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ISSN 2292-9754

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05.09.2017


इमरजेंसी

[मंच-सज्जा- मंच काले कपड़े से बना होना चाहिए। नाटक का अधिकांश भाग गहरे पीले प्रकाश में खेला जाना चाहिए।]
[स्थान-रेलवे प्लेटफॉर्म के बाहर, ट्रेन की सीटी कभी-कभी सुनाई देती है।]
[सभी पात्रों के चेहरों पर मुखौटे पड़े हुए हैं। रिक्शा-चालक की वेश-भूषा काली बनियान व काली पैंट है। पुलिस का सिपाही खूनी लाल रंग की पोशाक पहने है। टिकट कलेक्टर की पोशाक सफ़ेद है। उसके मुँह पर आठ इंच की जीभ बाहर निकली हुई है।]
(पृष्ठभूमि में डंडे व गोलियों की आवाज़)
(नेपथ्य से आवाज़)
(आपात्कालीन स्थिति लागू है, राजनैतिक नेताओं की धर-पकड़ हो रही है। आम आदमी सहमा हुआ है। बुद्धिजीवी वर्ग ने बुर्के ओढ़ लिये हैं। सख़्ती का प्रभाव धनिक वर्ग पर नहीं,
आम आदमी पर अधिक हुआ है।)
टिकट कलेक्टर (मंच पर घूमते हुये) (अंगुलियाँ चटकाता है।) ट, ट, ट, ट, ट।
(हाथ में डंडा लेकर घुमाता है।)
स्वगत कथन -
{आ, आ, आ, कौवा आ,
आ, गिद्ध आ,
आ, चील आ।
जब से आपात्कालीन स्थिति लागू हुई है (डंडे को घुमाता है) शक्ति ही शक्ति है। शक्ति, शक्ति, शक्ति।
कौवों का भोजन, गिद्ध का भोजन, चील का भोजन।
आया,
आया, आया।}
ए! रिक्शेवाले! इधर आ।
(सिर के चारों ओर डंडा घुमाता है।)
(टिकट कलेक्टर बड़बड़ाता है)
सिर पर भूत चढ़ा है, और ऑर्डर्स ऊपर से हैं। हर आदमी के रक्त में सरकार का हिस्सा है।
टिकट कलेक्टर जल्दी निकालो और चले जाओ।
रिक्शावाला क्या साहब?
टिकट कलेक्टर निकालो, एक रुपया।
रिक्शावाला किसका साहब?
टिकट कलेक्टर यहाँ खड़े होने का।
रिक्शावाला साहब कल भी खरीदी थी।
टिकट कलेक्टर निकालो, रसीद।
रिक्शावाला साहब! खो गई।
टिकट कलेक्टर (डंडा रिक्शेवाले की पीठ पर रखते हुये) निकालो, एक रुपया।
रिक्शावाला साहब! अभी-अभी मैं रिक्शा लेकर चला आ रहा हूँ, एक भी पैसा जेब में नहीं है।
टिकट कलेक्टर उधार माँगो।
रिक्शावाला साहब! कौन देगा उधार।
(टिकट कलेक्टर रिक्शे की गद्देदार सीट को उठाकर रख लेता है।)
रिक्शावाला साहब! मैं मर जाऊँगा। सुबह सिर्फ एक कप चाय पी थी।
टिकट कलेक्टर एक रुपया देकर सीट को वापस ले सकते हो।
रिक्शावाला साहब! यह अत्याचार है।
टिकट कलेक्टर शक्ति ही शक्ति है।
  (8 लड़के एक स्वर में मंच पर चिल्लाते हैं)
शक्ति ही शक्ति है।
शक्ति के आगे आदमी चूहा।
शक्ति छछूँदर के पास है।
छछूँदर चालाक है।
छछूँदर के एक सहस्त्र हाथ।
हाथों में खून।
चूहा गंदा है।
चूहा डरपोक है।
चूहा बिल के अंदर।
चूहे व अधिकार!
गुफाओं और खोहों में,
मशीनीकरण में,
मिलों और मजदूरों में।
दरख्तों के लंबे ढूह।
बड़ी मकड़ियों के जाले।
सीही के काँटे।
गोखरू के पौधे।
काँटा चुभा, काँटों से खून निकला।
काँटों में चूहा जकड़ा।
बंद, बंद, बंद।
(लड़के मंच छोड़ कर चले जाते हैं)
रिक्शावाला  साहब!
टिकट कलेक्टर क्या?
रिक्शावाला मैं आपके पैरों पर पड़ता हूँ (रिक्शावाला टिकट कलेक्टर के पैरों पर गिरता है।)
टिकट कलेक्टर दीवान जी! दीवान जी!
(दीवान जी दौड़कर आते हैं.....)
दीवान जी मुर्गे की बीठ! दूर हट!
रिक्शावाला साहब! मैं.....।
टिकट कलेक्टर  एक रुपया ले आओ और सीट ले जाओ।
रिक्शावाला साहब!
दीवान जी इसकी नसबंदी होनी चाहिए।
रिक्शावाला साहब! अभी मेरी शादी नहीं हुई।
टिकट कलेक्टर शक्ति, शक्ति है।
तुमको हम रुपये देंगे।
रिक्शावाला साहब! मेरी शादी नहीं हुई।
टिकट कलेक्टर झूठ बोलता है।
रिक्शावाला साहब! घर में मेरी बूढ़ी माँ है सिर्फ! चलिये, देख लीजिए।
टिकट कलेक्टर एक रुपया लेकर आओ।
