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01.16.2009
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अपने पथ पर चलना ही उसका बाना है
प्रो. दिलीप सिंह


त्रिलोचन की चार कविताएँ फूल नाम है एकमें नागार्जुन पर हैं। दोनों एक ही लगते हैं, कई स्थलों पर; कविता में भी, ज़िंदगी में भी। दोनों कभी डरे नहीं किसी से, जूझे और लड़े दोनों। फकीरी दोनों ने स्वेच्छा से वरण की, फिर भी तने रहे जीवन भर। दिखावे, दंभ, तामझाम को अपने पास भी फटकने नहीं दिया दोनों ने। दलित, वंचित दोनों को जानते थे, अपना अपना मानते थे। साफ़गो दोनों थे, जीवन के लिए मरते थे। अपनी अस्मिता का मान करते थे। टूट जाँय, पर झुके दोनों नहीं कभी कहीं, जीवन भर। नागार्जुन के लिए जो भी लिखा त्रिलोचन ने वह सब का सब, जस का तस उन पर भी सच्चा उतरता है :

(१) कहा एक महिला ने, नागार्जुन तो कवि से/नहीं जान पड़ते/आए तो ज्यों ही आए/त्यों ही/घुलमिल गए/ढंग ऐसे कब पाए/थे हमने कवियों के ..../एक मजूर ने कहा, नागार्जुन ने मेरे/बच्चे को बहलाया फिर रोटियाँ बताईं/खाईं और खिलाईं/खुशियाँ साथ मनाईं/गम आया तो आए/टीह टाह की/घेरे/खड़े रहे असीस बन कर/हठ हरा, फेरे/फिरे नहीं, चिंताएँ मेरी गनी गनाई।

(२) नागार्जुन क्या है, अभाव है/जमकर लड़ना/विषम परिस्थितियों से उसने सीख लिया है,/लिया जगत से कुछ तो उससे अधिक दिया है ....../विपदा ने भी इस घर को अपना माना है,/इस विपदा पर कवि ने लहर हँसी की छापी,/आँखों की प्याली छटा स्वप्न की खापी;/अपने पथ पर चलना ही उसका बाना है।

(३) नागार्जुन जनता का है/जनता के बन में/आमग नहीं दिखलाई देता/यह जनधारा/लिए जा रही है उसका .... /पल दो पल को यदि हारा/लोटा पोटा भू पर और/ग्लानि को गारा।

(४) अपने दुख को देखा सबके ऊपर छाया,/आह पी गया, हँसी व्यंग्य की ऊपर आई ../कभी व्यंग्य उपहास कभी आँखें भर आईं/अत्याचार अनप पर नागार्जुन का कोड़ा/चूका कभी नहीं, कोड़ा है वह कविता का/कहीं किसी ने जानबूझकर अनमल ताका/अगर किसी का तो कवि ने कब उसको छोड़ा।

 

त्रिलोचन की अभिव्यक्तियों का संसार भी बहुरूपी और अनोखा है। कविता का सौंदर्य आँकना भी उन्हें आता है और खुलकर कहना भी। खुलकर कहने में त्रिलोचन मुहावरों का खूब प्रयोग करते हैं। हिंदी के कविता इतिहास में इतने सारे मुहावरों का ऐसा सधा प्रयोग किसी कवि में नहीं मिलता। किसी हिंदी कथाकार के पास भी शायद ही इतने मुहावरे मिलें। काव्य सौंदर्य बड़ी सरलता से त्रिलोचन पैदा करते हैं कि पंक्तियाँ याद रह जाती हैं :

  • शिशिर काल के कुहरे पर जब चित्र सुनहले/रवि अपने कर से लिखता है

  • उष्ण करों से सूर्य धरा को सहलाता है

  • खेती के ऊपर सोने का पानी छाया

  • चाँद/ढिबरी के गाढ़े धुएँ जैसे/बादलों में था/प्रवाह/बादलों का आज खर था/चाँद लुका छिपी खेलता सा/लगा/हवा/ठंडी-ठंडी देह-मन को जुड़ाती हुई/आती/जाती

  • बादल घिर आए/ताप गया पुरवा लहराई/दल के दल घन ले कर आई/जगीं वनस्पतियाँ मुरझाई/जलधर तिर आए

  • बरखा, मेघ-मृदंग थाप पर/लहरों से देती हैं जी भर/रिमझिम रिमझिम नृत्य ताल पर/पवन अथिर आए

