| अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली |
![]() |
मुख्य पृष्ठ |
| 11.26.2007 |
|
"है
यहाँ भी जल" -विजय सिंह नाहटा
देवी नागरानी |
![]()
विजय
सिंह नाहटा जी का प्रथम कविता संग्रह मेरे हाथ जब आया तो कुछ पल के
लिये मैं उस किताब को हाथों में लिए सोचती रही,
जाने
क्या?
पर
कुछ ऐसा उस कवर पेज के चित्र में संबोधित था,
जिसे
मेरी आँखें देख तो पा रही थी,
पर
पढ़ नहीं पा रही थी। स्याह स्याह श्यामल रंग,
उस पर
अंकित दो आँखें,
ऐसा
कहीं लगता भी था,
कहीं
भ्रम होने का इशारा भी मिलता था,
अन्तर
मन के अदृश्य कुछ अनदेखे दृश्य खुली आँखों के सामने न जाने किन तहों को
बे-परदा करते रहे। और जैसे ही मेरे भ्रम की पहली तह खुली आसमानी
अदृश्यता के इशारे,
कुछ
गहराइयों से झाँकती सच्चाइयों की झलकी सामने उस पन्ने पर नज़र आई जो
मेरे सामने खुला-
"
आत्मा-सा मंडराता हुआ"
'शब्द
जो दिखता प्रकट
शब्द
का आवरण होता सशरीर,
स्थूल
उसके
भीतर गहरे होता एक शब्द
चेतना
की तरह पसरा हुआ-
अदृश्य,
निराकार!!
शब्द
जो दिखता है
होती
झिलमिलाहट भीतर के शब्द की
शब्द
जो प्रकट ज्योति की तरह
उजास
है उस शब्द की
नहीं
आया जो कविता में
आत्मा-सा मंडराता हुआ,
हे
बार !"
प.३०
पल दो
पल के लिए खामोशी ने मेरी सोच के लब सी दिए,
सुन्न
निःशब्द! ऐसा कभी कभार
होता है,
जब
कोई साहित्य सिर्फ़ शब्द न होकर कुछ और होता है,
जो
अपने अंदर के सच के सामने अक्स बन कर खड़ा हो जाता है। ऐसी ही शिद्दत,
सुन्दरता,
संकल्प विजय जी की इस रचना में पाई इन अल्फाज़ों से झाँकती हुई।
अंतर्मन के सच का साक्षात्कार,
सच के
शब्दों में लिखा हुआ यह एक प्रयास ही नहीं,
एक
सफल दृष्टिकोण भी है जो इंसान को इस सच के आगाज़ के दायरे में लाकर
खड़ा करता है। जीवन पथ पर लक्ष्य के इर्द गिर्द यह दृष्टिकोण नक्षत्र
सा मंडराता हुआ नज़र आता है। एक ध्वनि गुंजित होती सुनायी पड़ रही है
जैसे उनके अपने शब्दों में
"
आत्मा
से बाहर निकल कर ख़ुद को सजाता हूँ"
शब्द
स्वरूप मोती मन को मोह के दाइरे में ला कर खड़ा कर देते हैं। गौतम
बुद्ध की जीवन गति भी बेताश होकर उस सच को तलाशती हुई घया पहुँची और
उन्हें मोक्ष का साक्षात्कार हुआ।
“सेल्फ
रीअलाइज़ेश”
मकसद है,
बाकी
सब पड़ाव है उस अदृश्य निराकार दृश्य के।
विजय
जी की कलम से सच धारा बन कर बहता चला जा रहा है। उनकी सोच प्रगतिशील है
और एक मार्गदर्शक भी। वो शब्दों का सहारा लेकर उस शब्द की ओर इशारा कर
रहे हैं जो इस रचना का आधार है- इस
शरीर में प्राण फूँकता है,
जो
अग्नि बनकर देह में ऊर्जा देता है। कविता रुपी देह के गर्भ से इस
प्रकाश का जन्म होना एक अभिव्यक्ति है,
जहाँ
शब्द शब्द न रहकर एक ध्वनि बन जाए और आत्मा सा मँडराता रहे। बहुत
मुबारक सोच है जो लक्ष्य को ध्येय मान कर शब्दों की उज्जवलता को कविता
में उजागर कर रही है। यहाँ मैं विजय जी के शब्दों में एक संदेश ख़ुद को
और सच की राह पर चलने वाले अध्यात्मिक उड़ान भरने वालों के आगे
प्रस्तुत कर रही हूँ। यह संदेश गीता का सार है,
और
ज्ञान का निचोड़ भी।
"मैं
कल सुबह
तुम्हारी याद को
इतिहास की तरह पढ़ूँगा।
प३१
और
आगे तो अनेक रहस्यों के द्वार खटखटाने का सिलसिला दिखाई पड़ रहा है,
जहाँ
नज़र पड़ती है,
शब्द
पढ़ कर आँख कुछ पल थम सी जाती है,
सोच
पर बल पड़ने लगते हैं कि कैसे यह रचनाकार अपनी रचना के ज़रिये हमें एक
ऐसी सृष्टी की सैर को ले चला है,
जहाँ
पाठक के सामने कुछ अनसुने,
कुछ
अनदेखे अन्तर के राज़ फाश होते जा रहे हैं।
अब आगे देखें कुछ और शब्दों का ताल-मेल,
उनकी
स्वच्छता के साथ!!
