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05.11.2014


सिन्धी कहानी

जेल की डायरी

मूल लेखिका :  वीना शिरंगी
अनुवाद : देवी नागरानी

नाम: वीणा शिरंगी
जन्म: 16 फरवरी 1948, बी.ए, (पोलिटिक्ल साईंस)
पिता का नाम: महाराज गोपी कृष्ण,-लरकाना सिन्ध)
माता का नाम: सती देवी (कराची से कांग्रेस कार्यकर्ता और समाजसेवक)
संप्रति: लेखक प्रसारक (आल इंडिया रेडियो एक्स्टर्नल सर्विसिज़ डिविज़न, नई दिल्ली
केंद्री साहित्य अकादमी मं सिंधी एडवाइज़री बोर्ड की सदस्या
देहली सिंधी अकादमी और एनसीपीएसएल (नेशनल काउंसिल फ़ॉर प्रोमोशन ऑफ़ सिंधी लैंगुएज) की भूतपूर्व सदस्या
सिंधी में दो पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, सिंधी ज्योत देहली की अतिथि संपादिका, २० से अधिक पुस्तकों का लेखन

नुवाद: देवी नागरानी
जन्म: 1941 कराची, सिंध (पाकिस्तान), 8 ग़ज़ल-व काव्य-संग्रह, एक अंग्रेज़ी, 2 भजन-संग्रह, 2 अनुदित कहानी-संग्रह प्रकाशित। सिंधी, हिन्दी, तथा अंग्रेज़ी में समान अधिकार लेखन, हिन्दी- सिंधी में परस्पर अनुवाद। राष्ट्रीय व अंतराष्ट्रीय संस्थाओं में सम्मानित , न्यू जर्सी, न्यू यॉर्क, ओस्लो, तमिलनाडू अकादमी व अन्य संस्थाओं से सम्मानित। महाराष्ट्र साहित्य अकादमी से सम्मानित / राष्ट्रीय सिंधी विकास परिषद से पुरस्कृत
संपर्क 9-डी, कार्नर व्यू सोसाइटी, 15/33 रोड, बांद्रा, मुम्बई 400050॰ फोन:9987928358


सुबह-सुबह चाय का प्याला अभी लबों तक लाया ही था कि मेरी नज़र अख़बार में छपी एक ख़बर पर अटक गई।

‘जेल में नज़रबन्द क़ातिल औरत की आत्महत्या।’

आज की क़ौमी अख़बार में यह ख़बर सुर्खी से छपी हुई थी। मेरी सोच परिंदों की तरह परवाज़ करते माज़ी के पन्ने पलटने लगी। यह कोई सदियों पुरानी बात नहीं थी, क़ौमी अख़बार में छपी सनसनी ख़बर के साथ दो तस्वीरें भी प्रकाशित हुईं थी। एक तरफ़ दो लाशों की तस्वीर थी तो दूसरी तरफ़ क़ातिल औरत की। देवी के रूप में चांडाल, जिसने अपनी मासूम बेटी और पति का बेदर्दी से क़त्ल किया, जिसने अपने जिगर के टुकड़े को भी नहीं बख़्शा। औरत नहीं डायन ही थी जो नन्ही मासूम बच्ची को खा गई।

वह पढ़ी-लिखी पुर कशिश शख़्सियत की मालिकन थी। कोर्ट में उसे देखने के लिए लोगों के हुजूम इकट्ठे हो जाते थे। विभिन्न अख़बारों में उसकी ज़िन्दगी के अलग-अलग पहलुओं पर कोई न कोई ख़बर छपती रहती थी। इस केस के फ़ैसले का न सिर्फ़ मुझे, पर और बहुत सारे लोगों को बेचैनी से इन्तज़ार था। जब इन्साफ़ की तराज़ू में शोख़ हसीना की खौफ़नाक दिल दहलाने वाली करतूतों को कार्यवाई द्वारा तोला गया तो इन्साफ़ की तराज़ू का पलड़ा सरकारी वकीलों और गवाहों के बयानों से गुनहगार औरत के माज़ी पर अंकित उसकी क़ाबिलियत और गुणों की तुलना में भारी साबित हुआ। अदालत ने उस नाज़नीन को दिल दहलाने वाली मौत की कड़ी सज़ा सुनाई।

इन्साफ़ का मज़बूत हाथ उस तक पहुँचे, उसके पहले उसने क़ानून के चेहरे पर ज़ोरदार तमाचा मारा। अपना अन्त लाकर उसने अदालत के इन्साफ़ को शिकस्त दी। आत्महत्या कर ली उसने!!

