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ISSN 2292-9754

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05.01.2017


अस्तित्व का दर्द

होने का अहसास
और न होने की कल्पना
दोनों में जो भी हो सम्बन्ध
अतःकरण की गोद पर
यदि सर्प बैठे हों
जिजीविषा पर प्रश्न चिन्ह
लग ही जाता है।

आज धर्म युद्ध की बात
कितनी घिनौनी लगती हैं
जब सत्य बोलने वाले को
एक किनारे पर खड़ा कर
आक्षेपों के बाणों पर लेटा हुआ
भीष्म पितामह बना दिया जाये
समय की धैर्य सीमा टूट ही जाती है।

झूठ बोलते बोलते
बार बार की प्रतिध्वनि से
झूठे व्यक्ति को सत्यवादी बना दिया जाता है
और चोरी करते करते
चोर की सत्ता नियम बन जाती है
फिर कहाँ खड़ा होता है नैतिकता का मापदण्ड।

अपने अपनो सा व्यवहार कर
दुश्मन के हाथों में खेलकर
दुश्मन की बोली में भय दिखाकर
कायर बनाने की प्रक्रिया कितनी भी घृणास्पद क्यों न हो
व्यक्ति की नैतिक शक्ति तोड़ने के लिये पर्याप्त है।

बात छोटी हो भले ही लापरवाही से
सन्देहास्पद आक्षेप
बन जाते हैं
होने और न होने की
विषम स्थिति
नैतिक व अनैतिक के बीच
घटता अंतर
देवता व दानव के आपस में
बदलते मुखौटे
कौन किस वक्त कहाँ
कैसा दाँव बदले
झूठे आरोपों व प्रत्यारोपों के बीच
छद्मवेशी
मानवीय मानव के बीच
कैसे रहें
यही है
अस्तित्व का दर्द ।


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