार है।" उस समय तक पूरा शरीर थक कर चूर-चूर हो चूका था। एक, उपर से लम्बी यात्रा की थकान; दूसरी, रात भर की अनिद्रा। ऐसा लग रहा था मानो शरीर का पुर्जा-पुर्जा ढीला हो गया हो। लेकिन लोगों का आना-जाना जारी था। जल्दी-जल्दी, घर साफ़ कर पहले जैसी साफ-सुथरी अवस्था में लाने की कोशिश कर रही थी सुसी।
उसने हाथ घुमा कर भीतर से देखा था कि लॉकर के भीतर फूटी कौड़ी भी नहीं थी और लॉकर बाहर से टूटकर टेढ़ा हो गया था। सोना चाँदी के गहने और अब कहाँ होंगे? घर सजाते-सजाते, बाद में सुसी को यह भी पता चला कि पीतल का एक बड़ा शो-पीस, कांसे की लक्ष्मी की मूर्ति, चाँदी का कोणार्क-चक्र भी शो-केस में से गायब हैं। यह सब देखकर बेबी को तो मानो रोना आ गया हो। अजितेश डाँटते हुए बोला था, "रो क्यों रही हो? ऐसा क्या हो गया है?"
"मम्मी, देख रही हो, मेरे कान के दो जोड़ी झुमके भी चोर ले गया। चोर मर क्यों नहीं गया? मैं उसको, श्राप देती हूँ कि उसको सात जन्मों तक कोई खाना नहीं मिलेगा?"
"चुप हो जा, पागल जैसे क्यों हो रही हो?"
सुसी डाँटने लगी थी। बेबी को कान के झुमकों के लिए रोते देखकर सुसी को याद आने लगा था अपने सारे गहनों के बारे में।
"तुम्हारी सोने की एक चेन, मेरा मंगल सूत्र, दो चूडियाँ इतना ही तो घर में था न?" पूछने लगी थी सुसी बेबी से।
"और मेरी अँगूठी?" पूछने लगी थी बेबी।
"हाँ, हाँ, वह अँगूठी भी चली गयी।"
"पापा की गोल्डन पट्टे वाली घड़ी?"
"ठीक बोल रही हो, वह भी।"
"और याद करो तो बेबी और किस-किस चीज़ की चोरी हुई होगी?"
"आप के सोने का हार, उसको आपने कहाँ रखा था?"
"इमिटेशन डिब्बे में ही तो था। क्रिस्टल के साथ गूँथकर रखा हुआ था।" सुसी बेबी के नकली गहनों के सब डिब्बे खोल कर देखने लगी थी।
"नहीं, नहीं, यहाँ तो कहीं भी नहीं है।" बेबी कह रही थी।
"एक और बात, अगर आपको पता चल जायेगा तो आपका मन बहुत दुखी हो जायेगा, इसलिए मैं आपको नहीं बता रही हूँ।"
सुसी की आँखों में आँसू देखने से जैसे उसको ख़ुशी मिलेगी, उसी लहजे में चिढ़ाते हुए बोली थी बेबी, "बोलूँ?"
"ज़्यादा नाटक मत कर, गुस्सा मत दिला। बोल रही हूँ, ऐसे भी मुझे अच्छा नहीं लग रहा है। तुम्हारे कह देने से और क्या ज़्यादा हो जायेगा?"
"वह बहुमूल्य पत्थरों से जड़ित चौकोर पेंडेंट, जो आपके बचपन की स्मृति थी, कहाँ गया?"

