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| 12.06.2008 |
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मासूम सिसकियाँ - एक सच्ची वार्ता |
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"माँ
तुम भैया को लेकर कब आओगी?
जल्दी आओ ना!”
नन्हीं सी तीन साल की उम्र की वो नन्हीं सी कली प्लास्टिक के फ़ोन पर कहे
जा रही है। हाँ ! वह प्राची है।
और नील नम
आँखों से शून्यता के उस पार देख रहा है जहाँ उसे अपना अस्तित्व,
अपने आस पास का घर-संसार और उसमें बसने वाले लोग एक स्वप्न से लग रहे हैं।
सिर्फ़ हक़ीक़त के रूप में प्राची का लगातार फ़ोन पर बात का सिलसिला जो अपनी
माँ को बार-बार
आवाज़ देती रही,
वही उसे हक़ीक़त की दुनिया में ला रही है। सुनने वाला दर्द को जानता है,
पहचानता है,
पर
ला-दवा उस दर्द को आँसुओं के साथ पी जाना अब उसके बस में नहीं।
“पापा
माँ को हस्पताल से ले आओ ना। मुझे माँ पास जाना है पापा..पा..”
और
उसकी आवाज़ सुबकती सिसकियों की धारा बनकर आस पास के गूँजती रही पल पल,
हर
पल। आज चौथा दिन था,
पर
नील और उसके माता-पिता ख़ुद को असमर्थ पा रहे है उस नन्हीं जान को यह बताते
हुए कि स्नेहिल उसकी माँ अब नहीं रही। वह हर बन्धन की डोर को तोड़ कर चली गई
है और अपने पीछे छोड़ गई है एक बिलखता हुआ क्रंदन!!!
कितने खुश
थे वो दोनों- नील और स्नेहिल सबके साथ अपने घर संसार में। प्राची उनकी
बगिया की पहली कली,
जिसको साढ़े तीन साल से अपने आँचल की ठंडी छाँव में प्यार से सींचा,
पाला और महकने का मौका दिया।
"प्राची
अपने भाई को अगले साल राखी बाँधेगी ना?”
कहती हुई स्नेहिल खुशी से विभोर हो उठती थी। बस अब नौ महीने पूरे होने को
थे और उन्हें पता था की आने वाला नव महमान लड़का है। एक सम्पूर्ण परिवार का
स्वप्न और अपने आने वाले भविष्य से अनजान वो खुशी के सागर पिए जाते थे,
सपनों के नए जाल बुनते जाते थे। ड्यू डेट जुलाई २५ या २६ की मिली हुई थी,
पर
२३ तारिख को घर में तहलका सा मचा हुआ था। स्नेहिल बिन-जल मछली की तरह मचल
रही थी,
परिवार के सभी लोग उसे सहलाने की,
पुचकारने की कोशिश में लगे थे। हस्पताल फ़ोन लगाया,
गाड़ी स्टार्ट हुई और स्नेहिल की ज़िंदगी की रफ़्तार गाड़ी की रफ़्तार से
मेल-जोल न खाकर हिचकोले खाने लगी। पिछली सीट पर बेचैनियों से घिरी स्नेहिल
को बीच राह में छाती में दर्द का अहसास हुआ,
पर
नील की माता जी को लगा कि वो प्रसव पीड़ा का अंश है,
सो
सहलाते पुचकारते हस्पताल पहुँचे,
जहाँ वह तुरंत डाक्टरों के हवाले कर दी गई,
जहाँ उसे अब आइ.सी.यू. में ऑक्सीजन दिया जा रहा था। बस कुछ पलों में दुखद
समाचार देते हुए डाक्टर ने समझाया,
“कार
में उसे जो घुटन हो रही थी,
वो लंग्स
में ब्लाक आने के कारण थी और बच्चा उसी वक्त ऑक्सीजन न मिलने के कारण श्वास
न ले पाया और.....!!!"
नील के
पिता जो ख़ुद एक बहुत ही बड़े पद पर नियुक्त एक तजुर्बेकार डॉक्टर थे,
सूचना पाते ही कुछ समझकर,
तुरंत आठ दस डॉक्टर की टीम मँगाई,
एक
हेलीकॉप्टर को भी एमरजेंसी के लिए तैयार रखवा लिया। अब सभी डॉक्टर स्नेहिल
को बचाने की कोशिश में जुट गए सभी। शायद किसी हस्पताल ले जाना पड़े स्नेहिल
को,
यही सोच
कर सब तैयारियाँ हुई।
"पिताजी,
माँ को लेकर आप जल्दी आइये,
स्नेहिल......”
