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| 02.09.2008 |
| वो हवा शोख पत्ते उड़ा ले
गई देवी नागरानी |
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वो हवा शोख पत्ते उड़ा ले गई
शाख़े-गुल को भी आख़िर दग़ा दे गई। जिंदगी मेरी मुझसे ज़िया ले गई किसलिये मौत आकर सज़ा दे गई। शोखियाँ तो छुपाकर रखी थीं, मगर मेरी मुस्कान मुझको दग़ा दे गई। जो समझती रही वो नहीं तुम रहे मुझको पैग़ाम जिन्से जफ़ा दे गई। आ गई मौज हलकी सी साहिल पे क्या आनेवाला है तूफाँ, पता दे गई। हिज्र की आग में दिल सुलगता रहा बारहा याद देवी हवा दे गई। |
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