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ISSN 2292-9754

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10.03.2014


रुबाइयाँ


आमाले बशर पे वो भी हैरान हुआ
जब से है बशर आज का शैतान हुआ
जिस रब ने बनाया था बशर को ऐ'देव'
दुनिया के लिए दर्द का सामान हुआ।

निष्कर्ष जगत को देख कर ये पाया
गुण दोष से निर्मित है मनुज की काया
इक मन्त्र अथर्ववेद का देखा 'देव'
यह राज़ तभी मेरी समझ में आया।

अब मानव है मानवता से वंचित
इस बात से रहता हूँ हर पल चिन्तित
सुखमय है दुर्जनों का जीवन 'देव' और
लगता है सज्जन का जीवन शापित।

नित ज्ञान का अमृत बाँटा करते हैं
खाई दो दिलों की पाटा करते हैं
विद्वान बुराई के महावटों को
अपने तर्कों से काटा करते हैं।

सारी दुनिया का तू हो जाए नाथ
लग जाए जहाँ भर का धन तेरे हाथ
आएगी ज़रूर मौत इक दिन तुझको
और कुछ भी न जा पाएगा फिर तेरे साथ।


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