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ISSN 2292-9754

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03.10.2016


तुम्हारे बिन

प्रौढ़ा, यौवनगता शीत भौजाई को मुँहबोला देवर बसंत का छेड़ता
फागुन तक आ पहुँचा बूढ़ा वर्ष भी, जीवजयी उन्मादराग को टेरता
घर सूना, आँगन भी सूना, रंग भरा फागुन भी सूना
काटे कटें न दिन, तुम्हारे बिन

डूबी है आकंठ कल्पनालोक में, भ्रमरावलि से घिरी मंजरी आम की
गोपी बन कर ऋतु वासंती नाचती मानो गूँज रही वंशी घनश्याम की
यादों की मदमाती टोली, भेद गयी छाती, ज्यों गोली
जीवन बड़ा कठिन, तुम्हारे बिन

नवरस का संचरण हुआ रसकाष्ठ में, खिले पलाश पुष्प दहके अंगार से
अलसाए तन पर आँचल भी बोझ है, विरही मन ऊबा है व्यर्थ सिंगार से
मन की पीड़ा किससे बाँटूँ, उंगली पर गिन गिन कर काटूँ
रातें-दिन, पल-छिन, तुम्हारे बिन


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