  • पुर-पुर गई दरार/शष्कता कहाँ खो गई

लोक सिद्धता इन सुंदर प्रकृति चित्रों में भी त्रिलोचन की मुखर है। ढिबरी का गाढ़ा धुआएँ शहरी प्रतीक नहीं है, लुकाछिपी का खेल, जुड़ाना क्रिया, पुरवा का लहराना, दरार का पुरना, लोक अनुभव की जमीन से उपजी अभिव्यक्ति हैं। ऐसे ढेरों उदाहरण त्रिलोचन की कविताओं में मिलते हैं और सिर्फ़ उन्हीं में मिलते हैं। लोक शब्दों, लोक अनुभवों, लोक जीवन को त्रिलोचन ने भाषा में कुछ इस तरह लपेट दिया है कि काव्यार्थ में चमक आ गई है और अभिव्यंजना टटकी हो गई है। कविता में मुहावरेदानी का ऐसा ही लोक सम्मत जादू त्रिलोचन जगाते हैं। ऐसा करने से भाव जाग जाते हैं, अनुभूतियाँ चौकन्नी हो जाती हैं और काव्य भाषा एक तरह के अद्‌भुत आस्वाद से भरीपूरी हो जाती है :

  • दुख तो तिल से ताड़ जल्द हो जाते हैं

  • जीवन में तुमने भी कितने पापड़ बेले

  • जैसी हाट, बाट वैसी है/क्यों फिर थोड़ी सी आस बाँध ली पल्ले

  • होड़ा होड़ी जहाँ मची है

  • जिसकी तकदीर तान कर सोई है

  • तबियत खट्टी आज अहिंसा की है

  • शांति की सट्टी मंद पड़ी है

  • डाँटा फटकारा चिंताओं को/अब जाओ,/जहाँ तुम्हारा जी चाहे, हुड़दंग मचाओ,/मेरी जान छोड़ दो/आह कहाँ कल पाई/मैंने पल भर को भी

  • हाट पहुँच तो गए टेंट में दाम नहीं है

  • अपना गला फँसाकर मैंने भर पाया है

  • चाभो माल, बनाओ उल्लू, मौज से जियो

  • ठोक बजा कर देख लिया, कुछ कसर न छोड़ी/दुनिया के सिक्के को बिल्कुल खोटा पाया

  • अचरज है मुझको कि त्रिलोचन कैसे/इतना अच्छा लिखने लगा ... /एक फिसड्डी आकर अपनी धाक जमाये/देख नहीं सकता हूँ मैं यों ही मुँह बाये?

  • पर यह कथन बहुत सच्चा है,/इसका अंश न कुछ कच्चा है

  • खींचानोची मची हुई है अपनी अपनी

  • कौर छीनकर औरों का जो खा जाते हैं

  • यहाँ माल है जिसका चोरना/वह दूकान चला पाता है

  • कसम जवानी की यदि/मैंने पाँव हटाए।

जो काव्य पंक्तियाँ इस आलेख में यहाँ वहाँ उद्घरित की गई हैं उनमें भी मुहावरेदानी मिल जाएगी। उन मुहावरों को त्रिलोचन ने तरजीह दी है जो आम जन की व्यावहारिक भाषा का अहम हिस्सा बन चुके हैं। सबसे बड़ी बात है संदर्भ में वांछित अर्थ पैदा करने और सकुशल पाठक तक पहुँचाने के लिए ढेरों-ढेर मुहावरों का कविता की पूरी संरचना में सटीक संयोजन। क्योंकि कविता भाषिक तत्वों के जमान से नहीं, उनके परस्पर और समजस्वीकृत संयोग से बनती है।

