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| 03.23.2008 |
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मैं दिवाली हूँ देवी नागरानी |
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“दिवाली
मुबारक हो”,
फोन
की घंटी बजते ही ज्यूँ उसे उठाया तो यही स्वर सुनाई दिया। सोचती रही
कौन है जो मुझे जानती है,
अपनापन भी है,
पर
अपना परिचय दिए बिना यूँ!!!
“अरे
आपको भी दिवाली मुबारक”,
उलझन से घिरे लहजे कह दिया। मस्तिष्क पर जोर देने के बाद भी ये नहीं
समझ पायी की मैं किस के साथ बात कर रही हूँ। बस कह दिया।
“
पहचाना या अभी भी नहीं पहचाना?”
“कोशिश
कर रही हूँ पर नाकामयाबी मिल रही है,
अब
तुम्ही बता दो।”
“मैं
दीवाली हूँ,
मुँह
मीठा करने आई हूँ ।”
“अरे
आप अपना मुँह खोलिए और ये लीजिये लड्डू ........!!”
मैंने फिर हल्के से अंदाज़ में कह दिया और पूछा
“
कैसा
रहा लड्डू का जाइका?”
“
बहुत
बढ़िया! चलो आपकी कुछ मदद कर देती हूँ,
हम कल
मिलेंगे।”
“
कल
मिलेंगे और आज मुझे मालूम नहीं। अब उलझन को ख़त्म भी कर दो”
मैंने थकान से बाहर आने के लिए यही ठीक समझ कर उससे कहा।
“बताऊँगी
पर एक शर्त पर,
पैसे
देने पड़ेंगे।”
“भई
लड्डू से मुँह मीठा तो करवा दिया अब ऊपर से आपको पैसे भी देने होंगे
......”
मैं सोच कर शर्मिंदा होती रही की आज क्यों में इतनी अनजान बनी हूँ इस
जानी पहचानी आवाज़ से।
“ज्यादा
नहीं एक डॉलर लूँगी। मैं बिंदु,
बिन्देश्वरी अग्रवाल हूँ। कैसी हैं आप देवीजी?”
“अब
ठीक हूँ। ये दिवाली भी खूब याद रहेगी मुझे बिन्दु जी अब याद आया कि कल
हमें सरिता मेहता के द्वारा आयोजित किये हुए बहुभाषी कवि समेलन में
जाना है।”
ये थी
न्यू यार्क की हमारी हास्य कवियित्री बिंदु अग्रवाल जो मज़ाकिया कविता
कहते कहते मंच पर तो सभी को हँसा देती है पर आज फोन पर मुझे यूँ हँसाने
की बजाय उलझनों के घेराव में डाल दिया कि मैं उलझन से बाहर आने के लिए
अपने आप से झूझती रही। गुफ्तगू का जाइका दीवाली के लड्डुओं से ज्यादा
मज़ेदार रहा या कम इस हकीकत से मुझे वाकिफ़ ज़रूर कीजियेगा।
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