रिक्शावाला अच्छा! साहब!
दीवान जी नहीं, रुको! टिकट कलेक्टर साहब! यह नसबंदी का केस है।
 (रिक्शे वाले से)- मेरे साथ चलो।
(रिक्शावाला डर से काँपने लगता है)
(कई रिक्शा चालक एक साथ बढ़कर)
“वह साथ नहीं जाएगा।“
रिक्शा चालक 2  कुत्ते के मुँह में एक रुपया रख दो।
टिकट कलेक्टर क्या कहा?
दीवान जी! इसने मुझको कुत्ता कहा!
हम इसको मीसा में गिरफ्तार करेंगे।
(तीन-चार रिक्शे वाले और आगे बढ़ आते हैं)
सभी एक साथ दीवान जी, उसको छोड़ दो।
रिक्शा चालक 3 आपका कानून केवल ग़रीबों के लिये है।
टिकट कलेक्टर ग़रीबी शक्ति के द्वारा ही दूर हो सकती है।
शक्ति ही शक्ति है।
(तीन कांस्टेबल और भीड़ को देखकर उधर ही आ जाते हैं, सभी के हाथों में डंडा है।)
तीनों (एक साथ) दीवान जी क्या है?
दीवान जी ये रिक्शे वाले डंडे की ही भाषा समझते हैं।
(8 लड़के एक स्वर में मंच पर चिल्लाते हैं)
  नंगा भिखारी।
डंडे की मार।
पानी का बुलबुला।
डंडे की मार।
पेशाब की बदबू।
डंडे की मार।
लूटना, कुचलना।
हत्या।
आत्म-हत्या।
टूटे हुये गमले।
आदमी की चिढ़चिढ़ाहट ।
अधिकारों का कचूमर।
न्याय की केंचुल।
चुप,
बोलो मत।
(लड़के मंच छोड़ कर चले जाते हैं)
(डंडों की रिक्शे पर मारने की आवाज़ होती है।)
(सटा सट। कट कट कट टि।)
टिकट कलेक्टर - (रिक्शा चालक 4 से) - तुम्हारा कार्ड?
रिक्शा चालक  साहब! यह देखिए।
टिकट कलेक्टर (रिक्शा चालक 5 से) - तुम्हारा कार्ड?
रिक्शा चालक  साहब! खो गया। यह लीजिए, एक रुपया।
टिकट कलेक्टर अच्छा बनाता हूँ।
  (रिक्शा चालक 6 से) - तुम्हारा कार्ड?
रिक्शा चालक साहब! नहीं है।
टिकट कलेक्टर गद्दी उठा लो। सीट ले लो।
(नेपथ्य से आवाज़)
(हड़बड़, भागा-दौड़ी, जाने मत दो, भागने वाले का सिर तोड़ दो।)
दीवान जी (शोर के बीच) (रिक्शा चालक 1 से) चलो नसबंदी के लिए।
रिक्शा चालक  दीवान जी आपके पैर पड़ता हूँ। छोड़ दीजिये।
दीवान जी तुमने अपने साथियों को भड़काया। तुमने अशांति पैदा की।
हम तुमको बंद करेंगे।
रिक्शा चालक दीवानजी छोड़ दीजिये। घर में कोई नहीं है सिर्फ बूढ़ी माँ है।
कौन देखेगा उसको? (गिड़गिड़ाता है। रोने लगता है ….।)
दीवान जी अच्छा हम नसबंदी के बाद छोड़ देंगे।
(रिक्शा चालक के एक हाथ में रस्सी की गाँठ फँसा देता है)
दीवान जी नसबंदी के मामलों में ज़बर्दस्ती नहीं।
परंतु बिना ज़बर्दस्ती के कोई केस आता ही नहीं है।
{पर्दे के पीछे से आवाजें आती हैं।}
  (शोर दौड़ो, भागो
कार्ड, पैसा लाइसेंस, खड़े मत हो।
एक रुपया, एक रुपया, एक रुपया, एक रुपया।
नहीं, नहीं, नहीं।
कानून की मुट्ठी में गरीब।
हम गरीब।
पैसे से कानून खरीदा जा सकता है।)
रिक्शे चालक (आपस में) बात करते हैं –
"बेचारा आज फँस गया। आपात्काल हम लोगों के लिये ही है।"
(कई रिक्शाचालक मंच पर गिरे हुए हैं। कांस्टेब्ल्स के पैर उनकी छातियों के ऊपर ..।
टिकट कलेक्टर हा हा अट्टहास करता है ...।
शक्ति ही शक्ति है।)
  (पर्दे के पीछे से आवाज़ आती है।)
  पंजा फैल रहा है अंगुलियों की लम्बाई तेज़ी से बढ़ रही है
नाखूनों की बढ़ने की गति कई गुनी है।
नाखून पैने हो रहे हैं।
पंजा फैल रहा है।
नागफनी।
मुरझाए पुष्प।
कुचले हुये पौधे।
(सत्ता में शक्ति की भूख ताड़का के मुख के समान फैल रही है और जनता की धैर्य की सभी सीमायें ख़त्म हो चुकी हैं।)
(एक भीषण विस्फोट की आवाज़। तेज लाल रोशनी। ज़मीन पर गिरे हुए रिक्शे चालक एकाएक खड़े हो जाते हैं। और उनके चेहरे अत्यधिक क्रोधमय हो उठते हैं।
रोशनी हलकी होती है।)
(परदा गिरता है।)
(ट्रेन की सीटी की ध्वनि सुनाई दे रही है।)

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