"
संभावनाओं की आहट से सुंदर
असम्भावनों की किसी मलिन-सी गली में
दिर्मूद से यकायक मिल बैठते हों बचपन के दोस्त!"
प१९
शब्द
थपकी देकर जगा रहे हैं,
संभावनाओं से दूर असम्भावानाओं के दायरे में एक संकरी गली से गुज़र कर
जिस साक्षात्कार की कल्पना का मुझे अहसास दिला गई,
तो
अनायास ये शब्द मेरी कलम से बह निकले:
"अब
रूह में उतरकर मोटी समेट देवी
दिल
सीप बन गया है और सोच भी खुली है।"
-स्वरचित
यह तो
मैं नहीं जानती की पढ़ने से जो आभास मेरे अंदर उठ रहे है वो बेशक
रूहानी सफर की ओर बखूबी संकेत कर रहे। आगे देखिये औए सुनिए शब्दों की
आवाज़ को:
"
जब
तुम न थीं
तो
प्रतीक्षा थी
अब
तुम हो
मैं
ढूंढता हूँ प्रतीक्षा को।
प.२१
शब्द
की गहराइयों में एक विरह भाव प्रतीत होता है,
जैसे
अपने आप से मिलने के लिए लेटा
हो कोई,
जीवित
चिता पर मरने के इंतिज़ार में। अपने आपको जानने,
पहचानने की,
और उस
सत्यता में विलीन होने की प्रतीक्षा ऐसी ही होती होगी जिसकी विजय जी को
तलाश है। बड़ी ही मुबारक तलाश है यह,
ज़हे
नसीब!!
"फिसलती
हुई रेत है जिंदगानी
तमाशा
है ये भी मगर चार दिन का।"
-स्वरचित
सफर
का सिलसिला एक और पड़ाव पर आकर ठहरना चाहता है कुछ पल,
सोच
में डूबा कि शब्द भी इतनी खूबसूरती से अपने होने का ऐलान कर सकते हैं।
"तुम्हारी
स्मृति अब एक रड़कती मुझमें
?
राख
के इस सोये ढेर में
ज्यों
दिपदिपाता एक अंगारा मद्धम
सोये
हुए चैतन्य में
लो
तुम अचानक देवता सी
जग गई
मुझमें
जगाती
अलख निरंजन!"
प. २४
अंतःकरण से आती हुई कोई आलौकिक आवाज़,
जैसे
कोई गूँज भंवर गुफा की गहराइयों से बुला रही हो,
अपने
पास-निद्रा में अनिद्रा का पैग़ाम लिए:
छन छन
छन छन
रुन
झुन रुन झुन
पायल
की झन्कार लिए !!
वाह!!! एक सुंदर चित्र सजीव सा खींचने का सफल प्रयास,
मन की
भावनाओं का सहारा लेकर कवि विजय की कलम इस सार्थक रवानी को लिये थिरकती
है जिसके लिये मैं उन्हें तहे दिल से शुभकामनाएँ देती हूँ। मन की आशा
बहुत कुछ पाकर भी कुछ और पाने की लालसा में निराशाओं को अपने आलिंगन
में भरने को तैयार है।
"घेरा
है मस्तियों ने तन्हाइयों को मेरी
महसूस
हो रहा है फ़िर भी कोई कमी है"
-स्वरचित
यादों
की सँकरी गली के घेराव में एक बवंडर उठ रहा है जहाँ साँस धधकती है जलती
चिता पर जीते जी लेटे उस इन्तज़ार में,
जहाँ
मौत के नाम पर आत्मा के अधर जलने लगे है,
उस
पनाह को पाने के लिये।
"जिंदगी
एक आह होती है
मौत
जिसकी पनाह होती है।"
-स्वरचित
हर
पन्ने पर शब्द निःशब्द करते चले जा रहे हैं और झूठ का एक एक आवरण सच
में तब्दील होता जा रहा है। जैसे:
"
समृति
गोया गिलहरी
काल
के उजाड़ सन्नाटे तले
फुदकती
इस
डाल से उस डाल!"
