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| 12.30.2007 |
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ग़ज़ल क्या,
कब,
क्यों और कैसे?
एक परिचयः तीसरा भाग देवी नागरानी |
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आर.पी शर्मा महर्षि को "पिंगलाचार्य" की उपाधि
गुफ्तगू (जनवरी-मार्च २००५)में अदबी खबरों
के अंतरगत उनके सुपुत्र डा॰ रमाकांत शर्मा द्वारा पेश की गई
उपाधि की सूचना काव्य शोध संस्थान द्वारा हिंदी भवन,
नई
दिल्ली में। मुंबई के प्रख़्यात ग़ज़ल शिल्पकार और ग़ज़लकार श्री आर।पी
शर्मा
‘महरिष’
को
माननीय श्री विष्णु प्रभाकर और श्री कमलेश्वर के हाथों "पिंगलाचार्य"
की उपाधि से विभूषित किया गया। इस अवसर पर उन्हें काव्य शोध संस्थान ने
शाल और मनमोहन गोसाई जी की पावन स्मृति में ११००० हजा़र रुपये देकर
पुरस्कृत किया गया। समारोह में डा॰ सादिक,
डा॰
कमाल सिद्दिकी,
शिव
कुमार मिश्र तथा मख़मूर सईदी सहित हिंदी और ऊर्दू साहित्य के जाने माने
साहित्यकार उपस्थित थे।
ग़ज़ल क्या,
कब,
क्यों और कैसे?
प्रश्न : ग़ज़ल कहाँ और कैसे अस्तित्व में आई?
उत्तर
: बादशाहों,
अमीर
उमरावों आदि की प्रशंसा में लिखे जाने वाले कसीदे का पहले तो फारसीकरण
हुआ,
तत्पश्चात् ईरान के शायरों में उसकी तशबीब (शृंगारिक भूमिका) को कसीदे
से अलग करके उसका नाम ग़ज़ल रखा (ग़ज़ल अर्थात् प्रेयसी से वार्तालाप)
ईरान में यह विधा बहुत फूली-फली तथा लोकप्रिय हुई। वस्तुतः भारतवर्ष को
यह विधा ईरान की ही देन है।
प्रश्न : अमीर खुसरो को हिंदी का पहला ग़ज़लगो शायर माना जाता
है। इस पर आप को क्या कहना है?
उत्तर
: अमीर खुसरो ने खिलजी शासनकाल में,
उस
समय की बोली जाने वाली भाषा में कुछ अरबी-फारसी शब्दों का मिश्रण करके
एक नई भाषा विकसित की थी,
जिसका
नाम उन्होंने हिंदी/ हिंदवी रखा था और इस भाषा में उनके द्वारा कुछ
ग़ज़लें भी कही गईं थीं,
इसलिये उनको हिंदी भाषा का
आविष्कारिक तथा हिंदी का पहला ग़ज़लगो शायर माना जाता है। यह और
बात है कि हिंदी के काव्य क्षेत्र में बालस्वरूप राही,
शेरजंग गर्ग,
सूर्यभानु गुप्त आदि ग़ज़ल लिख रहे थे,
परंतु
इसे स्थापित करने का श्रेय दुष्यंतकुमार को प्राप्त हुआ है।
प्रश्न : ग़ज़लिया शायरी में क्रमिक विकास में किन शायरों का
महत्वपूर्ण योगदान रहा है?
दूसरे
दौर में पूर्वार्ध में सौदा,
मीर,
सोज
और दर्द जैसे उस्ताद शायर हुए हैं। इन शायरों में "मीर"सर्वोपरि हैं।
उन्हें खुदाये-सुखन कहा जाता है। इसी दौर में उत्तरार्द्ध में मुसहफ़ी
इंशा,
जुर्रत का नाम उल्लेखनीय हैं। इंशा और जुर्रत की शायरी अवध की विलासिता
से प्रभावित है,
जब
मुगलिया सल्तनत के कमज़ोर होने के कारण,
बाहरी
आक्रमणों,
लूटपाट और नादिरशाही कत्ले- आम से दिल्ली उजड़ती जा रही थी,
तो
सौदा,
मीर,
सोज़,
मुसहफी और इंशा को,
वहाँ
संरक्षण न मिलने के कारण लखनऊ जाना पड़ा था जो नवाब आसफुद्दौला के साथ
विलासिता मं् डूबा पड़ा था।
तीसरे
दौर में पूर्वार्ध में,
लखनवी
शायरों में नासिख और आतिश के नाम उल्लेखनीय हैं,
दोनों
ही लखनवी रंग के प्रसिद्ध शायर थे। दूसरी ओर देहलवी शायरों में जौक,
मोमिन
और मिर्ज़ा ग़ालिब थे। मिर्जा दाग़ और बादशाह जफ़र उस्ताद जौक के शिष्य
थे,
शेफ़्ता उस्ताद मोमिन के शिष्य तथा हाली मिर्ज़ा ग़ालिब के शिष्य थे।
मिर्ज़ा ग़ालिब ने अपनी गज़लिया शायरी में इतना सब कुछ कह दिया था,
कि
दूसरों के कहने के लिये कुछ बचा ही नहीं। आगे चलकर असगर,
फानी,
इसरत,
सीमाब
और जिगर ने इस शून्य को भरने का प्रयास किया। सबसे बड़ा नाम दाग ने
कमाया जिनके हज़ार से अधिक शिष्यों में,
सर
इकबाल,
सीमाव
अकबरावादी,
जिग़र
मुरादाबादी जैसे अज़ीम शायर शामिल है। हाली ने इश्किया किस्म की शायरी
का जम कर विरोध किया और उसके स्तर में सुधार लाने का आहवान किया।
प्रश्न : देहलवी और लखनवी शायरी में क्या अंतर है?
