अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
03.15.2015


राह ख़ुदा की पाई है

राह ख़ुदा की पाई है
जिसने प्रीत निभाई है।

ऊँचाई देती है वो
भीतर जो गहराई है।

जब से मैंने इश्क़ किया
मुझ पर मस्ती छाई है।

है प्यार बड़ा ताकतवर
चाहे लफ़्ज़ अढ़ाई है।

सीने से लगकर यारो
भर देना जो खाई है।

भीड़ रहे इस धरती पर
चोटी पर तन्हाई है।

निकली है मेरे दिल से
'विर्क' ग़ज़ल जो गाई है।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें