अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
02.15.2016

 
बंजर ज़मीं
देवी नागरानी

दिल से मिलाये बिन भी दिल रहता कभी कभी,
दुश्मन भी बनके दोस्त है डसता कभी कभी।

इक जंग सी छिड़ी हुई इस उस के ख़्‍याल में,
कुछ सोच के गुमसुम ये मन रहता कभी कभी।

ये ख़्‍वाब ही तो ख़्‍वाब है, हाथों में रेत ज्यों,
बहकर ये अश्क आँखों से बहता कभी कभी।

रुख क्यों बदल रही है यूँ, मुझे देख ज़िन्दगी
इस बेरुखी को देख दिल जलता कभी कभी।

बंजर जमीन पर उगे काँटों भरी क्यारी,
उस बीच में गुलाब है पलता कभी कभी।

देता है ज़ख्म ख़ार तो देता महक गुलाब
फिर भी उसे है तोड़ना पड़ता कभी कभी।।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें