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05.03.2012
 
शक यकीनों में जब बदलते हैं
देवी नागरानी

शक यकीनों में जब बदलते हैं
शीशे विश्वास के निखरते हैं

नाम जितने हैं, उतने रिश्ते हैं,
मौसमों की तरह बदलते हैं

आरज़ू दिलमें जीत की लेकर
योद्धा मैदान में उतरते हैं

जितने होते हैं जुल्म के साए,
वो उजालों से ख़ूब डरते हैं

मेरी फ़रियाद की अदालत में
सारे दरवाज़े बंद मिलते हैं

दर्द के आँसुओं से गुलशन में
सींचने से ही गुल निखरते हैं

कैसा शिकवा, शिकायतें कैसी
वक्त के साथ हम भी चलते हैं

ऐसे व्यवहार देवी देखे कल,
आज अश्कों में ढल के बहते हैं

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