बेबी ठीक बोल रही थी, पुराना पेंडेंट चेन से कटकर बाहर निकल आ रहा था, इसीलिए चेन से निकाल कर अलग से रख दी थी सुसी। क्या, किसी ज़माने की एक अनमोल धरोहर थी वह? जब वह हाई-स्कूल में पढ़ती थी तब माँ ने उसके लिए बनवाई थी बहुमूल्य पत्थर जड़ित अँगूठी, कान के झूमके तथा पेंडेंट के साथ एक सोने की चेन। अब तो माँ भी मर चुकी है।, और वह सोनार भी। उस समय तो वह सोनार जवान था। अगर उसको एक अच्छा शिल्पी कहें, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। नए-नए डिज़ाईन के चित्र बनाकर, नई-नई डिज़ाईन के गहने गढ़ना उसकी एक अजीज़ अभिरुचि हुआ करती थी। छोटे-छोटे छब्बीस नग, बीच में एक बड़ा सा सफ़ेद नग लगा हुआ चौकोर आकार का था वह पेंडेंट। सबसे ज़्यादा सुन्दर था वह। सभी बहनें बराबर शिकायत करती रहती थीं उस सोनार ने उनके लिए इतनी सुन्दर डिज़ाईन क्यों नहीं बनाया? कितनी सारी यादें जुड़ी हुई थी उस पेंडेंट से। इतने दिनों तक पेंडेंट था उसके साथ। माँ ने अपनी बचत किये हुए पैसों से बनवाया था उसको। उसकी याद आते ही माँ की बहुत याद आने लगी थी। जब माँ ज़िन्दा थी, वह उसके महत्त्व को नहीं समझ पाई थी। अभी समझ में आ रहा था कि किस प्रकार एक मध्यम-वर्गीय परिवार की माँ ने अपने जीवन में पैसा-पैसा जोड़कर बच्चों के लिए बहुत कुछ कर लिया था। आखिर, उसे भी चोर ले गया?

"आप दुखी हो गयी हो क्या? माँ, मेरी भी तो चेन और कान की बालियाँ चोरी हो गयी है।"
"बेबी, तुम्हारी माँ तो अभी ज़िंदा है। तुम्हारे लिए फिर से बनवा देगी। पर, वह पेंडेंट तो मेरे शरीर पर बहुत दिनों तक साथ-साथ था, इसलिए लगाव हो गया था, जैसे कि शरीर का कोई अंग हो।"बेबी ने फिर एक बार किसी गँवार औरत की भाँति चोर को गाली देना शुरू कर दिया था।
"तू ज़्यादा बक-बक मत कर, बहुत काम पड़ा हुआ है, उसमें मेरा हाथ बटा।" कहते हुए बाहर से लाये हुए सूटकेस को खोल रही थी सुसी।एक घंटे के बाद अजितेश लौट कर आ गया था। साथ में पुलिस वाले और मटन कि थैली। ऐसे समय में मटन देख कर सुसी का मन आश्चर्य और विरक्ति भाव से भर गया था। पुलिस के सामने अजितेश को कुछ भी न बोलते हुए, चुपचाप मटन की थैली भीतर रख दी थी सुसी ने। बाथरूम के रोशनदान के पास जाकर थानेदार अनुमान लगाने लगा था कि एक फुट चौड़े रास्ते से तो केवल सात-आठ साल का लड़का ही पार हो सकता है। लेकिन आठ साल का लड़का आरी-पत्ती से सब ताले कैसे खोल पायेगा? इतने बड़े अलमीरा को कैसे सुला पायेगा? ऐसी बहुत सारी अनर्गल बकवास करने के बाद अजितेश, सुसी और बेबी का पूरा नाम, उम्र आदि लिखकर वापस चला गया था। जाते समय यह कहते हुए गया था, अगर मेरी तक़दीर में लिखा होगा, तो आपको आपका सामान वापस मिल जायेगा।

'थानेदार की तक़दीर?' पहले-पहले तो कुछ भी समझ नहीं पाई थी सुसी। तभी अजितेश झुंझलाकर बोला,- "पहले जाओ, गेट पर ताला लगाकर आओ, जल्दी-जल्दी खाना बनाओ, फिर खाना खाकर सोया जाय।"
"जल्दी-जल्दी कैसे खाना पकाऊँगी? क्या सोचकर अपने साथ मटन लेकर आ गए? लोग देखेंगे, तो क्या कहेंगे? इधर तो इनके घर में चोरी हुई है, और उधर ये असभ्य लोग मटन खाकर ख़ुशी मना रहे हैं।"
"लोगों का और कुछ काम नहीं है, जो तुम्हारे घर में क्या पक रहा है देखने के लिए आएँगे?"
तपाक से बेबी बोल उठी, "पापा, मुझे आश्चर्य हो रहा है, आपको तनिक भी दुख नहीं लगा?"
