| अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली |
![]() |
मुख्य पृष्ठ |
| 05.21.2007 |
| ख़लिश से गुज़रते रहे जो देवी नागरानी |
|
ख़लिश से उमर भर गुज़रते जो आए उन्हें अन्त वेले सुमन क्यों सजाए।। सदा नफ़रतों के चुभे ख़ार जिनको, उन्हें प्यार कर क्यों है खुद को रुलाए।। इतना सजाओ न फूलों से मुझको कली के नयन की नमी भीग जाए।। न आँसू न आहें कभी राह मेरी न मर्जी से अपनी कभी रोक पाए।। सहारे बिना भी न उठा जनाजा, सहारा दिया कल जिन्हें, वो उठाए।। दिया मान अपमान जो भी ऐ देवी! वही अंत में संग अपने ही जाए।। |
| अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें
|