और भारी आवाज़ में नील ने स्नेहिल के माता-पिता को शिशु के दुखद समाचार के
बारे में बताते हुए परिस्थिति से अवगत कराया। वे कैलिफोर्निया में थे और
जल्द से जल्द जो फ्लाईट उन्हें मिली उसे लेकर न्यू यार्क के लिए रवाना हुए।
आकुल व्याकुल मन मयूर नाना-नानी बनने के सुनहरे स्वप्न जो बुन चुके थे वे
वहीं के वहीं बस निराशा के ढेर बनकर टूटकर बिखरते रहे।
"भगवान्
करे स्नेही यह सदमा बर्दाश्त कर पाये और सँभल जाए ताकि वह अपनी प्राची को
भरपूर प्यार के साथ सँभाल
सके।“
यह प्राची की माँ की फुसफुसाती आवाज़ थी जो शायद भगवान् के कानों तक नहीं
पहुँची।
स्नेहिल
ख़ुद एक रीसर्च साइंटिस्ट थी और ३७ साल की उम्र में जो नाम और शोहरत उसने
पाई वह पूरे परिवार के लिए गर्व की बात थी। पिता और ससुर दोनों डॉक्टर,
नील कंप्यूटर प्रोफ़ेशन का उच्च अधिकारी रहा। घर का माहौल सदा ही खुशियों से
महकता रहा और प्राची की तोतली आवाजें और आने वाले बालक की सुखद किलकारियों
के आगमन की आशा से सभी बहुत खुश थे और अब...!!
"माँ
का गर्भाशय निकालना पड़ा। जो नाल माँ और बच्चे को जोड़ती रही वह टूट गई और
खतरे का कोई अंश बाकी न रहे इसलिए यह कदम ज़रूरी था”,
कहते हुए डॉक्टर ललित फिर थियेटर में वापस चले गये। ज़िंदगी और मौत के झूले
में झूल रही थी स्नेहिल और उसके साथ जुड़ी सब की आशाएँ और नील साक्षी बना
खड़ा है,
चिंतन के
धुँध में घिरा हुआ,
सिर्फ़ आवाजें,
आवाजें और उनकी गूँज थी आसपास।
"मैं
भी चलूँगी आपके साथ”,
प्राची माँ का पल्लू पकड़ कर कह रही थी। "पापा मुझे भी ले चलो,
मैं माँ के साथ जाऊँगी।”
जब घर से
निकल रहे थे तब स्नेहिल ने पुचकारते हुए अपनी जान प्राची से कहा
“बेटा
तुम यहीं रहो घर पर,
मैं हस्पताल से तुम्हारे भाई को ले आऊँगी।”
और अब
प्राची का सामना कैसे होगा?
स्नेहिल को कैसे सँभाल पाऊँगा?
उसके खाली दामन को किस आस से भर पाऊँगा?
उलझनों का
ताँता और नम आँखों में तैरती हुई यादों की परछाइयाँ
दिल की दहलीज़ पर रुककर भी नहीं रुकी। पत्थरों को शायद किसी ने रोते
हुए नहीं देखा है,
पर
सच मानो उनमें भी धड़कन होती है पर वे ख़ामोशिओं से हर सदमे को झेलते
हैं....!
नील की
सोच के सिलसिले को पिता के स्नेहिल छुहाव ने पुचकारा। बेटे के दर्द को,
उसके अरमानों के घात को समझ पा रहा था वह,
पर
मजबूर था। डॉक्टर था,
समझ रहा था,
जो
कभी किताब के पन्नों में पढ़ा,
आज
ज़ामिन बन कर वही केस उसकी बहू स्नेहिल पर पूरा उतर रहा है रफ़्ता-रफ़्ता।
"बेटा
ऐसा आजतक नहीं सुना है,
और
न देखा है कि लंग्स के ब्लाक की वजह से शिशु को और माँ को जान से हाथ धोना
पड़ता है,
पर
पुस्तकों में पढ़ा है। अब दुआएँ करो कि हमारी स्नेहिल को कुछ न हो!!”
कहते हुए पिता फिर से थयेटर में अंदर चले गए,
जहाँ अभी अभी डॉ. ललित गए।
नील
चौकन्ना हो गया। पिताजी यह क्या कह रहे हैं?
और
उसे एहसास होने लगा उस बेबसी का जो एक लहूलुहान छटपटाहट सी सिहरन बनकर उसके
सीने के हर कोण में समा गई।
इतने सारे डॉक्टर मिलकर भी कुछ नहीं कर पा रहे थे,
स्नेहिल को बचाने की हर मुमकिन कोशिश नाकाम हुई। हाथ जो दुआओं के दर पर उठ
रहे थे अब छाती पीट रहे थे। आशा का दामन थाम कर इन्सान रेत पर घरौंदे बनाता
है,
उन्हें
सँवारता है,
और फिर जब
उन्हें बिखरता हुआ देखता है तो सहरा की तपती धूप सी जलन तड़प बन कर उसकी
आत्मा के अधर को भी जला देती है। उससे भी ज्यादा पीड़ा दायक रेगिस्तान के
बीचों बीच रेत के ढेर पर बनाया हुआ आशियाँ एक ऐसे टीले की तरह होता है,
जो
डह तो जाता है पर मुट्ठी की पकड़ में नहीं आता। यही बेबसी की चरम सीमा है।
आशाओं का दामन हाथ से छूटता चला जाता है,
उम्मीदों की सभी किरणें जाने कहाँ लुप्त हो जाती है,
और चारों
तरफ़ से घेर लेता है मायूसी का अँधेरा। यही हालत थी उस वक्त नील और उसके
माता-पिता की।
"बेटे
तुम माँ को लेकर घर जाओ और प्राची को जाकर सँभालो,
मैं एअरपोर्ट से तुम्हारे सास-ससुर को लेकर घर आता हूँ।”
नील के पिता ने उसे सहलाते हुए कहा। दर्द का सैलाब जब जब बहता है तो न जाने
क्या-क्या डूब जाता है। इन्तिहाये-ग़म अपना चलन नहीं बदलता,
हाँ रुख ज़रूर बदल कर बस रुलाता चला जाता है। इस हक़ीक़त को कोई झुठला नहीं
सकता कि ज़िंदगी का अंत मौत है,
पर
ऐसा कठोर उसका मंज़र,
उफ़!! देखने पर तो पत्थर भी रो
पड़े,
दर्द भी
सिसकियाँ लेता रहे।
जब प्राची
के नाना-नानी आए तो लोगों का जमघट देखा। यह तो पता था शिशु नहीं रहा,
पर
देर न लगी यह जानने में कि किस बुरी तरह से जिंदगी ने उनके साथ छल करके
उन्हें बुरी तरह से पछाड़ दिया है,
आगे पाँव
धरते ही जो मंज़र आँखों को दिखा....
कास्केट
में माँ-स्वरूप स्नेहिल शांत चित सजी-धजी दुल्हनी वेश भूषा से और उसकी गोद
में उसका शिशु जो ममता के बिना जी नहीं पाया,
दोनों एक निश्चिंत निद्रा की गोद में विश्राम से लेटे थे। दिल को दहलाने
वाला यह दृश्य हर सीने पर एक छाप छोड़ गया और आज दस दिन के बाद भी जब एक
छटपटाहट मन को झिंझोड़ रही है तो कलम उठाकर अपनी पीड़ा से राहत पाने के लिए
दर्द की परिभाषा की गहराइयों में झाँकने की फिर से कोशिश कर रही हूँ,
जिससे आमना-सामना न जाने कितनी बार होता रहा है। कभी मुझे रुलाने में वो
कामयाब रहती है,
कभी तो खुद भी इस मानव मन की पीड़ा से परेशां होकर सिसकने लगती है।
“भगवान्
मेरी ही बेटी की जीवन डोर क्यों काट दी”,
यह
क्रंदन स्नेहिल की माँ का था जो वहीं पर बैठी अब अपनी बेटी की छाती पर सोये
शिशु को सहलाते हुए अपने ज़ख्म कुरेदने लगी। आज फ़ोन से पता किया, यही जाना कैसे प्राची आज भी खिलौने वाले फ़ोन से अपनी माँ को आवाज़ दे रही है, बुला रही है। उसे कौन यह समझाए की ज़िंदगी को छीनने वाली मौत उसकी माँ और भाई को उससे दूर, बहुत दूर ले गई है, जहाँ सिर्फ जाने की राह खुलती है, लौट आने की नहीं। वह तो इंतज़ार में अब भी आस लगाये कह रही है- "माँ भैया को लेकर जल्दी घर आओ, माँ आ जाओ, आओ...माँ..!!!" |
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