अजितेश सुलझे हुए शब्दों में कहने लगा, "जो गया, सो गया। क्या इन चीज़ों के लिए हम अपना जीवन जीना छोड़ देंगे? मेरी बड़ी दीदी की शादी के पहले दिन, चोर घर में सेंध मारकर शादी के सभी सामान लेकर फरार हो गया। सवेरे-सवेरे जब लोगों ने देखा, तो ज़ोर-ज़ोर से रोना धोना शुरू कर दिए। परन्तु मेरे पिताजी तो ऐसे बैठे थे जैसे उन पर कोई फर्क नहीं पड़ा हो, एकदम निर्विकार। भोज का सामान फिर से ख़रीदा गया। तथा स्व-जातीय बंधु-बांधवों के सामने वर के पिता को हाथ जोड़कर उन्होंने निवेदन किया था कि एक हफ्ते के अन्दर दहेज़ का सभी सामान खरीदकर पहुँचा देंगे।
प्रेशर-कुकर की सिटी बज रही थी। भाप से मीट पकने की ख़ुशबू भी चारों तरफ फैलने लगी थी। फिर एक बार, 'कालिंग-बेल' बजने लगी थी। कौन आ गया इस दोपहर के समय? रसोई घर से सुसी चिल्लाई,- "बेबी, दरवाज़ा खोलो तो।"
"माँ, आँटी लोग आये हैं?" बेबी ने कहा था।
संकोचवश जड़वत हो गयी थी सुसी। कालोनी के सात-आठ औरतें। इधर रसोई घर से मटन पकने की सुवास चारों तरफ फैल रही थी। कोशिश करने से भी वह छुपा नहीं पायेगी। देखो, कितना पराधीन है इंसान? अपनी मर्जी से वह जी भी नहीं सकता।
फिर एकबार दिखाना पड़ा सबको वह टूटी हुई अलमीरा को खोलकर।
"हाँ, देख रहे हैं न?"
"अन्दर का लॉकर भी।"
"हाँ, उसको तो पीट-पीटकर टेढ़ा कर दिए हैं।"
फिर एकबार बाथरूम का टूटा हुआ रोशनदान, फिर एकबार शो-केस की वह खाली जगह, फिर एकबार कितना गया की रट। फट से बेबी बोली, "६ जोड़ी कान के झुमके, मेरी चेन, माँ का मंगल सूत्र..."
"इतना सारा सामान आप घर में छोड़कर बाहर चले गए थे? फिर भी मोटा-मोटी कितने का होगा?"
"सत्तर या अस्सी हज़ार के आस-पास।"
"लाख बोलिए न, जो रेट बढ़ा है आजकल सोने का। चोर के लिए छोड़ कर गए थे जैसे। चोर की तो चांदी हो गयी।"फिर एक बार प्रेशर-कुकर की सिटी बजने लगी। अब सुसी का चेहरा गंभीर होने लगा। ये औरतें जा क्यों नहीं रही हैं? दोपहर में भी इनका कोई काम-धन्धा नहीं है क्या? घूम-घूमकर सारे कोनों को देख रही हैं। घर की बहुत सारी जगहों पर मकड़ी के जाले झूल रहे थे, धूल-धन्गड़ जमा था। ये सब उनकी नज़रों में आयेगा। और जब ये घर से बाहर जायेंगे, तो इन्हीं बातों की चर्चा भी करेंगे। फिर, उपर से आ रही थी पके हुए मटन की महक। धीरे-धीरे सुसी उनसे हट कर चुप-चाप रहने लगी। ये सब औरतें गप हाँक रही थीं। कब, किसके घर कैसे चोरी हुई। इन्हीं सब बातों को लेकर वे रम गयी थीं।
अजितेश कंप्यूटर के सामने बैठे-बैठे खों-खों कर खांसने लगा था। नहीं तो पता नहीं, कितनी देर तक वे औरतें बातें करती?
