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03.22.2009
 

मेरी व्यथा
दिनेश ध्यानी


मेरी व्यथा कथा को
भाँप सकोगे?
मेरे दुख को नाप सकोगे?
है तुममे इतना साहस
तुम इन ज़ख्मों को निहार सकोगे?।
दश्कों की पीड़ा सहकर
मैंने इन ज़ख्मों को पाया है
जिनको मैंने अपना समझा
उनसे ही दुख पाया है।
मैं चलना चाहती थी पथ पर
बहना चाहती थी सरिता बन
नव पल्लव नव जीवन रस
मैं बुहारना चाहती थी
लेकिन मुझसे छल कर डाला
अपनों ने ही ठग डाला।
नारे देते रहे सदा ही
मेरे नाम के मेरे काम की
लेकिन सच में था वो दिखावा
बाहर कुछ अरु अन्दर था छल।
अपनों मुझको ने कैद किया
अपने घर में ही बनवास दिया
मैं चल न सकी ना बढ़ ही सकी
राजपथ क्या पथ पा न सकी।

शंकर से मुझको पाया है
देवों ने मुझको गाया है
मृदंग बजा ब्रह्माण्ड जगा
जब मैंने सुधि का पान किया
तब से मैं पग-पग बढ़ती रही
देवों से नर तक राज किया
मैंने जग का शृंगार किया।
लेकिन अब मैं अस्तित्व विहीन
कर डाला अपनों ने कांति विहीन
मैं अब भी लड़ने का तत्पर
अपने अस्तित्व बचाने को
मैं जग में अब भी छाने को


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