सोच की सिलवटों से झाँक कर,
क्यों हुई है
बदगुमान यह नारी
देख कर उन बच्चों को
सोच रही है
शर्म छलकती है आँखों से
पर शर्म से है सोच प्रधान
कौन है इनका बाप?
पहला है या दूजा वाला
या कहीं वो तीसरा वाला
भविष्य बनके दोनों बच्चे
अतीत के अंकों में उलझाते हैं
जालसाजी का प्रलय ये कैसा?
जिसमें फँसी हुई यह नारी
अब तो बस शर्म की चुनरी से
वो अपने फटे आँचल को
ढाँप रही है।।