उस समय तक सुसी को ज़्यादा दुःख नहीं हुआ था। लोग आ रहे थे, देख रहे थे, सहानुभूति जता रहे थे। सबको टूटी-फूटी अलमीरा, चोर के घुसने का रास्ता दिखा रही थी। पर जब सुसी पूजा करने गयी, तो मानो उसके धीरज का बाँध टूट गया हो। भगवन की छोटी-छोटी मूर्तियाँ, अपने-अपने निश्चित स्थान से गिरी हुई थीं। डिब्बे में से प्रसाद नीचे गिर गया था। धूप, अगरबत्ती, सब बिखरा हुआ था इधर-उधर। सिंदूर की डिब्बिया भी गिरी हुई थी। होम की लकड़ियाँ भी बिखरी हुई थी इधर-उधर। चोर उपवास-व्रत वाली किताबों की पोटली खोलकर लगभग तीस चाँदी के सिक्कों को भी ले गया था। कितने सालों से धन-तेरस पर खरीद कर इकट्ठी की थी सुसी ने। एक ही झटके में सारी स्मृतियाँ विलीन सी हो गयी। भगवान की मूर्ति को किसी गंदे हाथों ने ज़रूर छुआ होगा। उनकी अनुपस्थिति में चोर ने ज़रूर इधर-उधर स्पर्श किया होगा। मन के अन्दर से उठते हुए विचार, तुरन्त ही असहायता में बदल गए हो जैसे। सुसी के घर में और कुछ छुपी हुई चीज़ बाकी नहीं थी। चोर को तो जैसे हरेक जगह का पता चल गया था। उसका घर अब उसे घर जैसा नहीं लगा। फटे-पुराने कपड़ों से लेकर, कीमती सिल्क की साड़ी कहाँ रखती थी सुसी, मानो चोर को सब मालूम हो गया था। दीवार की छोटी से छोटी दरार से लेकर घर की बड़ी से बड़ी, गुप्त से गुप्त जगह की जानकारी भी थी चोर के पास।

तुरन्त ही सुसी को याद आ गया टूटे हुए शीशे के अन्दर से दिखा हुआ अलमीरा का वह हृदय-विदारक दृश्य। ऐसे चित्त सोयी पड़ी थी वह अलमीरा, जैसे किसी ने उसे ज़मीन पर लिटाकर ज़बरदस्ती उसके साथ बलात्कार कर दिया हो। खुले हुए दोनों पट ऐसे लग रहे थे, मानो उस नारी ने अपनी कमज़ोर बाहें विवश होकर फैला दी हो। पूरे शरीर पर दाग ही दाग। ... मानो शैतान के नाखूनों से लहू-लुहान होकर हवश का शिकार बन गयी हो। रंग की परत हटकर प्राइमर तो ऐसे दिख रहा था मानो लाल-लाल खून के धब्बे दिख रहे हो। दुखी मन से सुसी की छाती भर आयी थी। फिर अपने-आपको सँभालते हुए बोली थी,- "अरे, सुन रहे हो?" खाने का इंतज़ार करते-करते नींद से बोझिल सा हो रहा था अजितेश। सुसी की आवाज़ सुनकर नींद में ही बड़बड़ाने लगा, "क्या हुआ?"
क्या बोल पाती सुसी? उसके अन्दर तो फूट रही थी एक अजीब से अनुभव की ज्वालामुखी! कैसे बखान कर पायेगी किसीको? चुप हो गयी थी सुसी।
"क्या हो गया? क्यों बुला रही थी?"
फिरसे अजितेश ने पूछा, "जल्दी पूजा खत्म करो, मुझे ज़ोरों की नींद लग रही है। खाना खाते ही सो जाऊँगा।"
भगवान की मूर्तियाँ अब उसे अछूत लगने लगी थीं। चोर ने उन सबको बच्चों के खिलौनों के भाँति लुढ़का दिया था। उसके कठोर, गंदे हाथों ने स्पर्श किया होगा उन मूर्तियों को। उसने संक्षिप्त में ही सारी पूजा समाप्त कर दी।
खाना परोसते समय और एक बार अनमने ढंग से बोलने लगी थी सुसी, "सुन रहे हो?"
"क्या हुआ?" इस बार गुस्से से बोला था अजितेश, "क्या बोलना है, बोल क्यों नहीं रही हो? एक घंटा हो गया सिर्फ 'सुनते हो' 'सुनते हो' बोल रही हो।"
"मुझे कुछ अच्छा नहीं लग रहा है," बोली थी सुसी।
"कौनसी बड़ी बात है? यह तो स्वाभाविक है। चोरी हुई है, मन को तो ज़रूर ख़राब लग रहा होगा।"
"नहीं ऐसी बात नहीं,
"फिर, क्या बात है?"
"मुझे ऐसा लग रहा है हमारे घर का कुछ भी गोपनीय नहीं बचा है। किसी ने अपने गंदे हाथ से सब कुछ छू लिया है। ऐसा कुछ बचा नहीं जो अन-देखा हो"
अजितेश आश्चर्य-चकित हो कर देखने लगा था सुसी को। ऐसा लग रहा था, जैसे सुसी के सभी दुखों का बाँध ढहकर भी अजितेश के हृदय को छू नहीं पा रहा हो।


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