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05.31.2008
 

ये पीढ़ियाँ
धनपत राय झा


ये पीढ़ियाँ
अगली पिछली
कल और आज
आज और कल
तब और अब
पीढ़ियों का अंतर सौ योजन का
विचार, वेश भूषा या भोजन का
कहो न चिराग तले अंधेरा है
अब लाइट तले उजाला है
उधर बुउ के गले में अटका निवाला है

बदल गये जीवन मूल्य
कल किसी की हाय लेते डरते थे
अब सबकी हाय लेते फिरते हैं
हाय हाय में जीवन गुजार देते हैं

अब साथ नहीं चल सकता
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते का उद्‌घोष
पट्टी बाँधे गंधारी का दबा हुआ रोष
             सतीत्व के नाम पर
             नारी की अग्नि परीक्षा
             अँगूठे के बदले
             शिष्यत्व की दीक्षा
लो नई पीढ़ी को ठेंगा
जब रूढ़ी ग्रस्त राम ने
छोड़ा अश्वमेध का अश्व
तब उन्हीं के अपनों ने
“अ श्व”
याने नहीं चलेगा कल
कहकर उसे नकारा है

जब खाँसती वैसाखी ने कहा
याद करो फर्ज
कब चुकाओगे पीढ़ी के कर्ज
तब गरम खून ने भरी
कल्पना की हवाई उड़ान
अपनाया अनुशासन हीनता का मर्ज
और स्वच्छन्दता की तर्ज


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