उसे क़त्ल के इलज़ाम में जब घर से गिरफ़्तार किया गया था, तो उसने पुलिस की ओर से लगाए इल्ज़ाम को खुशी से क़बूल किया था। उसके ऊपर चल रही कार्रवाई का हाल और दलीलें सुनकर बदन सिहर उठता था। एक रात जब उसका जीवनसाथी नींद के आगोश में सोया था, तब इस खूबसूरत नागिन ने उस पर हथौड़े से वार करके, न सिर्फ़ उसे बदसूरत बनाया पर वार पर वार करके उसके दिमाग़ का भेजा ही निकाल दिया और फिर अपनी मासूम बेटी का गला घोंटकर उसे हमेशा के लिये गहरी नींद में सुला दिया। ममता के झूले में लोरी देकर सुलाने की बजाय काल के फ़ौलादी बाहों में धकेल दिया। जिसने भी देखा, सुना उसे कुछ यूँ सिहरन हुई जैसे बिजली के तार ने छू लिया हो।

उसने अदालत के सामने अपने जुर्म को गर्व के साथ क़बूल किया, चेहरे पर मलाल की जगह ऐसी मुस्कान थी जैसे फ़तह पाई हो। सज़ा सुनने के बाद उसने अपनी नाज़ुक ख़ूबसूरत बाहें फैलाकर मज़बूत लोहे की ज़ंजीरों का स्वागत किया।

आस-पास रहने वालों के मुताबिक़, उसका पति एक शानदार नौजवान था, नशीली निगाहों वाला, क़दावर, गठीला, मिलनसार और हमदर्द इन्सान था। जहाँ से गुज़रता था, वहाँ पर मायूस ज़िन्दगी पर बहार छा जाती थी। मुरझाए चेहरों पर जवानी का रंग ज़ाहिर हो जाता। परवाने शम्अ पर फ़िदा होकर अपनी जान निसार करते हैं, पर इसके मामले में गंगा उलटी बहती थी। आलीशान बंगला, ऐश-इशरत का हर सामान उसे उपलब्ध हुआ। धन की देवी लक्ष्मी जैसे उस पर मेहरबान थी। ऐेसे शहज़ादे तुल्य जवान के क़त्ल पर हर किसी के दिल से घुटी हुई चीख़ निकल रही थी। लबों पर एक आह थी... कौन-सा राज़ था, जो क़ातिल औरत नहीं सुनाना चाह रही? कई सवाल उठे पर उन सवालों का एक भी मुनासिब जवाब किसी को नहीं मिला।

क़ातिल औरत के क़बूल किए हुए जुर्म के कारण कोर्ट की कार्यवाही भी जल्द पूरी हो गई। लोगों और अख़बारों के लिये यह क़त्ल रहस्यमय बना रहा। उस औरत की न तो कोई ननन्द थी, न ही सास, न ससुर। संयुक्त परिवार के झंझट से आज़ाद, अकेली ही ऐशो-आराम की ज़िन्दगी बसर कर रही थी। वह अब तक एक ही बात पर अड़ी रही, ‘ख़ून मैंने किया है।’

जेल में नज़रबन्द क़ातिल औरत के आपघात की ख़बर के साथ यह भी जानकारी मिली कि लाश के साथ एक डाइरी भी मिली है, जो उसने जेल के अधिकारी को कहकर मंगावाई थी। डाइरी के पन्ने जब पलटे गये तो उन पन्नों पर कुछ लफ़्ज और जुमले दर्ज थे!

"खूबसूरत..., प्यार की गरमाइश..., वादा..., वफ़ा..., मक्कार उस रात तुमने मेरी बहुत तारीफ़ की.. मैं आकाश में आज़ाद पंछी की तरह उड़ रही थी जब तुमने कहा मैं परी लग रही हूँ। जन्नत की हूर..., फ़ासले घटने लगे..., साँसों की गरमी..., जज़्बात का सैलाब..., प्यार के सागर में तहलका..., तुमने कहा ख़ुद को अर्पण कर दो? आज क्यों~? मैंने तो हर पल..., हर घड़ी तुम्हारे नाम कर दी है....!"

