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| 05.26.2007 |
| "प्रवासिनी के बोल" देवी नागरानी |
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संपादकः डॉ॰ अंजना संधीर
महिलाओं का तू चितवन है डॉ॰ अंजना संधीर ने एक अनोखी विचार धारा को इस संग्रह के रूप में साकार करके अनूप और अनोखा स्वरूप दिया है और एक सूत्र में पिरोकर प्रस्तुत किया है, लग रहा है जैसे नारी जाति के सन्मान में एक नया मयूर पँख लगा है। उनका दृढ़ संकल्प ही इस काव्य संग्रह "प्रवासिनी के बोल" के रूप में प्रकाशित हो पाया है। "ख़्याल उसका हरेक लम्हा मन में रहता है अंजना जी के इस कथन में एक निचोड़ है, एक अनबुझी प्यास का अहसास जो सीने में कहीं न कहीं पनपता तो रहता है पर खिल नहीं पाता, खिलता है तो महक नहीं पाता, उस अनजान तड़प को उन्होंने शब्द दिये है "प्रवासिनी के बोल"। भरी आँखों और तड़पती हृदय वेदना परदेस में रहने वालों की, उनकी कलम की नोक से पीड़ा स्वरूप बहती सरिता बन कर सामने आई है। मुझे अपनी एक गज़ल के चंद शेर याद आ रहे हैः इल्म अपना हुआ तो जान गई अपने देश और संस्कृति से कट कर प्रवासी जीवन में जो उपलब्धि और विघटन होता है, उसे नारी हृदय महसूस करता है और भावनायें कलम का सहारा पाने से नहीं चूकतीं। जाने अनजाने में वो पद चिन्ह बनकर कहीं न कहीं अपनी छाप जरूर छोड़ जाती हैं, जो कभी न कभी साकार स्वरूप अख़त्यार कर लेती हैं। एक फिलासफ़र शल्फ वाल्डो एमरसन के शब्दों में " सीधा सीधा रास्ता पकड़कर न चलो, वहाँ चलो जहाँ कोई रास्ता या सड़क न हो। चलो और अपने पीछे एक पगडंडी छोड़ जाओ।" इस विचार धारा को अंजना जी ने स्वरूपी जामा पहनाने का प्रयास किया है अपने श्रम परिश्रम के बलबूते पर, और साहित्य साधना की इस नई पगडंडी पर नारी जाति के मनोबल व सामर्थ्य को एक मुकाम पर लाने का बखूबी प्रयास किया है| सारा आकाश नाप लेती है जो स्वप्न अभी तक आँखों में तैरता रहा, उसकी नींव इस किताब के रूप में रक्खी है। देश से बाहर परदेस में, भाषा के विरोधी वातावरण में, अपनी हिंदी भाषा को कविता के माध्यम से जिंदा रखना अनुकूल क्रिया है। भाषा को ज़िंदा रखना हमारा कर्तव्य है, क्योंकि यह हमारे पास, आने वाली पीढ़ियों की धरोहर है। भाषा ज़िंदा है तो हम भी जिंदा रहेंगे। स्त्री मन को जागृत करके उसके मनोबल को पहचान देना एक साहस पूर्ण प्रयास ही नहीं, एक काबिले तारीफ़ कदम है, जो इतिहास के पन्नों पर उल्लेखनीय बन जाता है, और तो और भारत व अमरीकी हिंदी रचनाकारों के बीच एक सेतू बाँधने का श्रेय भी उन्हें जाता है। इसी प्रयास को अंजना जी ने एक बागबान की तरह दिन रात की मेहनत से सींचकर एक महकते हुए मधुबन का स्वरूप देकर अमरिका के नारी पक्ष को उजागर किया है। यहाँ पर वाली आसी साहब का शेर इस बात का सम्पूर्ण गवाह हैः हमने एक शाम चरागों से सजा रक्खी है उसी साहस और शालीनता का उदाहरण एक परिपूर्ण ग्रंथ (An anthology connecting the East & the West) के रूप में "प्रवासिनी के बोल" कुल मिलाकर ६२२ पन्नों के रूप में मनोभावों से भरपूर आपके सामने आया है, जिसमें यू.