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05.31.2008
 

घट का यौवन
धनपत राय झा


रसोद्रेक से रिस रिस झरता, छलका घट का यौवन।
झिलमिल लहरों रास रेलि में, केलि रत शारद मन।।

महक मलय के वन उपवन में, बौराया मन चंदन।
वल्लरियों में रंग रसिक सा, फुव्वारों नहा नंदन।।

नटखट फाग के राग झूमते, हुए तरबतर सुधि जन।
झूला डाले झिरमिर झूले, स्मित मदमाता उपवन।।

रुनझुन पायल स्वप्न थिरकते, तार सितार के चुंबन।
सुमन भरी ताजी डालियों से, महके मन का मधुबन।।

नश्वरता की करुण कथा क्यों, व्यथा उभारे शबनम।
छल छल छलके मुखर मौन सी दो नैनों की चितवन।।

उच्छवासों जो पीर पिघलती, करती विरहन क्रन्दन।
लपक झपक की आँख मिचौली, दैया दीप की तड़पन।।

मन वृन्दावन कनुप्रिया कान्हा अठखेली रंजन।
लुक छिप रिक्त गगन से लाता, उडगन वैरागी मन।।

बाग बहारों बहक घूमता, चित चितवन की खोज।
हरी घास की मधुर गुदगुदी, लाती मन में मौज।।

आज कल्पना तितली उड़ती, कर कुसुमों से क्रीड़ा।
ढ़ाई आखर की कालिन्दी, सिहर जगाती व्रीड़ा।।

हा उमंग की माँग सिसकती, छलका भीगा दामन।
नील मणि के गिरि गऊँर सा, झरता निर्झर सावन।।


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