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03.06.2009
 

मुझे मत मारो
दिनेश ध्यानी


मुझे भी देखने दो
स्वपनिल आकाश
खुली धरती
उगता सूरज
छिटकी चाँदनी
ऋतु परिवर्तन
वसंत बहार
मुझे भी जग में आने दो।

होने दो मुझे परिचित
जगत की आबोहवा से
जिन्दगी की धूप छाँव से
जीने के अहसास से।

लेना चाहती हूँ साँस
मैं भी खुली हवा में,
पंछियों की चहचहाट
और हवा की सनसनाहट में।

देना चाहती हूँ आकार
मैं अधबुने सपनों को,
ख्वाबों और खयालों को
उड़ना चाहती हूँ
अनन्त आकाश में
पंछियों की मानिंद
बहना चाहती हूँ
हवा की भाँति।

मुझे मत मारो
माँ, बाबू जी
दादा जी, दादी जी
आने दो
मुझे इस संसार में
जी लेने दो
मेरा जीवन।

गिड़गिड़ा रही थी
एक लड़की
जब की जा रही थी
उसकी भ्रूण हत्या
अपनों के द्वारा।


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