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ISSN 2292-9754

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08.01.2014


वो ही चला मिटाने नामो-निशां हमारा

221 2122 // 221 2122

वो ही चला मिटाने नामो-निशां हमारा
जो आज तक रहा था जाने-जहां हमारा

दुश्मन से जा मिला है अब बागबाँ हमारा
सैयाद बन गया है लो राज़दां हमारा

ज़ालिम के ज़ुल्म का भी किससे गिला करें हम
कोई तो आ के सुनता दर्द-ए-निहां हमारा

हर बार क्यों नज़र है बर्क़े-तपां की हम पर
हर बार ही निशाना क्यों आशियाँ हमारा

दुश्मन का भी भरोसा हमने कभी न तोड़ा
बस उस यकीं पे चलता है कारवां हमारा

बहरों की बस्तियों में हम चीख़ कर करें क्या
चिल्लाना-चीख़ना सब है रायगां हमारा

परकैंच वो परिंदे हसरत से कह रहे हैं
‘देवी’ नहीं रहा अब ये आसमां हमारा


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