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05.03.2012
 
ग़ज़ल एक गेय कविता
एक परिचयः  चौथा भाग

आर.पी शर्मा
प्रस्तुति : देवी नागरानी

 

ग़ज़ल एक सुकोमल विधा है। वह नफ़ासत पसंद है। हाथ लगाए मैली होती है, उसे स्चच्छता तथा सलीके से स्पर्श करना होता है। ग़ज़ल चूँकि एक गेय कविता है, अतः उसका किसी बहर अथवा छंद में होना अपरिहार्य है। ग़ज़लकार को इसके लिये, यदि रचना बहर में है तो "तख़्ती" का,  और अगर छंद में है तो मात्रा गणना का व्यहवारिक ज्ञान एवं अभ्यास होना ही पर्याप्त है, जो कोई कठिन कार्य नहीं। अतः इसके लिये ग़ज़लकार को अरूज़ी अथवा छंदशास्त्री बनने की बिलकुल भी आवश्यक्ता नहीं है, इस पुस्तक में 'तख़्ती ' तथा 'मात्र- गणना' की विधियों को, उदाहरणों सहित, विस्तार से समझाया गया है। अतः इन विधियों को सीखने के लिये कहीं दूर जाने की ज़रूरत नहीं। निरंतर अभ्यास से इनमें दक्षता प्राप्त की जा सकती है।

बहर अथवा छंद, ग़ज़ल की पहली प्राथमिकता है। "कविता और छंद का संबंध उसी प्रकार का है जिस प्रकार आत्मा और शरीर का। आत्मा की सक्रियता शरीर के द्वारा ही है। इसी प्रकार कविता की प्रभावोत्पादकता भी छंद के द्वारा ही है।"

ग़ज़ल तो एक गेय कविता है, अतः उसमें छंदों की महत्वपूर्ण भूमिका है। बहर अगर ग़ज़ल  की जान है तो छंद ग़ज़ल के प्राण। ग़ज़ल का फार्म (स्वरूप) बहर अथवा छंद बिना निष्प्राण है। यदि उसको जिंदा रखना है तो उसे हर प्रकार स्वस्थ रखना हमारा दायित्य बनता है। ग़ज़ल के बहर और छंद के बारे में इससे ज़्यादा और क्या कहा जा सकता है। अब यह ग़ज़लकारों पर निर्भर करता है कि वे बहर के लिये 'तख़्ती' करना अथवा छंद के लिये 'मात्र-गणना' सही-सही करना मन लगाकर सीखें और ग़ज़लों में प्राण फूँकें और उन्हें तरोताज़ा बनाये। 'तख़्ती'  और 'मात्र-गणना' की विधियाँ आगे यथास्थान दी जा रही है।

 

अब ग़ज़ल का फार्म, बाह्य (बाह्य स्वरूप) कैसा होता है तथा ' ज़मीने शे''  किसे कहते हैं, काफ़िये क्या होते हैं, रदीफ़ क्या होती है, मत्ला क्या होता है, हुस्ने मत्ला क्या होता है,  तथ मक्ता क्या होता है, शेर क्या होता है। हुस्ने मतला क्या होता है, तथा मक्ता क्या है। इन सवालों का स्पष्टीकरण आइये शुरू करते हैः

मान लें हमें निम्नलिखित मिसरे के आधार पर ग़ज़ल लिखने के लिये कहा गया-

 

'हाल कोई तो पूछता मुझसे'

 

वस्तुतः इस पंक्ति के आधार पर हिंदी पत्रिका फनकार, ग्वालियर के अंक फरवरी २००५ में पाठकों द्वारा कही गई कई ग़ज़लें प्रकाशित हुई हैं। जनाब कमरउद्दीन बरतर साहब का यह अभिनव प्रय है, जो हर दृष्टी से सराहनीय है। उपर्युक्त मिसरे में प्रयुक्त क़िया (तुकान्त शब्द) पूछता है और उसके पश्चात आने वाली रदीफ़ (जो पूरी ग़ज़ल में अपरिवर्तित ही रहती है) मुझसे है।  मिसरे  का वज़्न हैः बहरे-ख़फी़फ़ अर्थात फाइलातुन, मफाइलुन, फालुन /फ-इलुन। इस वज़्न के अंत में फालुन और फ-इलुन के आख़िर में एक एक शब्द, आवश्यकतानुसार बढ़ाया जा सकता है। जिस किसी वज़्न में शुरू में फाइलातुन आता है, उसमें एक अक्षर कम करके, फ इ ला तु न भी आवश्यकतानुसार लाया जा सकता है। अतः उपर्युक्त मिसरा-वज़्न /बहर +का़फिया+रदीफ प्रस्तुत करता है, इसी को ज़मीने शे'र कहते हैं

