समुद्र की अनजान गहरी तलहटी तक मैं गोता लगाता हूँ। एक हिरन भागता है तेजी से मेरी संगमरमरी आँखों के सामने। शरीर मेरा पत्थर हो गया था पीला। कहाँ कहाँ दौड़ती रही थी राजकुमारी, कुडंल- कुंकुम लगाये। सब कुछ स्वप्न था क्या ? काली खोहों से सूरज की किरण तक !