बताएँ।
प्रश्न : गज़ल की तकनीक एवं उसकी संरचना पर प्रकाश डालने का कष्ट
करेंगे?
उत्तर
: ग़ज़ल की बाहरी संरचना में छंद-काफ़िया-रदीफ़ का महत्वपूर्ण योगदान
हैं। छंद को अथवा बहर,
रचना
का सही छंदोबद्ध होना ज़रूरी होता है,
साथ
में छंद-बहर की विशिष्ट लय का निर्वाह भी आवश्यक है। ग़ज़ल की
काफ़ियायुक्त प्ररंभिक दो पंक्तियों को "मतला" तथा अंतिम दो पंक्तियों
को,जिसमें
शायर अपना उपनाम लाता है उसे "मक़्ता" कहते हैं। काफ़िया तुकांत शब्द को
कहते हैं। रदीफ़,
काफ़ियों के पश्चात आने वाला वह शब्द अथवा वाक्य है,
जो
ग़ज़ल में बिना किसी परिवर्तन के दोहराया जाता है। चूंकि मतके में
प्रयुक्त काफ़ियों पर,
ग़ज़ल
के अन्य काफ़िये आधारित होते हैं,
अतः
मतले में सही काफ़िये आयें,
यह
देखना ज़रूरी है। जैसे -
१.
मतले में या तो दोनों काफ़िये विशुद्ध मूल शब्द हों,
जैसे-
हर
हक़ीक़त में बआंदज़े-तमाशा देखा
खूब
देखा तेरे जलवों को मगर क्या देखा।
२. एक
विशुद्ध मूल शब्द और दूसरा बढ़ाया हुआ शब्द,
जैसे
-
जब से
उसकी निगाह बदली है
सारी
दुनिया नयी-नयी सी है।
३.
दोनों ही बढ़ाये हुए अंश निकाल देने पर समान तुकांत शब्द शेष बचें,
जैसे
-
हो गई
है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिये
इस
हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिये।
४.
दोनों बढ़ाये हुए शब्दों में व्याकरण भेद हो,
जैसे
-
देख
मुझ को यूँ न दुश्मनी से
इतनी
नफ़रत न कर आदमी से।
५.
यदि मतले में ख़फा-वफ़ा जैसे अथवा मन-चमन जैसे काफ़िये लाये जाते हैं तो
उस अवस्था में क्रमशः "फ"
व्यंजन-साम्य वाले काफ़िये ही पूरी ग़ज़ल में लाये जायें या
अपवाद स्वरूप उनकी जगह अन्य व्यंजन भी लाये जा सकते हैं,
जैसा
कि डा॰ इकबाल अपनी एक ग़ज़ल में लाये हैं,
-
फिर
चिराग़े-लाल से रौशन हुए कोहो-दमन
मुझको
फिर नग्मों पे उकसाने लगा मुर्गे-चमन।
मन की
दौलत हाथ आती है तो फिर जाती नहीं
तन की
दौलत छाँव है,
आता
है धन जाता है धन।
इस
ग़ज़ल के अन्य काफ़िये है बन,
फन,
तन
आदि। काफ़िया-शास्त्र बड़ा है यहाँ केवल मुख्य-मुख्य बातें ही बताई जा
सकती है। सबसे महत्वपूर्ण है ग़ज़ल के अन्तरंग की संरचना,
जिसके
माध्यम से शायर अपने मनोभाव,
उद्गार,
विचार,
अनुभव,
दुःख-दर्द तथा अपनी अनुभूतियाँ आदि व्यक्त करता है,
अतः
अन्तरंग बहुत ही धीर-गंभीर
,
अर्थपूर्ण तर्कसंगत तथा अंतरमन की गहराई से प्रस्फुटित होने वाला होना
चाहिये। अंतरंग को जितना परिष्कृत किया जाए,
उतना
ही वह प्रभावशाली बनता है। तगज़्जुल,
अंदाज़े-बयाँ कुछ ऐसा हो कि शेर की पहली पंक्ति सुनने पर हम दूसरी
पंक्ति सुनने को लालायित हो उठें तथा उसे सुनते ही अभिमूत हो जाएँ। यह
प्रसंग बहुत बड़ा है अतः इसे यहाँ इतना ही दिया जा सकता है।
प्रश्न : अच्छी ग़ज़ल की विशेषताएँ?