प.२२
एक
खालीपन का अहसास अपने भरपूर आभास के साथ फुदकता हुआ नज़र आ रहा है। जो
मैं महसूस कर रही हूँ,
जो
पदचाप शब्दों की मैं सुन रही हूँ,
जो
अक्स मैं इन शब्दों के आईने में देख रही हूँ,
ज़रूरी नहीं कोई मुझसे शामिल राय हो।
कवि जब लिखता है तो उस समय उसके मन की स्थिति,
उसके
भाव,
उसके
हृदय की वेदना,
विरह
की अवस्थिति,
मिलने
की आशा,
निराशाओं की जकड़न उसके सामने सोच बनकर आ जाती है,
और
लिखते लिखते वो कहीं न कहीं उस छटपटाहट को छुपाने या दर्शाने में
कामयाब हो जाता है,
यही
एक लिखने की सफल कोशिश है जो अनबुझी प्यास को लेकर सहरा में भटकते हुए
एक कवि,
एक
शायर,
एक
लेखक,
शिल्पकार,
एवं
एक कलाकार को अपनी रचना को सजीव
करने का वरदान देती है।
"सुनसान
जब हो बस्तियां,
रहती
वहाँ तन्हाइयाँ
अब
मैं जहाँ पर हूँ बसी,
संग
में रहे परछाइयाँ"
-स्वरचित
अरे
ये क्या सामने ही लिखा है?
"
क्षण
वह लौट नहीं आएगा
मौन
तोड़ता हुआ फुसफुसाएगा।"
प.२३
लगता
है तन्हाइयाँ बोल रही हैं। वक्त फिसलती हुई रेत की तरह जा रहा है और
हमारी बेबसी उसे देखे जा रही है जिसका इशारा इस शेर में बखूबी झलक रहा
है:
"
नहीं
बाँध पाया है कोई समय को
न
देखा कभी हमने ऐसा करिश्मा।"
-स्वरचित
विजय
जी की हर पंक्ति अपने आप में एक जुबां है,
मौन
तोड़ती हुई,
फुसफुसाती हुई। बस उन खामोशियों को सुनने वाले कानों की ज़रूरत है।
"गुफ्तगू
हमसे वो करे ऐसे
खामोशी के लब खुले जैसे।" -स्वरचित
बस
अहसास जिंदा हो,
शब्द
अपने आप बोलने लगते हैं,
कभी
तो शिद्दत के साथ चीखने भी लगते हैं। ऐसी ही इस सुंदर रचनात्मक अनुभूति
के रचयिता श्री विजय जी ने बड़े अनोखे ढंग से अपने अंदर के लहलहाते
भावों के सागर को,
शब्दों का सहारा लेकर अलौकिक रूप से व्यक्त किया है।
कभी किसी कड़वाहट को पीने की घुटन के बाद,
कभी
इंतज़ार के बाद थकी थकी सी आँखों की पथराहट की ज़ुबानी,
कहीं
आकुल तड़प की चट्टान
बैठी उस विरहन की जुबानी,
तो
कहीं सहरा की तपती रेत पर चलते चलते पाँव के छालों की परवाह किए बिन ही
पथिक जिस पथ पर अपने ही वजूद की तलाश में भटक रहा है -उस आत्मीय मिलन
की प्यास लिए हुए-इन सभी अहसासों
को शब्दों की सरिता स्वरूप पेश
करने की सफल कोशिश की है। ज़िंदगी का एक सिरा अपनी अनंत यात्रा
की ओर बढ़ते हुए दूसरे सिरे को टटोलने लगता है तो विजय जी के शब्दों
में:
"
मृत्य
अलार्म घड़ी है,
पर
जिसकी चाब्बी हम नहीं
लगाते
हमें
जगह कर पकडा देगी
दूसरी
यात्रा की गाड़ी। "
प ७०
इस
पुस्तक के हर शब्द को पढ़ते हुए,
उसे
समझने,
समझकर
पचाने की कोशिश में मेरी अपनी सोच लिखने के धारा को रोक नहीं पा रही
है। इस प्रयास में कहीं एक और किताब ही न बन जाए इसी डर से अनुमति लेने
के लिए सिमटाव की मेरी इस कोशिश में कुछ शेर मौत की ओर इशारा करते हुए
पेश हैं।
"
मौत
का मौसम न कोई,
न ही
इसका वक्त है
ये
चुराकर रूह को ले जाए है जाने कहाँ।"
गुज़ारी ज़िंदगी बेहोश होकर मैंने दुनियाँ में
मेरा
विश्वास सदियों से न जाने किस गुमाँ पर था।?
कोई
गया जहाँ से तो आ गया कोई
लेकर
नया वो इक बदन या मेरे खुदा। "
देवी
है दरिया आग का दिल में मेरे रवां
महसूस
कर रही हूँ जलन या मेरे खुदा।"
बस इस अहसास भरे शब्दों के गुलदस्ते ने अपनी महक को मेरे अंतर्मन को निःशब्द कर दिया है। बाकी बातें मौन में होती रहेंगी। एक बार विजय जी को इस अनोखे, अद्भुत अनुभूति काव्य संकलन को प्रस्तुत करने के लिए मुबारकबाद है। |
| अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें
|