अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
10.10.2007
 
सरोवर के समीप
धर्म प्रकाश जैन

मैं निहारता हूँ
सरोवर में जल की उछलती लहरों को।
देखता हूँ
बत्तख के श्वेत वक्षस्थल पर गढ़े शूल को।
चारों ओर जमीन पर फैले हैं
सिगरेट के अधजले टुकड़े।
झोंका मारती है
कॉफी की तीखी गंध।
आगन्तुकों के अशोभनीय शब्द
बार- बार कान को पीड़ा देते हैं।
युवक जोड़ों के यौन उदारवादी
बनने की कोशिश में
मलिन हो रहा है
जल में दिखनेवाला चाँद।
हवा भी बेरुखी हो रही है।
लाल- पीली आवाजें
आपस में टकरा- टकराकर बिखर गईं हैं
        और
                शब्द अर्थहीन हो गये हैं।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें