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| 05.21.2007 |
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ठहराव ज़िन्दगी में
दुबारा नहीं मिला देवी नागरानी |
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ठहराव ज़िन्दगी में दुबारा नहीं मिला
वर्ना उतारते न समंदर में कश्तियाँ
मेरी लड़खड़हाटों ने संभाला है आज तक
बदनामियाँ घरों मे दबे पाँव आ गई
ख़ुश्बू, हवा और धूप की परछाइयाँ मिलीं
ख़ामोशियाँ भी दर्द से देवी है चीखती |
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