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ISSN 2292-9754

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04.23.2017


 आलम राज़ सरवर "सरवर" : एक पहलू

 "सरवर" चलो, है मैकदा-ए-इश्क़ सामने
मुद्दत हुई ज़ियारत-ए-इन्सां न कर सके

"इश्क़" को "ज़ियारत-ए-इन्सां" समझने वाले "सरवर" साहब को जब मैं पढ़ती हूँ तो लगता है जैसे ज़िन्दगी, कविता का आवरण ओढ़ कर, वक़्त के बंधन की सीमा तोड़कर, रक्स करती हुई उतर रही है। उनकी ग़ज़लें उनके व्यक्तित्व का आईना बनकर जीवन और परिवेश की झलकियाँ दिखाती हैं। जी हाँ। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र से जुड़े हुए अनुभवों, अनुभूतियों एवं जीवन-मूल्यों को अपनी क़लम के दम से विषय-वस्तु बनाकर क़लमबंद करने की महारत हासिल करने वाले जनाब "सरवर" साहब जो अपने वजूद से जुड़कर एक परम सच से साक्षात्कार होने के बाद जीने मरने का अंतर यूँ मिटा पाए हैं कि जिसके बाद कुछ और खोजने और पाने की ललक बाक़ी नहीं रह जाती। "सरवर" के अश’आर और भावों की पारदर्शिता कुछ न कहकर भी सब कुछ कह देने की तौफ़ीक़ रखते हैं

जो कहूँ तो क्या कहूँ मैं, जो करूँ तो क्या करूँ मैं?
मैं कहाँ हूँ और क्या हूँ, मुझे ख़ुद पता नहीं है

उनकी भावनात्मक व रचनात्मक अभिव्यक्ति सारगर्भित है. उनकी सादगी और निश्च्छलता उनके व्यक्तित्व और रचना की ही ख़ूबी नहीं अपितु उनके जीवन की, उनकी सोच की एक जानी पहचानी महक है जो तन-मन की ख़ुशबू में लिपटी हुई ज़िंदगी के हर रंग से अठखेलियाँ करती है। किसी ने कहा है "ग़ज़ल एक सहराई (मरुस्थली) पौधे की तरह है जो पानी की कमी के बावजूद अपना विकास जारी रखता है।" श्री आनन्द पाठक जी ने सरवर जी के परिचय भूमिका में कहा है "........सरवर" मात्र नाम ही नहीं, एक पूरा व्यक्तित्व है, एक संस्था है जो लगभग 50 सालों से उर्दू अदब और उर्दू ज़बान के प्रचार-प्रसार के लिए प्रयासरत है......." सच है। "सरवर" किसी परिचय के मुहताज नहीं हैं। यह कहना कोई अतिशयोक्ति न होगी कि क़लमकार के रूप में वह भाषाई संस्कार और उर्दू अदब को आगे बढ़ाने का कार्य बड़ी शिद्दत और मेहनत से कर रहे हैं। विरासत में पाई हुई इस अदबी टक्साल को बड़ी दानिशमंदी के साथ बाँट रहे हैं. जिन संस्कारों की नींव बचपन में रखी गई हो वहाँ मानसिक ताने-बाने की बुनियाद बननी लाज़मी है जो आगे चलकर वैश्विक दॄष्टिकोण के निर्माण में अपनी पहल और प्रमुखता दर्शाती है।

शील जी अदीबों से कहते हैं कि ...........

"अदब के कारीगरो आज ललकारता है देश तुम्हें
इन्क़लाब के लिये
नई जन्नत के लिये
लाल भोर के लिये
जो रेशम के कीड़े की तरह
नई सभ्यता, नये अंदाज़ को जन्म देता है"

जैसे रोशनी का जन्म अँधेरे के गर्भ से होता है, वैसे ही कलात्मक रचना का उजाला साहित्य के कलश से गीत, ग़ज़ल के रूप में हमारे सामने आता है......

लौट आती है सदाएँ तो ग़ज़ल होती है
जज़्ब वे मोती सजाएँ तो ग़ज़ल होती है

ग़ज़ल कहना एक क्रिया है, एक अनुभूति है, एक कला है जिसमें रचनाकार अपने हृदय में उमड़ते भावों को, उद्गारों को सरल और सहज भाषा में अभिव्यक्त करता है, फिर वही भाषा, वही शैली और वही शिल्प पाठक को अत्यधिक प्रभावित करती है। रचनात्मक लेखन का वही शब्द-सौंदर्य तथा कथ्य-माधुर्य शैली कालान्तर में रचनाकार का परिचय और पहचान बन जाती है। जनाब "सरवर" ने फ़र्माया है "..... यह शाइरी मेरे जज़्बात की तर्जुमानी और मेरे ख़यालात-ओ-तसव्वुरात को एक हद तक अक्कासी करती है। मेरी अपनी ज़हनी-ओ-अदबी आसूदगी के लिये यही बहुत काफ़ी है......"। जी हाँ। उनके परिचय में इससे ज़ियादा कुछ कहा भी नहीं जा सकता .....

