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ISSN 2292-9754

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05.01.2017


एक विक्षिप्त औरत

कभी उसको कहा था
पूनम का चाँद।
परन्तु आज वह खड़ी थी
चौराहे पर
गहरी काली नागिन सी कजरारी रात में।
आज चाँद कहाँ?
थी जलती ज्वाला।
थी एक मनहूस तस्वीर।
बहरी हठीली- कठीली आँधी
के निरन्तर प्रहारों ने
उसको बना दिया था उद्भ्रान्त।
सिर पर तोड़ रही थी
काँच की बोतल।
श्वासों से निकल रहा था
जलते हुये गंधक का धुँआ।
कौन समझ सकता था
उसकी अंतरिक्षीय नीरवता?
रिस रही थी
पल पल मवाद की बूँदें।
आदमियत की नग्न नग्नता
का गहरा दरिया।
दरिन्दों के बलात्कारों से प्रताड़ित।
फिर भी विक्षिप्तता की
जीर्ण खिड़की के बीचोबीच
बना था
एक बड़ा ममतामयी सूराख,
और शिशुवत किलकारी में
दिखती थी एक अप्सरा।


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