| अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली |
![]() |
मुख्य पृष्ठ |
| 09.21.2007 |
| वसीयत - छोटा सा परिचय देवी नागरानी |
|
श्री महावीर शर्मा लंडन के निवासी, एक सुलझे हुए कहानीकार और गज़ल गो शायर भी है। परदेस हो या देश एक हिंदुस्तानी हृदय हर दृष्टिकोण से अपने देश की सभ्यता और वहाँ की संस्कृति अपने आस पास के पात्रों में ढूँढता रहता है। शायद कहीं न कहीं उसे अपना वजूद बिखरता नज़र आता है जिसका सिमटाव करने की कोशिश यह कहानी एक आईना बनकर सामने पेश आई है। साहित्य की सैर को निकलें तो उनकी साईट पर ज़रूर अपना पड़ाव बनाएँ। महावीर शर्मा द्वारा लिखी गई यह कहानी दिलों का हक़ीकी दस्तावेज़ है। एक चलते फिरते टाइमज़ोन में ज़िंदगी के माइनों के बदलते रंग का ज़ाइका हक़ीकत का जामा पहन कर सामने आया है। चलती चक्की देककर दिया कबीरा रोइ ज़िंदगी और मौत का फासला दर गुज़र करते करते, रिश्तों के बाज़ार से गुज़रना पड़ता है। यह एक आम इन्सान की ज़िंदगी का हिस्सा है जो एक कड़वे अहसास का ज़हरीला घूँट पीने के बाद ही तजुरबा बन जाता है। आजकल ये एक आम चलन हो रहा है, शायद मशीनों के दौर में रहते रहते इन्सान की सोच भी मशीनी पुरज़ों की तरह चलती रहती है, अपना काम करती रहती है, बिना यह जाने, बिना यह देखे कि उन पाटों के बीच कौन आया, कौन ज़ख्मी हुआ, कौन कराह उठा। इस शोर के दौर में चीख़ का कानों तक पहुँच पाना तो नामुमकिन है, जहाँ बहरों की बस्तियाँ गूँगों की भाषा अब भी समझने के प्रयास में लगी हुई हैं। देखा और समझा जाए तो यह बात आईना बन कर सामने आती है कि कोई भी बुज़ुर्ग पैदा नहीं होता। ‘आज का बालक कल का पिता‘ यही चलन है और रहेगा भी। बस सोच की रफ़्तार ताल मेल नहीं रख पाती और वही टाइमज़ोन का जेनिरेशन गैप बन जाता है। गुफ़्तगू की तरह ख़ामोशियाँ भी बोलती हैं, चीख़ती है पर बेसदा सी उनकी वो आवाज़ें घुटन बन कर दफ़्न हो जाती हैं उन दिलों की धड़कनों में, जहाँ साँसें अहसास बनकर धड़कती हैं। जहाँ ख़ामोशी की घुटन का घेराव जहाँ घना हो जाता है, वहाँ उसे तोड़ कर एक ज़िंदा लाश को जीवनदान देना एक नेक कदम होता है। पल दो पल उस बुढ़ापे को सहारा देना, उसके पास बैठकर उस के मन की भावनाओं को टटोलना, या उन्हें कुरेदने की बजाय सहलाना किसी तीर्थ पर जाने से ज़्यादा माइने रखता है क्योंकि "पत्थरों में ख़ुदा बसा है" कहना और उस सत्य का दर्शन करना अलग अलग दिशाओं का प्रतीक है, धड़कते दिल में रब बसता है यह एक जाना माना सच है। पर सच से आँखें चुराना, कतराकर पास से होकर गुज़र जाना कितना आसान हो गया है। हाँ, जब सच का सामना होता है तो ज़्यादा कुछ नहीं बदलता, इतिहास गवाह है हर बात दोहराई जाती है, सिर्फ नाम बदलते हैं, रिश्तों के माइने बदलते हैं, हालात वही के वही रहते हैं। शब्दों से टपकती हुई पीडा़ का अहसास देखें उनके हृदय की गहराइयों को टटोलें, पात्रों की विवशता, एकाकीपन के सूत्र में बँधती जा रही है। ‘एक रात जब मूसलाधार वर्षा हो रही थी। ऐथल के ऐसा तेज़ दर्द हुआ जो उस के लिए सहना कठिन था। मैंने एम्बुलैंस मंगाई और ऐथल की करहाटों व अपनी घबराहट के साथ अस्पताल पहुँच गया। एक अनंत पीड़ा को जिन सजीव शब्दों में महावीर शर्मा ने पिरोया है लगता है जैसे यह "मैं जानता था ... क्योंकि कोई सुनने वाला नहीं है, उस के अचेतन मन में पड़ी हुई पुरानी यादें चेतने पर आने के लिये जाने कब से सँघर्ष कर रही होगी, किंतु किसके पास इस बूढ़े की दास्तान सुनने के लिये समय नहीं है।" (पढ़िये कहानी "वसीयत") मन का हर ज़र्रा इस सत्य को किसी भी तरह नकार नहीं
