देवी नागरानी


कहानी

और मैं बड़ी हो गई
शिला
आजादी की कीमत

आपबीती

मासूम सिसकियाँ ..
मैं दिवाली हूँ

कविता / दीवान

चराग़े-दिल (पुस्तक)

अब ख़ुशी की हदों के पार हूँ मैं
उस शिकारी से ये पूछो
कसमसाता बदन रहा मेरा
कितने पिये है दर्द के..
कुछ अंधेरो में दीपक जलाओ
ख़लिश से गुज़रते रहे जो
खुशबू वतन की
घर में वो जब भी आया होगा
चढ़ा था जो सूरज
चराग़ों ने अपने ही घर को ...
छीन ली मौसमों ने है ...
जब दुख में अबला रोती है
ज़माने से रिश्ता बनाकर ..
ज़िंदगी एक आह होती है
झूमकर नाचकर गीत गाओ
ठहराव ज़िन्दगी में दुबारा...
ताज़गी कुछ नही हवाओं में
तेरी रहमतों में सहर नीं
दिल न मुझसे कभी ख़फा होता
दीवारो-दर थे, छत थी ..
दोस्तों का है अजब ढब
बहता रहा जो दर्द
बहारों का आया है मौसम..
भटके हैं तेरी याद में ...
मेरा शुमार कर लिया
मैं तो साहिल पे आकर ..
या बहारों का ही ये मौसम नहीं
यूँ उसकी बेवफाई का....
वो हवा शोख पत्ते उड़ा ले गई
शीशे के मेरे घर के हैं ...
सबका मन अपना दुश्मन है
साथ चलते देखे हमने ...
सोच की चट्टान पर बैठी रही
सोच को मेरी नई वो
हिज्र में उसके जल रहे जैसे

समीक्षा

"प्रवासिनी के बोल"
अहसास की रोशनी- 'चराग़े‍-दिल' (समीक्षकः मा.ना.नरहरि
)
चराग़े-दिल - कुछ विचार
अब फिज़ाओं में महक रही है हिंदी भाषा
वसीयत - छोटा सा परिचय

"ग़ज़ल कहता हूँ" - कुछ विचार
पुस्तक विचार /तब्सेरा - "धड़कनें"

आलेख
एक परिचय :

आर.पी. शर्मा "महरिष"- भाग १

ग़ज़ल एल कला - भाग २
ग़ज़ल क्या, कब, क्यों और कैसे? - भाग ३
ग़ज़ल एक गेय कविता- भाग ४
मत्लों में काफ़िये - भाग ५
"है यहाँ भी जल" -विजय सिंह नाहटा  

 

बाल साहित्य
 ६ बाल गीत