"यादगार लम्हा..., वह रात क़यामत की रात बनी..., मैं..., वह और... एक और जिस्म..., दूसरा मर्द..., तुम्हारा दोस्त..., तुमने तनहाई को साथी बनाया... और मैंने... !"

मेरा वजूद हिल गया।

सुहानी चाँदनी रात..., जिसने उस रात चाँदनी को गुनाह की चादर ओढ़ा दी... हवस के ग्रहण को निगल गई... मेरे लिये चाँदनी रात..., अँधेरी रात बनी..., नई सुबह की नई किरण मेरे लिये तबाही की सुबह..., मैंने अपनी ज़िन्दगी का मातम मनाया। तुमने कहा तुम मेरे हो... तुम... मेरे दिल की धड़कन हो...!

पर मेरे दिल की धड़कन में एक और दिल की धड़कन समा गई है, पल पल मेरे लिये अज़ाब बन गया है।

तुमने हैवान जीव आत्मा को संसार की रोशनी देखने दी, मैं तुम दोनो को साँसों में सजाऊँगी।

मेरे लिये हर लम्हा अज़ाब बन गया, मेरे खून से एक और खून का मिलन..., संभोग..., एक और जिस्म का वजूद अज़ाब सहने के लिये...।

ज़िन्दगी...

वक़्त के साथ...
दौड़ की होड़ में लगी है...

उम्र के इस कुरुक्षेत्र में... किया... किससे तुमने... !

आज एक और भयानक रात थी। मेरे आँखों के सामने माज़ी की उस क़यामत वाली रात को ज़िन्दा कर दिया, जब मैंने तुमको किसी अजनबी शख़्स से बात करते सुना।

अजनबी और तुम... कल की रात तुम्हारे लिये रंगीन रात होगी। तुमने मुझे प्यार की ज़ंजीरों में कैद ज़रूर किया था... पर मेरे ज़मीर की आवाज़ ज़िन्दा थी... तुमने मेरे लिये जिस क़यामत वाली रात को दावत दी थी, उसी की स्याह चादर में मैंने तुमको लपेटने का फ़ैसला किया। फ़ैसला आसान न था, पर अपनी रूह के सौदे के सामने तुम्हारे प्यार का पलड़ा हलका ही रहा...। तुम्हारी धन-दौलत के राज़ की मुझे जानकारी न थी..., आज उस राज़ को राज़ ही रखना चाहती हूँ..., मैंने अपनी रूह को तुम्हारी जंज़ीरों से आज़ाद करके राहत पानी नहीं चाही..., मैंने जब तुम्हें ख़्वाबों की दुनिया में सोया हुआ देखा.... मैंने चाहा कि तुम उन ख्वाबों की दुनिया में हमेशा... हमेशा...!

ठहाकों की गूँज...

तुम्हारे लिये लक्ष्मी की झन्कार और रंगीन रात...

ठहाकों की गूँज... लक्ष्मी की झन्कार के शब्द प्रतिध्वनित होकर गूँजने लगे...

वह रात गुज़ारनी मेरे लिये मुश्किल हो गई... मेरे लिये पल-पल सदी बन गया...। कल की रंगीन रात के दीपक की बाती सरकाने से पहले मैंने वो बाती सरकाने की कोशिश की..., तुम्हारा चेहरा बेनक़ाब हो चुका था..., तुम्हारी अमीरी का राज़..., पुरकशिश शख़्सियत के पीछे मक्कार चेहरा..।

मैंने तेरे जिस्म के पिंजरे से तेरी रूह को आज़ाद कर दिया।

मैं बहुत रोई..., तेरे लिये नहीं, पर उस मासूम रूह को आज़ाद करते वक़्त..., जो मुझे वक़्त-वक़्त पर उस क़यामत वाली गुनाह की काली रात का अहसास कराती थी..., माज़ी की वह रात और आज की रात की तारीख़ एक ही है...।

संसार के इस कुरुक्षेत्र के ज्वार में आज मैंने ज़िन्दगी को शिकस्त दी है।

उसके चेहरे पर ताज़गी और सुकून था।


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