अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
06.07.2008
 

दरअसल
देवांशु पाल


चौराहे पर अचानक दंगा भड़क उठा।  धारदार हथियारों के आपस में टकराने की आवाज सुनाई पड़ने लगी।  मैं बुरी तरह से डरने लगा। तभी अचानक किसी की चीख सुनाई पड़ी । मुझे वह चीख किसी बेकसूर इंसान की लगी, जो हिंसक राजनीति का शिकार हो गया था। 

अभी इस वक्त उसके बारे में सोचने या उसकी सहायता करने का मेरे पास वक्त नहीं था। किसी भी क्षण मेरे साथ कोई भी अप्रिय घटना घट सकती है। यही सोचकर मैं भीड़ में से भाग निकलने लगा।  तभी वह चीख दूर तक मेरा पीछा करती रही। भागता हुआ मैं घर आया।  पसीने से मेरा बदन भीगने लगा था।  साँसें तेज़ चलने लगी थी। मै हाँफने लगा था। तभी अचानक दरवाजे पर दस्तक सुनाई पड़ी मैं चौक उठा। इस वक्त दरवाज़ा खोलना खतरे से खाली नहीं था। पता नहीं दस्तक देने वाला आदमी किस धर्म का, किस झण्डे का होगा। उसके हाथ में किस तरह के हथियार होंगे? यही सब सोचकर मैं डरने लगा।

 दरवाज़ा टूटने लगा था। मैंने घबराकर दरवाजा खोल दिया। खून से लथपथ वह मेरी बाहों में आकर गिर पड़ा। उसे मैं सँभालू कि उससे पहले ही उसने मेरी बाहों में दम तोड़ दिया।

 वह कोई और नहीं मेरा ही इक्कीस साल का लड़का था, चीख दरअसल उसी की थी।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें