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05.03.2012
 
वक्त की गहराइयों से
देवी नागरानी


वक्त की गहराइयों से ढूँढ लाई हूँ समाँ
जीते जी मरने की कोशिश ने किया है बेजुबाँ।।

सूनी है ये राह लम्बी ना डगर आसान ये
खुद से मिलने की यही पतली गली में है जहाँ।।

कुछ इशारे कर रही है, रात दिन कुदरत यहाँ
होश में बेहोश है क्यों है तुझे जाना कहाँ?

उम्र बढ़ती जा रही है, ज्यों घटे है ज़िंदगी
कितने मौसम आते जाते, कर रहे इसको बयाँ।।

मौत कि मौसम न देवी, जो पलट आती रहे
इक हवा का तेज झोंका, आए ऐसे ज्यों खिजाँ।।

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