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ISSN 2292-9754

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07.19.2014


पहाड़ा

सोलह का मैं कहूँ पहाड़ा
दूनी बत्तीस रेल का भाड़ा

अड़तालिस पुरुषों का डिब्बा
उसमें बैठे चौसठ फुक्का

लगे सफ़र में अस्सी घंटे
लागा धक्का टूटे घुट्टे

छियानबे पैसे बस में देकर
उतर पडे बाज़ार में जाकर

एक सौ बारह की लीनी वाच कलाई
तब तक एक सौ अट्ठाईस की
हो गई जेब सफाई

एक सौ चवालीस लिखे देख कर
पहुँचे एक कोठी के अंदर

एक सौ साठ की मिकी नौकरी
हाथ में दे दी तुरंत टोकरी

यह नज़ारा मुम्बई भाड़ा
सोलह पूरा हुआ पहाड़ा


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