त्रिलोचन का भाषा संसार अत्यंत समृद्ध है। संस्कृत से लेकर बोली तक की शब्द शक्ति की उन्हें गहरी पहचान है। वे भाषा के भीतर रहने वाले कवि हैं। एक एक शब्द की आत्मा उनकी पहचानी हुई है। नयापन उनकी काव्य भाषा की विशेषता है। विराम चिह्नों का प्रयोग उनकी काव्य भाषा में खूब हुआ है, पदों और वाक्यों की तोड़ कर संयोजित करने में वे इनका कुशल प्रयोग करते हैं। शब्दों की जात को पहचान कर उन्हें अर्थगर्म बनाना सिर्फ और सिर्फ त्रिलोचन ही जानते हैं। भाषा की जातीयता त्रिलोचन के कवि के लिए पहली और आखिरी कसौटी है। अवधी और भोजपुरी शब्दों की ताकत वे पहचानते हैं। बोली-शब्दों के उच्चरित रूप को उन्होंने कविता की जय बनाने के लिए बखूबी शामिल किया है। अन्य स्रोतों के शब्दों को भी वे लोक प्रचलित ध्वनि भेद के साथ अपनी कविता में ले आने में संकोच नहीं करते। भाषिक विधान के कारण ही उनकी कविता औरों से हट कर लगती है। भाषा के आभिजात्य में उनका तनिक भी विश्वास नहीं है। उनकी कविता ज़मीन की भाषा को अपनाती है। जिस भाषा में वे सोचते हैं, उसी में लिखते हैं और जिस भाषा में वे लिखते हैं उसे (उस) जनपद के लोग बूछते समझते हैं। कुल मिलाकर कहें तो त्रिलोचन की भाषा के अपने निजी संस्कार हैं। यह भाषा आम कंठ की वाणी है जो कवि के स्वर में फूटी है। त्रिलोचन की काव्य भाषा गहरे विश्लेषण की माँग करती है। फिलहाल कुछ नये नये से भाषिक संगठनों को प्रकार के रूप में देखते चलें :

प्रकार : I

१.  चुप हो जा/ऐसे मैं निकालता हूँ कि/दर्द तो भाई अलग,/तुझे मालूम भी न होगा,/कब आई और मोचनी खींच ले गई (मोच)

२. मन इतना टेकी/रहा कि तपा किया (टेक धारण करने वाला)

३. वह ऐसी डाही है (डाह करने वाली)

प्रकार : II

१.  बाहर का डर भीतर के खग को न तरासे/शांति सुमति हो, दुःख कभी मन को न गरासे ...। मन में न हरासे (त्रासे, गासे, ह्रासे)

२. कैसा युग है, कहीं अकन लो, हाय हाय है (आँक लो)

३. सुबह सुहाई देख उधर तो (सुहावनी)

४. क्या इस जन से रूछे (रूढ़े, अलग)

५. मँजर गये आम

६. पत्ते पुराने पियरा चले

७. मैंने हहास सुना आसमान का (अट्ठहास)

८. ढर्रा नोखा है (अनोखा)

प्रकार : III

१.  इन दिनों क्या कुछ नए झमेले/तुमको घर रहे हैं

२. अब ढहते हैं मन के/मोहक महल

३. तुमने महिमा की सर्वत्र कनात तनाई

४. सब कुछ स्वार्थ-सूत्र में नाधा

५. हाथ मैंने उँचाए हैं

६. डर नहीं है/हँसा जाऊँगा

७. सोच लो, जो बीज बोओगे तुम्हें लुनना पड़ेगा

८. अपराए हैं तो तराए भी हैं ये/आप आ गए हैं बराए भी हैं ये

९. मौन रह कर टोया था/टीस जहाँ उठती थी

१०. आज प उठती थी

१०. आज अँगडा रही है

प्रकार : IV

१.  तुम तो जैसे थके थकाए भरपाए हो

२. यह अपना घर है जिसमें टोटा/ही टोटा है

३. घोर घाम है, हवा रुकी है। सिर पर आ कर सूर्य खड़ा है

प्रकार : V

१.  अभी चला क्या, बहुत, बहुत आगे, चलना है। दुबिधा छन ही जाएगी

२. ऊना मन, चू उठी नीरवता

३. खिसक चली रात/नखत चले,/उठा अलस/नियति हिली,/हँसी प्रात

४. रामनाथ का मकान बैठ गया है

५. फेरे करते रहे, पाँव उनके खिया गए

६. धर्मशाला की कुर्सी ऊँची है

६. कोई राग तुम कढ़ा दो/आशा म नहीं जाएगी

प्रकार : VI

युतियाँ (युक्तियाँ), नाराज़ी (नाराज़गी), अथिर (अस्थिर), प्रात (प्रातः), अपनाव (अपनत्व), मुसका कर (मुस्कुरा कर), आकास (आकाश), जोत (ज्योति), अभिलाष (अभिलाषा), बरस (वर्ष), नश्वत (नक्षत्र)

