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| 05.21.2007 |
| छीन ली मौसमों ने है आज़ादियाँ देवी नागरानी |
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छीन ली मौसमों ने है आज़ादियाँ जाने क्या हो गईं सारी आबादियाँ बनके भँवरे चुराते रहे रंगो बू रंग अपना न कोई न है आशियाँ क्यों नहीं ताज कोई बनाता यहाँ क्या नहीं प्यार में अब रही गर्मिंयाँ खुद से हारा हुआ आज इन्सान है हौंसलों में कहाँ अब है अँगड़ाइयाँ जहमतों का सिला जो मिला आज है बावफ़ा वो निभाती है दुश्वारियाँ झाँक अपना गिरेबाँ न देखा कभी बज़म में पर उठाते रहे उँगलियाँ गूँज कर जब सन्नाटे बुलाते रहे जाने कतराई देवी क्यों आबादियाँ |
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