पाता, पर हाँ, कड़वी दवा का घूँट समझकर सिर्फ निगलने की कोशिश कर सकता
है। कालचक्र तो बिना आहट, बिना किसी को सूचित किये, स्वार्थ अस्वार्थ
के दायरे के बाहर, दुख सुख की परंपरा को तोड़ता हुआ आगे बढता रहता है
और ज़िंदगी के सफर में कहीं न कहीं कोई वक़्त जरूर दोहराया जाता है
जहाँ तन्हाई का आलम इन्सान को घेर लेता है, जहाँ वह मकानों की भाँय
भाँय करती दीवारों से पगलों की तरह बात करना उस आदमी की बेबसी बन जाती
है।सिर्फ कहानी के पात्रों की बात नहीं चल रही है, उन्होंने खुद इस दौर
को जिया है। मेरी गज़ल का एक शेर इसी बात का जामिन हैः दुःख सुख का अहसास वहाँ कम होता है जहाँ उसको बाँटा जाता है, वर्ना उस कोहरे से बाहर निकलना बहुत मुशकिल हो जाता है। ऐसे हालात में बेबसी का सहारा बन जाते है। आँसुओं का भार जितना ज़्यादा दर्द उतना गहरा......!! कहानी मन को छूकर उसके मर्म से पहचान करा जाती है जब याद की वादियों से तन्हा गुज़रना पड़ता है। एक वारदात दूसरी के साथ जुड़ती हुई सामने आ जा रही है "उस दिन मुझे माँ और ऐथल की बड़ी याद आई। मेरी आँख
भर आई! पोते का नाम जॉर्ज वारन रखा।" के साथ ऊँचाइयों से बहता हुआ मानव हृदय की सतह में
आकर थम जाता है। लावा बनकर बह रहा है पिघलता हुआ दर्द, जिसकी पीड़ा का
इज़हार कितनी सुंदरता से किया है महावीर जी ने अपने पीड़ित मन के शब्द
सुरा से "हँसते खेलते एक साल बीत गया, इतनी कशमकश भरे जीवन में अब आयु
ने भी शरीर से खिलवाड़ करना शुरू कर दिया था।" ‘एक दिन वह जब बाहर गई और रात को वापस नहीं लौटी तो मैं बहुत रोया, ठीक उसी तरह जैसे जॉर्ज, विलियम और जैनी को छोड़ने के बाद दिल की पीड़ा को मिटाने के लिए रोया था। मैं रात भर विलमा की राह देखता रहा। अगले दिन वह वापस आ गई। बस, यही अंतर था विलमा और विलियम में जो वापस नहीं लौटा।’ अभिलाषा अंतरमन के कलम की ज़ुबानी अश्कों की कहानी सुना रही है।अपने बच्चों की आस, प्यास बनकर रूह की ज़ुबान से पक रही है। लपकते शोले मोम को पिघलाने के बजाय दिल को पत्थर भी बना देते हैं। दिल के नाज़ुक जज़्बे बर्फ की तरह सर्द भी पड़ जाते हैं। यह बखूबी दर्शाया गया है इस कहानी में। धन राशि को धूल की तरह तोल कर लुटाया गया, जिससे न किसी के वक्त का मोल चुकाया जा सकता है, और ना ही किसी के अरमानों को आश्रय देने की कीमत। हाँ, आंका गया मूल्य तो उस एक अनकहे लफ़्ज़ का था, उस अनसुने शब्द का था जो कहीं न कहीं अंदर ही घुटकर दफन हो गया था, पर स्नेह के थपथपाहट से कुछ पल धड़क कर जी उठा। जीवन की सार्थकता जब सिसकती है तो दिल की आह एक
वसीयत बन जाती है। बस वसीयत ही रह जाती है। वसीयत के अर्थ की विशालता
शायद इन्सानी समझ समझने में असमर्थ है। जो आँखें देखती है, धन, दौलत,
घर परिवार, ईंट गारे से बने महल जो न जाने किस खोखली बुनियाद पर बने
है, जहाँ इन्सान नाकाम हो जाता है अपनी आने वाली अवस्था को देखने में,
टटोलने में, जिसे वह आज सहला रहा है, सजा रहा है। आज जब कल का रूप धारण
करेगा तब इतिहास दोहराया जायेगा। जहाँ वसीयत करने वाला लाचारी की शिला
पर खड़ा है, उसी राह का पथिक हर एक को बनना है, उस वनवास के दौर से
गुज़रना है तन्हा तन्हा। |
| अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें
|