त्रिलोचन की कविताओं का बड़ा हिस्सा छायावाद की छाया में पला पुसा है अतः छायावादी शब्द समूह को उन्होंने पर्याप्त स्थान दिया ै जैसे - बादल, घन, जलघर, बरखा, पवन, दादुर, मोर, पपीहा, समीर, इंद्रधनु, कंठ, गान, पावस, मधु, संध्या, प्रात, राका, शारदा, ज्योत्स्ना, चाँदनी, लहर, उपवन, सुषमा, शरद, पारिजात, बेला, कपोत, दीप, ज्योति, स्नेह, मंजरियाँ, नीड़, खग, भोर, सरोवर, भौंरे, क्षितिज, उषा, विहग, नीरव, छाया, तम, व्योम, ओस, गुंजन, पुष्प, मझर, सरिता, सुमन दल, नव, प्राण, प्रभा, ज्योति पथ, धारा तिमिर, उमा, विजन, हास, बीन, लय, झंकार, तरंग, तारक, स्निग्ध, श्याम धन, उत्ताप, काकली, मौन, दृग, मलिन, दूब, किरण, पथिक, उद्भ्रांत, एकाकी, पंक, आनंद, रस, शतदल, सम्मोहन, निर्जन, वाणी, मधुगीत, पीडा, अश्रु, हास, पथ, निशा, उषा, अरुण, प्रभा, मेह, पिक पंकज, राव, गंध, तान, आभा, झंकार, आँसू, अमृत।

एक तो यह कि कवि को अपनी काव्य परंपरा के भाषिक उपादानों का भान होना चाहिए और वह त्रिलोचन में अकूत है। दूसरे यह कि इस शब्द समूह को उन्होंने नये भावों की उद्भावना के लिए नये अर्थ संधान के साथ अपनी काव्य भाषा में बुना है। अधिकांश कवि नव्यता को परंपरा से कटाव और आधुनिकता को जातीयता से अलगाव के रूप में लेते हैं और चुकते हैं। त्रिलोचन ने आधुनिक यथार्थ बोध को प्रकटाने के लिए परंपरा से पराप्त शब्द भंडार को पड़ताल ी, और जाँच परख कर नये संदर्भ और नया काव्योन्मेष पैदा किया। कुछ उदाहरण देखें -

  • पथ पर चल कर जो बैठ गए/वे क्या देखेंगे प्रात नए

  • ये अनंत के लघु लघु तारे/दुर्बल अपनी ज्योति पसारे/अंधकार से कभी न हारे

  • आओ,/अच्छे उमगे समीर,/जरा ठहरो/फूल जो पसंद हो उतार लो/शाखाएँ, टहनियाँ,/हिलाओ, झकझोरो,/जिन्हें गिरना हो गिर जाँय/जाँय जाँय

  • कहीं एक भी दुःख न रहने पाए/नई उषा आई है आज जगाने

  • गान बन कर प्राण ये कवि के तुम्हारे पास आए

  • अमृत प्राण का अति दुर्लभ है देखो कहीं न चुकने पाए

  • मेघ ने सित छत्र ताना/वायु ने चामर हिलाए/इंद्रधनु नत सूर्म ने दी/चंद्र ने दीपावली की/तुम न हारे देख तुमको दूसरे जन भी न हारे

  • झूम रहे हैं धान हरे हैं, झरती हैं झीनी मंजरियाँ/खेल रही हैं खेल लहरियाँ/जीवन का विस्तार है आँखों के आगे

