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| 05.21.2007 |
| सोच की चट्टान पर बैठी रही देवी नागरानी |
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सोच की चट्टान पर बैठी रही जाल मखमल का वहीं बुनती रही। पत्थरों में थे मिले कल देवता आज बुत मंदिर के मैं छलती रही। कहने के काबिल न थी उसकी जुबां ख़ामोशी की गूँज मैं सुनती रही। हार मानी थी न कल तक, आज क्यों हौसलों के सामने झुकती रही? क्या बहारों से है मेरा वास्ता मैं खिजाओं में सदा पलती रही। जिसने तूफाँ से बचाया था मुझे सामने उसके सदा झुकती रही। |
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