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03.06.2009
 

प्यारे भइया
दिनेश ध्यानी


प्यारे भइया
कैसे हो तुम?
तुम्हें देखने की
तुमसे बतियाने की
तुम्हारे संग-संग बड़े होने की
रूठने मनाने की
बहुत तमन्ना थी मेरे मन में।
मैं चाहती थी तुम्हारी तरह
घर के आँगन में खेलूँ
माँ की छाती से चिपककर
कभी हँसूँ, कभी रो दूँ।

भइया
मैं चाहती थी कि
तुम्हारी तरह स्कूल जाऊँ
पढ़लिखकर
बैछेन्दीपाल, पी.टी. उषा,
कल्पना चावला
सानिया मिर्जा, अंजू बाबीजार्ज
सरीखा नाम कमाऊँ।

देना चाहती थी आकार
मैं अधुबुने सपनों को
होना चाहती थी परिचित
जगत की आबौहवा से
चाहती थी उड़ना
अनन्त आकाश से आगे।

देखना चाहती थी तुम्हें करीब से
चलना चाहती उँगली पकड़कर
तुम्हारे संग
लेकिन अचानक क्रूर हाथों ने
तोड़ दी मेरी आस
बंद करदी मेरी साँस
मिटा दिया मेरे सपनों को
एक ही झटके के साथ।

देखती क्या हूँ
अपनों के ही हाथ रँगे हैं
मेरे लहू से
माँ के गर्भ में लिंग जाँच कर
मिटा दिया मुझे
लड़की होना ही था
शायद मेरा अपराध।

दुनिया देखने के अरमान
आकाश से आगे उड़ने के सपने
अधूरे ही रह गये,
मेरे अपने ही मेरे बैरी बन गये।

मेरे भइया
अपनी इस अजन्मी बहन की
एक बात
तुम ज़रूर याद रखना
यदि कभी तुम्हारे कोई लड़की हो
उसकी भ्रूण हत्या मत करना
तुम उसकी हत्या मत करना।


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