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05.31.2008
 

तुम्हारी कसम
धनपत राय झा


तुम्हारी कसम तुम बहुत याद आई।
आहों में तुम थी, निगाहों में तुम थी, गीतों की धुन में तुम्हीं गुनगुनाई।।
बात बरसों नहीं आज ताजी अभी तो,
हकीकत है कोरा ये सपना नहीं तो।
निमंत्रण था भोजन का जाति में सबको,
खुदा की कसम लौट आती जो अब तो।।
मावे में तुम थी और मेदे में तुम थी, तार बन चाशनी में तुम ही नहाई।
तुम्हारी कसम तुम बहुत याद आई।।
महकती गली है चहकता नजारा,
कहूँ क्या? तुझे वो समा प्यारा प्यारा।
इशारों से मन की समझ ही चुकी हो,
क्या है जो परदेस अब तक रुकी हो।।
घीरत में तुम थी, सीरत में तुम थी, वो सूरत सलौनी बहुत याद आई।
तुम्हारी कसम तुम बहुत याद आई।।
कहीं कहकहे, चुलबुलाहट कहीं तो,
मेरे ही मन छटपटाहट रही जाए।
बयाँ करूँ क्या जगमगाहट वो क्या थी?
सपनों सी दुनिया कि घड़ियाँ वो क्या थी।।
दोनों में तुम थी, पत्तल में तुम थी, जिसे देखता एक तुम ही दिखाई।
तुम्हारी कसम तुम बहुत याद आई।।
चावल कलि से हरी सब्जी ऐसी,
दालों मसालों में थी बात ऐसी।
पापड़ तले सेव थी चरपरी सी,
तुम्हारे बिना सब किरकिरी सी।।
तुम थी पलक में, तुम थी झलक में, तुम्ही मेरे स्वादों की दुनिया में आई।
तुम्हारी कसम तुम बहुत याद आई।।


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