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ISSN 2292-9754

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05.01.2017


नीलकंठ

कहाँ?  कहाँ?  उड़ रहा है
खड़ी फूस पर इधर- उधर, किधर
झूल रहा है।
नीली परों वाला पाखी
सरोवर के ऊपर फड़फड़ाते
क्या खोज रहा है?
अभी- अभी पुल से टकराते बचा था
और एक मार्जार का मुख ऊपर
आसमान की ओर उठ गया था।
नीलकंठ कंठ नहीं नीला
वक्षस्थल व कंठ है जामुनी,
बीच में है फिरोजी शिरायें
पंख हैं हरे व गहरा नीलापन लिए हुये,
और पीठ है मटमैली रंगी।
नहीं कोई पक्षी अधिक सुन्दर।
कभी इस दीवार पर
कभी उस पर
और कभी पकड़ी के दरख्त पर।
क्यों- क्यों इतना बेचैन है?
क्यों इतना सहमा हुआ है?
कोई विस्फोट की आवाज नहीं हुई।
क्यों निहार रहा है
फूलों को, जल को, सिवार को?
क्यों घायल करता बबूल पर बैठकर
स्वयं को?
और क्यों अपना सिर मारता
सरोवर की स्याही दीवार पर?
तुमको भी दी होगी
तुम्हारी माँ ने सजा
और क्रुद्ध होकर मीलों उड़कर आ गया है
अकेला इस घने सुनसान प्रौद्योगिकी संस्थान में।
आजतक नहीं देखा
यहाँ कोई दूसरा नीलाभ।
यह क्या !
उड़कर
बैठ गया है बिजली के तार पर
जहाँ एक चमगादड़ चिपका है।
पंखो में चपलता है अविरत
निकल रही है आँखों से चिनगारी।


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