एस.ए. में रहने वाली ८१ अमरीकी भारतीय हिंदी कवयित्रियों की ३२४ कविताएँ पहले भाग में दी गई हैं, हिंदी से जुड़ी ३३ प्रतिभाशाली महिलाओं का सचित्र परिचय दूसरे भाग में दर्शाया गया है, तथा तीसरे भाग में अमरीका में अब तक प्रकाशित महिला साहित्यकारों की प्रकाशित पुस्तकों की सूची इत्यादि भी शामिल है। विदेश में रचा जा रहा साहित्य ही इस बात का प्रमाण है कि हम अपने देश से दूर ज़रूर है, पर देश हमसे दूर नहीं। दिल्ली से राजी सेठ का कथन है- " भाषा के घेरे से परे रहकर अपनी भाषा की, देश से परे रहकर देश की, परिवेश से परे रहकर देश के रंग- रूप, तीज-त्यौहार। मिथिक -इतिहास को रचने की प्रेरणा इन्हें कौन देता होगा?" उनके उत्तर में मेरी ये दो पँक्तियाँ हर नारी के हृदय की पुकार है, ललकार है। दिल में देश बसाकर रक्खा हमनें हमारा घर, उसका वातावरण, दिनचर्या में हमारा चलन, आपसी व्यहवार, हमारी भाषा और संस्कृति को बरक़रार रखने के लिये हिंदी भाषा का अनुकूल उपयोग एक योगदान है। साहित्य के वरदान को अलग - अलग अनुभूतियों को भिन्न-भिन्न स्वरूप में से सजाकर इस संकलन में पिरोया गया है, जिनमें नारी हृदय के वात्सल्य के साथ करुणा, दया, प्रेम, सेवा के भाव लिये हुए अनेक मधुर ग़ज़ल, गीत, लोकगीत, कवितायें, तीज त्यौहार पर अपनी भावनाएँ, अपने कोमल हृदय के ताने-बाने बुनते-बुनते कभी इन्हीं अहसासों को शब्दों का जामा पहना कर बड़ी सुंदरता से प्रस्तुत किया है नारी के तस्वुर को "वसुधा" के प्रकाशक व सम्पादक श्रीमती स्नेह ठाकुर ने बड़ी खूबी के साथ प्रस्तुत किया है, पः ६७ नारी नारी मन आकाश से ऊँचा व पाताल से गहरा होता है यही सत्य है, क्योंकि नारी जन्मदात्री है, हर हाल में अपना आपा बनाये रखती है कारण कुछ भी हो। मेरी एक कविता "प्रदर्शन" का एक चित्र कुछ इसी तरह का है। पः २०३ दरिद्रता को ढाँपे और सच तो यही है, एक कण कविता का एक युग को ज़ायकेदार
बना सकता है, और भाव प्रकट करने का एक निर्मल माध्यम बन जाता। आनेवाली कई
पीढ़ियों तक औरत जाति के नाम के साथ अंजना
जी का नाम भी जुड़ा रहेगा। इल्म का दान उत्तम दान है, इसके द्वारा
विकास व प्रगति के कई नये रास्ते खुल जाते हैं, इस युग में वतन की मिट्टी
से दूर निवास करने वाली भारत के हर कोने में बसने वाली नारी, जो विदेश में
आ बसी है, इस "प्रवासिनी के बोल" में अपनी कलम की जुबानी अपने मन के भावों
को, अपने अन्दर पनपते अहसासों को जुबाँ दे पाई
है। पर अंजना जी ने इन्हें एक सूत्र में बाँध कर एक महिला संगठन को एक नई
रौशनी की नींव पर खड़ा किया है। इस आशावादी संकल्प
के बल पर प्रवासी कवयित्रियों की रचनाओं में, उनकी देश से दूर रहने की
वेदना, कुछ अमरीका की खट्टी -मीठी अनुभूतियाँ,
