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03.22.2009
 

विकास के नाम पर
दिनेश ध्यानी


आज
विकास के नाम पर
विनाश कर रहा आदमी
धीरे-धीरे बरबादी का मंजर
बनाता आदमी।

साधनों के नाम पर
सृष्टि का नाश
आज की ख़ातिर
पीढ़ियों को छलता है आदमी।

जल, जंगल और ज़मीन
खेत, खलिहानों को उजाड़ता
हैवानियत की सारी हदें
पार कर गया है आदमी।

साधनों की होड़
अंधी दौड़
कुछ पाने की ख़ातिर
सबकुछ लुटाता आदमी
लगता है इसीलिए
पगला गया है आज आदमी।


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