उत्तर
: ऊपर ग़ज़ल के अन्तरंग के बारे में जो बातें बताई गई हैं तथा उनके
अतिरिक्त ग़ज़ल समसामयिक,
जनोपयोगी तथा अपनी धरती और परिवेष से जुड़ी हो,
कथ्य
एवं शिल्प में सामंजस्य हो,
भाषा
सरस-सरल हो। पाठकों एवं श्रोताओं में वही भाव सम्प्रेषित हो,
जो
ग़ज़लकार व्यक्त करना चाहता है,
और
सबसे बड़ी बात यह कि वह अंतरमन में गहरे उतर जाए,
कुछ
सोचने को विवश करे,
जिसके
शेर उदाहरण स्वरूप पेश किये जा सकें तथा जिसके शब्दों के उच्चारण
प्रामाणिक हों,
बहर
में हो अथवा सही छंदोबद्ध हो।
प्रश्न : हिंदी में लिखी जा रही ग़ज़ल के विषय में आपकी क्या
राय है?
उत्तर
: दुष्यंत कुमार ने हिंदी ग़ज़लों की अच्छी शुरुआत कर गये हैं,
उनके
बाद से हिंदी में ग़ज़ल- लेखन अबाध रूप से चल रहा है। अच्छी ग़ज़लें
सराही भी जा रही हैं,
आगे
उन पर अधिक निख़ार आएगा,
ऐसी
अपेक्षा है।
प्रश्न : हिंदी ग़ज़लों में उर्दू शब्दों का प्रयोग किस सीमा
तक होनं चाहिये?
उत्तर
: जहाँ बात न बनती हो,
वहाँ
उर्दू शब्द आने से बात बन जाए,
तब
वहाँ उर्दू शब्द लाना ही चाहिये,
परंतु
उसके सही उच्चारण के साथ,
क्योंकि लबो-लहज़ा उर्दू शब्दों के उच्चारण से ही बनता है,
इसके
लिये उर्दू शब्दों के हलन्त अक्षरों को ध्यान में रखना आवश्यक है।
प्रश्न : आजकल दोहा छंद में ग़ज़ल लिखने का प्रयोग हो रहा है,
क्या
यह उचित है?
यदि
हाँ तो क्यों?
उत्तर
: आश्चर्य तो इस बात का है कि जब ग़ज़ल को दोहे से प्रेरित बताया जा
रहा है तो ग़ज़ल-लेखन में उसका प्रयोग अब इतनी देरी से क्यों किया जा
रहा है,
पहले
क्यों नहीं किया गया?
ग़ज़लों को सभी अच्छी बहरें और अच्छे छंद ग्राह्य हैं,
बशर्ते कि वो संगीतात्मक हो। दोहा छंद भी अच्छा छंद है और इसकी दोनों
पंक्तियाँ तुकांत होने के कारण ग़ज़ल के मतले के अनुरूप भी है। हाँ,
ग़ज़ल
की स्वतंत्र पंक्तियों को दोहों में किस प्रकार फिट किया जाएगा,
यह
विचारणीय है।
प्रश्न
: क्या ग़ज़लों की कुछ बहरें काव्य-छंदों से समकक्ष हैं?
कृपया उदाहरणों सहित बतायें?
उतरः
कुछ प्रचलित बहरें ऐसी हैं जो हिंदी वाक्य छंदों के समकक्ष हैं। जैसे-
१.
मानव भवन में आर्यजन जिसकी उतारें आरती
बहरे-रजज्
/हरिगीतिका
२.
हाँ,
कमल
के फूल पाना चाहते हैं इसलिये
बहरे-रमल
/गीतिका
३.
कमल बावना के तुम्हें है समर्पित
बहरे-मुतकारिब / भुजंगप्रयात
४.
मेघ आकर भी बरसे नहीं
बहरे-मुतदारिक / महालक्ष्मी
५.
परिंदे अब भी पर तोले हुए हैं
बहरे-रजज्/सुमेरु
ऐसे
ही और भी बहरों के समकक्ष,
हिंदी
छंदों के उदाहरण दिये जा सकते हैं।
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