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ISSN 2292-9754

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05.01.2017


सरोवर के समीप

मैं निहारता हूँ
सरोवर में जल की उछलती लहरों को।
देखता हूँ
बत्तख के श्वेत वक्षस्थल पर गढ़े शूल को।
चारों ओर ज़मीन पर फैले हैं
सिगरेट के अधजले टुकड़े।
झोंका मारती है
कॉफ़ी की तीखी गंध।
आगन्तुकों के अशोभनीय शब्द
बार- बार कान को पीड़ा देते हैं।
युवक जोड़ों के यौन उदारवादी
बनने की कोशिश में
मलिन हो रहा है
जल में दिखनेवाला चाँद।
हवा भी बेरुखी हो रही है।
लाल- पीली आवाजें
आपस में टकरा- टकराकर बिखर गईं हैं
और
शब्द अर्थहीन हो गये हैं।


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