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03.22.2009
 

सड़क का आदमी
दिनेश ध्यानी


सड़क में खड़ा
आदमी
चौराहे में
चकरा गया है।
उसके आगे पीछे
दायें बायें
राह तो हैं
लेकिन
समझ नहीं आता
अपना पथ नहीं भाता।

आदमी जो सड़क पर
खड़ा है
उस पर
किसी का
ध्यान नहीं है
वह आदमी
घिरा है सड़क से
सड़क उसे घेरे हुए
आगे निकल जाती है
संसद की तरफ।

आदमी चकरा
घबराकर
और
झिझककर
तय नहीं कर पा रहा
उसे किधर जाना है
आदमी की यही झिझक
घबराहट
चकराहट
जिस दिन छँट जायेगी
उस दिन
उसे अपनी राह
सूझ जायेगी ।

तब
वह भी
उनकी तरह
कूच करेगा
संसद की ओर
अपना रास्ता
तलाशने
अपना मुक़ाम
बनाने।
सड़क का आदमी
अभी ओढ़े हुए है
लबादा
सभ्यता का
संस्कारों का
सामाजिक
समरसता का
उसे पता नहीं
कि संसद तक की राह
संस्कारों
सभ्यताओं और
सरोकारों से
होकर अब नहीं जाती
वहाँ तो सिर्फ़
वही पहुँच सकता है
जिसके अन्दर
जज़्बा हो
कुछ कर गुज़रने का
अपने लिए
पाने का
उसकी ख़ातिर चाहे उसे
कुछ भी करना पड़े।


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