न मैं क़ील का, न मैं क़ाल का, न मैं हिज्र का, न विसाल का
मैं हूँ अक्स अपने ख़याल का, मैं फ़रेब अपनी ही जाँ का हूँ

सच है। मात्र नई मानवीय चिंता ही कविता नहीं रच सकती. उसके लिये ज़रूरी है एक उर्जस्वित भाव-बोध, समृद्ध कल्पना, रचनात्मक भाषा और एक शिल्प सौंदर्य जो रचनाकार को उसकी पहचान देता है। "सरवर" साहब की शाइरी में गहराई, गीरआई, सिलासत, रवानी, बंदिश की चुस्ती, अल्फ़ाज़ और मुहाविरों का सही इस्तेमाल बख़ूबी पाया जाता है। शब्दों की कसावट और बुनावट यह ज़ाहिर करती है कि सरवर साहब इस टक्साल के धनी है। ग़ज़लें ताज़ा हवा के नर्म झोंके की तरह ज़ेहन को छूती हुई दिल में उतर जाती हैं। उनकी शायरी यक़ीनन उन का ख़ज़ाना है, लेकिन फ़साना सारे ज़माने का है। वह सारे ज़माने को इस तरह विश्वास में ले लेते हैं कि आप बीती जग बीती लगने लगती है...

हमने हाथों की लकीरों में तुम्हें ढूँढा था
वो भी था इश्क़ का क्या एक ज़माना साहिब!

सरवर जी के रचनात्मक क्षितिज का कैनवास काफी विस्तृत है। उन्होंने ने उर्दू की कई विधाऒं पर ग़ज़ल, नज़्म, कत्आत, रुबाई, गीत, अफ़साने पर क़लम चलाई है। अपनी कल्पनाओं में वह मनोभावों का ऐसा रंग भरते हैं कि अल्फ़ाज़ खुद-ब-खुद बोलने लगते हैं। आम इन्सान की तरह हँसते-रोते, दुख-सुख की चाशनी का ज़ायका लेते हुए जीवन पथ पर अपने मनोभावों को अपनी क़लम से शब्दों के ताने बाने में बुनकर जब वह प्रस्तुत करते हैं तो दिल से दिल तक एक अदृश्य पुल बन जाता है, मानवता धड़क उठती है और ग़ज़ल के माध्यम से कही हुई उनकी हर बात दिल में उतर जाती है और अपना गहन प्रभाव छोड़ जाती है। यही तासीर (प्रभाव) उनके अश’आर में पाई जाती है जहाँ भावनात्मक अभिव्यक्ति दिल की रौशनदान से झाँकती हुई अपने ही अक्स को दोहराती है.....

मुसीबत में इक ऐसा वक़्त भी आता है इन्सां पर
ज़रा सी छाँव भी अपना ही घर मालूम होती है

क़लम एक अद्भुत हथियार है, एक ताक़त है, एक हौसला है, जीवन संचार का एक माध्यम है जिससे रचनाकार अपनी कलात्मक सोच के ताने-बाने से शब्द-शिल्पी की तरह बुन के, शब्दों को मूर्ति में ढालकर और तराश कर अपनी रचना को आकार देता है। कहते हैं, अच्छी कविता के भीतर कंगारू के पेट की तरह एक और कविता छुपी होती है तिलिस्म की तरह जो अपने आप में अलग और पूरे व्यक्तित्व के साथ भी गढ़ रही होती है। कभी मैने दो शे’र कहे थे

इक आसमां में और भी हैं आसमां कई
मुझको हक़ीक़तों से वो वाक़िफ़ करा गया
पलकें उठी तो उट्ठी ही अब तक रहीं मेरी
झोंका हवा का पर्दा क्या उसका उठा गया!

इस कला के निपुण और धनी जाने-माने शायर जनाब सरवर आलम राज़ हिंदी उर्दू ज़बान के एक सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनकी शाइरी दोनों भाषाओँ की मिली-जुली गंगा-जमुनी ज़ुबान का तहज़ीबी संगम है और यही उनके व्यक्तित्व का आईना भी है।

कुरेद लेता हूँ यादों की राख मैं अक्सर
यहीं कहीं से धुआँ इश्क़ का उठा होगा!

अपनी पहचान का हर पहलू बड़ी सादगी से पेश करते हुए कहते हैं....

कैसी तलाश, किस की तमन्ना, कहाँ की दीद
ख़ुद मेरी ज़ात मेरे लिये राज़ बन गई!

