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| 06.21.2007 |
| अहसास की रोशनी- 'चराग़े-दिल' समीक्षकः मा.ना.नरहरि |
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पुस्तक :
चराग़े-दिल
श्रीमती देवी नागरानी की सद्यः प्रकाशित ग़ज़ल -सँग्रह उनकी नवनीतम पुस्तक है।
अपने बच्चों- कविता, दिव्या और दीपक को उन्होंने
अहसासों का गुलदस्ता भेँट किया है इस किताब के मारफ़त। "ग़ज़ल उर्दू साहित्य की एक ऐसी विधा है जिसका जादू आजकल सबको सम्मोहित किए हुए है। ग़ज़ल ने करोड़ों दिलों की धड़कनों को स्वर दिया है। इस विधा में सचमुच ऐसा कुछ है जो आज यह अनगिनत होंठों की थरथराहट और लेखनी की चाहत बन गई है। ग़ज़ल कहने के लिये हमें कुशल शिल्पी बनना होता है, ताकि हम शब्दों को तराश कर उन्हें मूर्त रूप दे सकें, उनकी जड़ता में अर्थपूर्ण प्राणों का संचार कर सकें तथा ग़ज़ल के प्रत्येक शेर की दो पंक्तियाँ या मिसरों में अपने भावों, उद्गारों, अनुभूतियों आदि के उमड़ते हुए सैलाब को 'मुट्ठी में आकाश, कठौती में गंगा, कूजे में दरिया, बूँद में सागर के समान समेट कर भर सकें।" अब देखना ये है कि श्रीमती देवी नागरानी ग़ज़ल के विषय में क्या कहती हैः "कुछ खुशी की किरणें, कुछ पिघलता दर्द आँख की पोर से बहता हुआ, कुछ शबनमी सी ताज़गी अहसासों में, तो कभी भँवर गुफा की गहराइयों से उठती उस गूँज को सुनने की तड़प मन में जब जाग उठती है तब कला का जन्म होता है। सोच की भाषा बोलने लगती है, चलने लगती है, कभी कभी तो चीखने भी लगती है।यह कविता बस और कुछ नहीं, केवल मन के भाव प्रकट करने का माध्यम है, चाहे वह गीत हो या ग़ज़ल, रुबाई हो या कोई लेख, इन्हें शब्दों का लिबास पहना कर एक आक्रति तैयार करते हैं जो हमारी सोच की उपज होती है।" चराग़े-दिल' अहसासों का गुलदस्ता है जिसमें मेरे मन के गुलशन के अनेक फूल हैं
जो कभी महकते है, कभी मुस्कराकर मुरझा जाते हैं, तो कभी पतझड़ के मौसम के साए में
बिखर जाते है, पर दिल का चराग़ फिर भी जलता रहता है। जलते बुझते इन चराग़ों की
रोशनी से अपने ह्रदय के आँगन को रोशन रखने की कोशिश में ये शब्द बोलने लगते हैं,
जिन्हें हम ग़ज़ल कहते हैं।"
न बुझा सकेंगी ये आँधियाँ और ऐसी स्थिति आने पर वह दिस्तों के बारे में कहती हैः ग़ैर तो ग़ैर है चलो छोड़ो लेकिन इस डर को वह अपनी माँ की दुआओं से जीतने की कोशिश करती हैं, सुने वो क्या कहती हैः लेके माँ की दुआ मैं निकली हूँ अपनी माँ के साए और दुआओं के साथ जब वो खुद को बयान करती है तो देखिये किस नज़ाकत के साथ बयान कर रही हैं: मैं तो नायाब इक नगीना हूँ ये नगीना जब अपने विचारों और सद्कर्मों से चमकता है तो देवी कहती हैः यूँ ख़्यालों में पुख़्तगी आई और ये पुख़्तगी जब उन्हें उस स्वार्थी समाज की बात करने के लिये आमदा करती है तो उनका विचार किस कदर साफ़ बयानी दिखाता हैः चाहत, वफ़ा, मुहब्बत की हो रही तिजारत इसी दौर से गुज़रते हुए अपने वजूद की पहचान पाते हुए कह रही हैः ढूँढा किये वजूद को अपने ही आस पास इस बिखरने में जब कभी उन्हें प्यार का इशारा सहारे के तौर पर मिलता है तो अपने अहसासों को किस अँदाज, में बयाँ कर रही हैः कुछ तो गुस्ताख़ियों को मुहलत दो इन अहसासों से गुज़रते हुए नागरानी जी के दिल में एक खामोशी कहीं बहुत गहरे तक छिप कर बैठ जाती है, लेकिन कमाल है यह ख़ामोशी बोलती है, चुप रह कर बात करती है, वह बड़ी खूबी से इस बात का जि़क्र करते हुए कह रही हैः खामुशी क्या है तुम समझ लोगे
इन ख़ामोशियों को जब वह सुनती हैं तो उनकी आँखें तर हो उठती हैं हुई नम क्यों ये आँखें बैठकर इस बज़्म में देवी इस ग़म से निजात पाने के लिये वह बंदगी की बात किस नज़ाकत से ज़ाहिर कर रही हैं: ख़ुद ब ख़ुद आ मिले ख़ुदा मुझसे इसी बंदगी के साथ साथ वो आदमी की मेहनत, ईमानदारी और लगन से किये गए काम के नतीजे को देख कर क्या महसूस करती है, देखियेः यूँ तराशा है उनको शिल्पी ने श्रीमती देवी नागरानी ने दुःख सुख, सहानूभूति, साँसारिक उठा-पटक, प्रेम, वियोग, समाज के अनेक चेहरों को उजगार किया है अपने शेरों में। श्री आर. पी. शर्मा 'महरिष्' जी की इस्लाह से छपी यह पुस्तक दोष मुक्त है। देवी नागरानी ने 'महरिष्' जी के लिये कहा हैः सारा आकाश नाप लेता है यह ग़ज़ल-संग्रह ग़ज़ल लिखने वालों में अपना स्थान बनायेगा ऐसी मुझे आशा है, मा.ना.नरहरि |
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