  • गया स्नेह भी और रह गए आप निखट्टू

  • लतिका द्रुम में नूतन फूल लगाओ

  • रस भरने को रस जीवन का सुखा दिया है

त्रिलोचन के कथ्य और भाषा में जो लोच और लय है वह आम आदमी से उनकी रूहानी प्रतिबद्धता का ही नतीजा हैं। वे किसानों और दलितों को अपना बना कर रचने वाले हिंदी के कुछ गिने चुने कवियों में से एक थे। वास्तव में त्रिलोचन गँवई थे और वैसी ही धजा में जिये भी। उनकी कविता भी गाँव के ठेठ देहाती की नज़र से देश, दुनिया और प्रकृति को देखते हुए बनी है। हिंदी के किसी कवि ने शायद ही कभी लिखा हो कि गीत गड़रियों के सुन सुन कर दुहराऊँगा। इन गीतों को लोक भीनी खुशबू त्रिलोचन की कविता में किसी न किसी स्तर पर रची बसी है। वे इस गड़रिये के गीत को दूर-दूर से सुन कर मुतासिर नहीं हुए हैं - उसके जीवन को और खुद उसे भी अच्छी तरह जानते हैं - गाता अलबेला चरवाहा/चौपायों को साथ संभाले/ ... नए साल तो ब्याह हुआ है। अभी अभी बस जुआ छुआ है/घर घरनी परिवार है आँखों के आगे।उनकी एक कविता में फेरू की कहानी है। वह ठाकुर साहब के यहाँ काम करता है। ठकुराइन काशीवास करके लौटी हैं - फेरू अमरेथू रहता है/वह कहार है .../कहा उन्होंने मैंने काशीवास किया है/काशी बड़ी भली नगरी है/वहाँ पवित्र लोग रहते हैं/फेरू भी सुनता रहता है। दलित विमर्श की इतनी मार्मिक और इतनी कम बोलने वाली कविता भी आज के शोर शराबे वाली दलित रचनाओं में ढूँढनी पड़ेगी, मिल सकेगी, ऐसा लगता नहीं। उनकी एक और कविता प्रेरणा’ (तुम्हें सौंपता हूँ) ऊपर कहे सब कुछ को उभार देती है - मेरी कविता कल मुसहर के यहाँ गई थी/मैं भी उसके साथ गया था जो कुछ देखा/लिखा हुआ है मेरे मन में जब घर लौटा/तब मुझसे नाराज हुए जो बड़े लोग थे/उनकी वह नाराज़ी मैं चुपचाप पी गया/वे समझे मैं समझदार हूँ इसी राह से/चला करूँगा जिस पर सब चलते आए हैं/पर मुझको उसकी कुटिया ने और बुलाया/पाँव दबा कर अबकी उसके यहाँ मैं गया/टीहुर की बातें कानों पी असी साल का/जाड़ा बरखा घाम खा चुकी थी वह वाणी/अब केवल साँसें थीं अब केवल वाणी थी। अब केवल वह कुटिया थी जिसमें बैठा था।टीहुर की जाड़ा बरखा घाम खा चुकी अनुभवी वाणी ही त्रिलोचन की कविताओं का सरमाया है। फेरू, टीहुर या घीसू, गोबर त्रिलोचन से यह मासूम-सा सवाल भी करते हैं कि घर में कविताएँ/क्या कभी काम आती हैं/क्या इनसे दाल छौंक सकते हैं/हल्दी का काम/क्या इनसे चल सकता है।और त्रिलोचन का उन्हें जवाब मिलता है कि - मैंने तो व्रत ले रखा है तुम सब के लिए; मिट्टी के पुतलों में दिव्य अभिमान भरने का और थोड़े संकल्प भी किए हैं - चाहता हूँ तुम भी इन्हें शपथ, प्रण और व्रत की तरह अपने जीवन भर धारे रहो - जो उठाई है ध्वजा झुकने न देना/जो दिखाई है प्रगति रुकने न देना/जो जगाई शक्ति है लुकने न देना/जो लगाई लौ कभी चुकने न देना।

त्रिलोचन जैसा पर दुख कातर और जन उपकारी कवि ही यह कह सकता था कि यही विनय मेरी है, मुझे याद मत रखना/अपने किए सँजोए का संचित फल चखना।कवि त्रिलोचन तुम्हें जानने मानने वाले हमस ब अपने कर्मों से बँधे अपनी-अपनी डगर चल रहे हैं। तुम्हारी कविताओं ने हमें जीने का सहूर सिखाया है। पर क्षमा मिले गुरु, तुम्हें याद न रखने वाली तुम्हारी बात हम न मान सकेंगे। तुम शरीर से पास हो न हो, तुम्हारा काव्य तुम्हारी ही तो छवि है। तुम्हें याद रखने को वो ही बहुत है उस जमीनी काव्य की भलमानस बनावट को कैसे भूल सकेगा कोई। तुम तो कह कर चल दिए। पर एक बात कह दें तुमसे; चाहे तो इसे अवहेलना ही समझो, तुम क्यों न अपनी कि इन दिनों तुम बहुत याद आये,/जैसे धुन राग के बाद आये।’;

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२ त्रिलोचन की नागार्जुन पर लिखी कविता की एक पंक्ति।

३ ये तीन काव्य संग्रह ही इस आलेख का आधार बनाए गए हैं।

 


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