 

रदीफ़ काफिया को समझाने के लिये मोना हैदराबादी का यह शेर पाठनीय है-

 

साथ देके रदीफ़ आगे आगे चली

काफ़ियों को लेकर चली है ग़ज़ल।

 

इस बयाँ को साकार करते हुए 'हाल कोई तो पूछता मुझसे' के आधार पर फनकार पत्रिका में पाठकों की जी जो ग़ज़लें पेश हुई हैं, उनसे कुछ ग़ज़लें, कुछ अंश साभार यहाँ पेश हैं ताकि ग़ज़ल के फार्म को सरलतापूर्वक समझा जा सके -

 

१. राज साग़री, खरगोन ( म.प्र.)

 

खुद पे कैसे हो तब्सिरा मुझसे

दूर रखो ये आईना मुझसे।..मतला

 

उसकी आँखों ने क्या कहा मुझसे

उम्र भर मैं रहा ख़फा़ मुझसे।..हुस्ने मतला

 

खून के घूँट पीके बैठा हूँ

ज़हर का पूछ ज़ायका मुझसे।

 

कौन था 'राज़', आईना चेहरा

जिसने मुझको मिला दिया मुझसे।..मक़्ता

॰॰

२.म.ना. नरहरि, विरार(महाराष्ट्र )

 

था अगर शिकवा या गिला मुझसे

हाल कोई तो पूछता मुझसे।

 

जिस्म मिट्टी सा कर दिया मेरा

तोड़कर उसने सिलसिला मुझसे।

॰॰

 

३. शैलजा नरहरि, विरार ( महाराष्ट्र)

 

बाद मुद्दत के वो मिला मुझसे

हाल कोई तो पूछता मुझसे।

 

बाँधने की फिज़ूल कोशिश की

छूटना तय ही था सिरा मुझसे।

 

रोशनी को फरेब देना था

तीरगी ने लिया पता मुझसे।

॰॰

४. मरियम ग़जज़ाला, थाने (महाराष्ट्र)

 

इस तरह आज वो मिला मुझसे

हो नहीं जैसे आशना मुझसे।

 

दे गया धूप की मुझे चादर

ले गया रात की रिदा मुझसे।

 

कुछ 'गज़ाला' मुझे रही रंजिश

कुछ तो उसको भी था गिला मुझसे।

॰॰

५. डा॰ नलिनी विभा नाज़ली, हमीरपुर (हि।प्र)

 

दोस्त रखते जो राब्ता मुझसे

हाल कोई तो पूछता मुझसे।

 

मेरी कश्ती डुबा ही दी आख़िर

था खफ़ा मेरा नुख़ुदा मुझसे।

 

'नाज़ली' बनके किस कदर मासूम

पूछता है वो मुद्दआ मुझसे।

॰॰

 

६.द्विजेन्द्र द्विज, कांगड़ा (हि.प्र.)

 

अब है मेरा मुकाबला मुझसे

मेरा साया तो डर गया मुझसे।

 

इंतिहा द्विज न जाने क्या होगी

देखी जाए न इब्तिदा मुझसे।

॰॰

७. दा. विनय मिश्र, अलवर (राजस्थान)

 

रात ने जाने क्या सुना मुझसे

ले गई धूप का पता मुझसे।

 

जैसे गुल में समाई है खुशबू

वो कहाँ है भला जुदा मुझसे।

॰॰

७. जनाब कमरउद्दीन सा॰ बरतर, गव्लियर(म.प्र.)

 

अब मुख़ातिब है आईना मुझसे

अब मेरा सामना हुआ मुझसे।

 

वो जो पत्थर ही मुझको समझेगा

दूर ही दूर जो रहा मुझसे।

 

पूछने वाले की तरह बरतर

हाल कोई तो पूछता मुझसे।

 

बकौल अमरजीत सिंह अंबाली के शेर की ज़ुबानी-

 

मत्ले से मक़्ते तलक की ये मसाफ़त महरबा!

दर्द से रिश्ते में जैसे ग़म पिरोती है ग़ज़ल।

 

शब्दार्थः मसाफ्त= सफ़र

 

और आगे......अंक ५


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