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| 05.03.2012 |
| मैं खुशी से रही बेख़बर देवी नागरानी |
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मैं खुशी से रही बेख़बर ग़म के आँगन में था मेरा घर। रक्स करती थी खुशियाँ अभी ग़म उन्हें ले गया लूटकर। आशना ढूँढते ढूँढते खोया मैंने तो अपना ही घर। गुफ़तगू जिनसे होती रही उनको देखा नहीं आँख भर। दिल की चाहत को चोटें लगी कैसे बिखरी है वो टूटकर। कैसे परवाज देवी करे नोचे सय्याद ने उसके पर। |
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