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| 05.03.2012 |
| रेत का घर जो अब बनाया है देवी नागरानी |
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रेत का घर जो अब बनाया है अपनी किस्मत को आज़माया है रिश्ता इस तरह से निभाया है अपना होकर भी वो पराया है मैं सितारों से बात करती थी चाँद ये बीच में क्यों आया है आज का हाल देख मुस्तकबिल कौन माज़ी को देख पाया है गुफ़्तगू का तो कोई मोल नहीं मैंने ख़ामोशी को सजाया है क़त्ल उसने किया मगर फिर भी सर पे इल्ज़ाम मेरे आया है रिश्ता वो ही निभाएगा देवी जिसको रिश्ता समझ में आया है |
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