मन में उठती हर भावपूर्ण लहर को खुले मन से कविता द्वारा प्रकट करने के
लिये यह क्रियाशील प्रयास किया है। "रच गया एक इतिहास नया मेरी एक कविता "यादों का आकाश" यादों की दीवारों को खरोंच रहा है "मेरी यादों के
आकाश के नीचे डॉ. प्रियदर्शिनी का अनुभव जिंदगी के बारे में उनकी ज़ुबानी, पः ३५ "ज़िंदगी बीना टोडी "मेरा अस्तित्व" में मन को टटोल रही है, पः३१२ "करता है प्रश्न
अचानक मेरा मन अंजना संधीर के अपने अहसास कुछ यादों की परछाई बने हैं, पः ८४ "चलो "फिर गा उठी प्रवासी" की रचनाकार लावन्य शाह, का कोमल मन झूमता हुआ। पः ४१५ "पल पल जीवन
बीता जाए सारिका सक्सेना की कल्पना इन्द्रधनुषी रूप धारण करती हुई उड़ रही है, पः४६० "तितली बन मन
पँख पसारे मेरी अपनी एक आजाद कविता "सियासत" का अंग देश के जवानों को ललकार कर खून की लाली को चुनौती दे रहा है कुछ इस तरहः "ऐ जवानो ! तुम
बचालो रजनी भार्गव के कोमल मन के अछूते अहसास "अभिमान" से , पः ३७० "आँगन में
किलकती वीरानियाँ इला प्रसाद की जुबानी "यह अमेरिका है" पः १२१ रात भर चमकता रहा जुगनू इतने अनोखे अहसास, माध्यम कविता। इस नए संचार की श्रृंखला शुरू करके अंजना जी ने बहुत ही गौरवपूर्ण उदाहरण कायम किया है। विश्व कवि रवींद्रनाथ का कथन, बरसों बाद भी उसी सच्च का ऐलान कर रहा है। वे कहा करते थे कि शांतिकेतन का रचनाशील विद्यार्थी जहाँ कहीं भी जायेगा वहाँ एक छोटा भारत निर्मित करेगा। याद आ रहा है कालिदास का "मेघदूत" जो सालों पहले पढ़ा था, मेघ अर्थात बादल जो दूत बनकर संदेशा ले कर आते है। अंजनाजी का सफलतापूर्ण प्रयास कविता की जुबानी पूरब और पश्चिम के बीच का सेतू बनकर यही सरमाया देगा, और इसी नज़रिये से यह कहने में कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी कि उन्होंने अमेरिका में एक छोटा भारत निर्मित करने का सफल प्रयास किया है। कहा जाता है, हासिल की हुई कामयाबी अगर जग को अच्छी लगती
है पर अपने मन को नहीं भाती, तो वह अधूरी कामयाबी होती ह। र इस रचना को रचित
करने में योगदान देने वाली हर नारी इस कामयाबी का हिस्सा है, जैसे एक
परिपूर्ण परिवार का मिला जुला एक सफल यज्ञ है "प्रवासिनि के बोल"। नई
दिल्ली से डॉ॰ कमल किशोर गोयनका का कहना है " इस संकलन का सब से बड़ा कार्य
यह है कि इतनी प्रवासी हिंदी कवयित्रियाँ पहली बार हिँदी संसार के सम्मुख आ
रही हैं और इतनी प्रकार की अनुभूतियाँ हमें मिल रही हैं। मेरे विचार में यह
प्रयास स्तुत्य है, स्वागत के योग्य है।" इसी बात का समर्थन करते हुए मुझे
भी ऐसे लगता है, इस किताब पर हर नारी के हृदय से
निकले बोल "प्रवासिनी के बोल" के रूप में जी उठे हैं। इसी संदर्भ में, मैं
सारी नारी जाति की तरफ़ से अंजना जी को हार्दिक धन्यवाद देती हूँ, और
शुक्रगुजार हूँ जो मुझे भी अपने इस क्रियाशील अनुभव में अपने स्नेह के धागे
में पिरोकर सन्मानित किया है। -----देवी नागरानी |
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