कहते हैं, कवि और शब्द का अटूट बंधन होता है। कवि के बिना शब्द तो हो सकते हैं, परंतु शब्द बिना कवि नहीं हो सकता। एक हद तक यह सही भी है, पर दूसरी ओर 'कविता' केवल भाषा या शब्दों का समूह नहीं। अपितु उन शब्दों के सहारे अपने भावों को भाषा में व्यक्त करने की कला ही कविता-गीत-गज़ल है। वह किस तरह अपने हर अहसास को नफ़सत-ओ-नज़ाकत से शेर में ढाल लेते हैँ, लुत्फ़ अन्दोज़ होइए

अना की किर्चियां बिखरी पड़ी थी राह-ए-आख़िर में
ये आईने तो हमने ज़िन्दगी भर ख़ूब बरते थे ॰॰

लखनऊ, डेनमार्क, डैलस में अनेक मुशाइरों में शिरकत करते हुए, वह अपनी ग़ज़लियात की अमिट छाप छोड़ते आए हैं। आप ने कई मुशायरों में मीर-ए-मजलिस सदारत भी की है डैलस में हुए एक मुशाइरे में जनाब बेकल उत्साही जी ने आप की शान में एक शेर नवाज़ा था,

क़ायम की धरती का पौधा, सरवर आलम राज़
डैलस की शादाब ज़मीं पर उर्दू की आवाज़
उर्दू की आवाज़ हुई बैनल अक़वानी
जिसकी ख़ुशबू से महकी तहज़ीब अवामी

तसव्वुर का परिंदा कभी आकाश की ऊंचाइयों को छूता है, तो कभी हृदय की गहराईयों में डूबता है. जहाँ-जहाँ पर जिस-जिस सच के साथ उसका साक्षात्कार होता है उसी सत्य को क़लम की जुबानी काग़ज़ पर भावपूर्ण अर्थ के साथ पेश कर देता है। जब वो कहते हैं ..

छुपाएँगे कहाँ तक हाल-ए-इज़्तराब-ए-दिल वो लोगों से
ग़ज़ल उन की बता दे हाल- ए- सरवर आलम

इसी सच का निर्वाह और निबाह किया है सरवर जी ने, जिनकी शायरी के अनंत विस्तार से मैं मुख़ातिब हुई हूँ। उनकी व्यक्तित्व और शख़्सियत पर क़लम चलाना मुश्किल ही नहीं, बहुत मुश्किल है। ऊँचाइयों के सामने अपना क़द क्या माइने रखता है! इसे मैं बख़ूबी महसूस कर सकती हूँ। गागर में सागर समाहित करने का इल्म उन्हें ख़ूब आता है। आप के वालिद मरहूम "राज़ चाँदपुरी" साहब अपने ज़माने के ख़ुद एक नामचीन शायर थे जो दाग़ स्कूल के जनाब "सीमाब अकबराबादी" के शागिर्द थे। शाइरी आपको विरासत में मिली है। एक अच्छे शाइर के साथ-साथ आप एक बहुत अच्छे इन्सान भी हैं, इस बात का अहसास उनसे बात करने पर होता है कि किस क़दर अपनत्व और मुहब्बत के साथ वे पेश आते हैं। यही उनकी सादगी भी है और यही उनका बड़प्पन भी। अपनी मेयारी कलाम और अपने ख़ास अंदाज़-ए-फ़िक़्र की बदौलत "सरवर" साहब एक मक़बूल शायर की हैसियत से हिंदोस्तान और पाकिस्तान में अपना एक ख़ास मुक़ाम बनाए हुए हैं. बक़ौल शायर

हुआ हूँ ऐसा गिरफ़्तार-ए-आरज़ू "सरवर"
न इब्तिदा की ख़बर है न इन्तिहा की ख़बर है

उनकी अपनी साईट www.urduanjuman.com उनके व्यक्तित्व का आईना है, जहाँ "शहनाई" क़लाम सरवर में डेनमार्क के मशहूर गुलोकार परवेज़ अख़्तर जी ने उन के कलामों को अपनी आवाज़ से सजाया है। उनकी ग़ज़लों के कई संग्रह, प्रकाशित हो चुके हैं जैसे

शहर निगार १९९३ http://www.sarwarraz.com/books/shehrenigar.pdf

रंग गुलनार १९९९ http://www.sarwarraz.com/books/rangegulnar.pdf

और दुर्रे शहवार २००४ http://www.sarwarraz.com/books/durreshehwar.pd

ऐसी उम्दा और दिलपज़ीर अजीम शायरी के लिए जनाब "सरवर" साहब जी मुबारक़बाद के हक़दार हैं, और मुझे उम्मीद ही नहीं यक़ीन भी है कि अदब शनास इस ग़ज़ल संग्रह का पर्दा उठते ही इसे बतौर तहजीब का संगम अपनायेंगे।

और अन्त में यही कि

शिकवा बरलब न हो, उसको भी ग़नीमत समझो
लोग "सरवर" तुम्हें भूले से भी गर याद करें

अस्तु
देवी नागरानी


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