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05.03.2012
  

शेष प्रसंग
डॉ. दीप्ति गुप्ता


आँगन में खाट पर लेटी अम्मा का दुर्बल शरीर दिनभर धूप सेंकने के बाद और खेस में लिपटे होने पर भी सर्द था। पिछले कुछ सालों से चुस्त, तन्दुरुस्त अम्मा को, एकाएक बुढ़ापे की कमजोरी ने ऐसा धर दबोचा था कि अब वह चौबीस घन्टे बिस्तर पर ही पड़ी रहती थी। नहाना धोना भी बड़ी मुश्किल से किसी तरह तोषी और किशनों की सहायता से हो पाता था। अम्मा तोषी का मुँह देखकर जी रही थी। बेटे तोषी की बहू घर में आने की आस में शायद अम्मा के प्राण अटके थे। बिस्तर पर पड़े-पड़े, हर पल भगवान से मनाती रहती कि - काश! तोषी शादी के लिए तैयार हो जाए और उसकी देखभाल करने वाली, उसे रोटी देने वाली, उसका तन-मन से ख्याल रखने वाली, एक सुघड़, सलोनी बहू घर में आकर चार चाँद लगा दे।

अम्मा के तीन बेटों में तोषी सबसे बड़ा था। जब वह 14 वर्ष का था, तभी उसके बाबू जी भगवान को प्यारे हो गए थे। उनके आकस्मिक निधन से तोषी का किशोर मन इतना आहत हुआ कि, वह कई महीनों तक गहन ख़ामोशी में डूबा रहा। न हँसना, न बोलना। तब से, जैसे दोनों छोटे भाईयों और माँ का गार्जियन बन, दिन पर दिन, गम्भीर से गम्भीरतर होता गया। मानो वह इन तीनों के लिए ही जीता था। स्वयं के लिए, उसका अपना कोई अस्तित्व ही नहीं था। उनका भविष्य, सुख-दुख, पसन्द-नापसन्द, यह सोचना, ख्याल रखना ही उसका जीवन बन चुका था। माँ की अधिक से अधिक सेवा करना, हर तरह से उसके कामों में हाथ बँटाना, उसे चिन्ता मुक्त रखना, ये सब उसकी दिनचर्या में शामिल था। तब से जो तोषी ने बुजुर्गियत ओढ़ी तो वह आज तक ऐसी बरकरार है कि शादी का जक्र आते ही वह स्वयं को विवाह के लिए बड़ा बुजुर्ग मानने लगा है।

बी.एस-सी. प्रथम श्रेणी में पास करने पर भी तोषी ने आगे पढ़ने का विचार छोड़कर, एक इंटर कॉलिज में नौकरी कर ली थी। अपनी थोड़ी सी तनख्वाह में वह बड़ी समझदारी से घर का खर्च, भाईयों के कपड़े, किताबें आदि सभी जरुरतों को समेटता था। दोनों छोटे भाई, उसके भाई कम, बेटे अधिक थे !

तोषी दिखने में कम आकर्षक न था। सुडौल चेहरे पर बड़ी-बड़ी आँखें, देखने वाले को सहसा ही अपनी ओर खींचती थीं। लम्बा कद, घने घुँघराले बाल, भावुक व्यक्तित्व - कुल मिलाकर, पड़ौस की करुणा का दिल चुराने  के लिए, ये सब जरुरत से ज्यादा था। तोषी भी किशोरावस्था के सहज-स्वभाविक प्रभाव से अछूता न था। उसे भी करुणा अच्छी लगती थी। उसकी उपस्थिति से जैसे तोषी का सब कुछ सज-सँवर जाता था। बल्कि यों कहा जाए कि - वह उसे मन की मन चाहता था - तो गलत न होगा। पर अपनी चाहत से अधिक, उस पर भाईयों का प्यार, उन्हें पालपोस कर सैटिल करने का इरादा अधिक हावी था। सो उसने करुणा के लिए अपनी चाहत को, अपनी भावनाओं को अधिक हवा नहीं दी और उन्हें मन में सँजोकर कर जन्दगी जीता रहा। चुप-चुप, खामोश! करुणा भी उसके प्रेम में अन्दर ही अन्दर पगी रही। देखते ही देखते वह दिन भी आ गया जब वह मूक आँखों से टप-टप आँसू गिराती दुल्हिन बनकर विदा हो गई। तब तोषी ने स्वयं को बड़ा खाली-खाली महसूस किया। करुणा के विदा होने पर, वह अपने कमरे में बंद होकर, घन्टो सूनी छत को ताकता रहा था और फिर एकाएक फफक कर रो पड़ा और न जाने कब तक आँसू बहाता रहा था। प्रेम को पीड़ा बनाने वाला वह स्वयं ही था - करुणा का अपराधी, अपनी खुशियों का दुश्मन! उसे किसी से गिला शिकवा नहीं था - उसका ही तो सब करा धरा था - फिर रोना कैसा, दर्द कैसा? लेकिन कुछ चीजे सदियों से साथ-साथ चलती आई हैं, जिनमें प्यार और पीड़ा के साथ में आज तक कभी दरार नहीं पड़ी। तोषी के जीवन से प्यार तो विदा हो गया था लेकिन जाते-जाते पीड़ा उसे भेंट में दे गया था...! ऐसे मूक प्रेम की पीड़ा जितनी असहाय होती है, उतनी ही असहनीय भी! न उसे किसी के साथ बाँटा जा सकता है, न उसे शब्द लिए जा सकते है - बस मौन  ही उसकी नियति होती है।

धीरे-धीरे दिन पखेरु की तरह उड़ते चले गए। सामने मनचाहा उद्देश्य  होने पर भी, उसमें जुटे रहने पर भी, तोषी अक्सर उदास रहता। आखिर वह भी तो एक इंसान ही था- इस पर अतिभावुक और सम्वेदनशील ! करुणा से उसके भावनात्मक लगाव पर उसका नियंत्रण नहीं था। एक लम्बा अरसा बीत जाने पर भी, करुणा की याद उसके दिल में ज्यों की त्यों बनी रही। दिल के रिश्ते, भावनाओं से जुड़े संबंध यदि शादी ब्याह की रस्मों से दफन हो जाया करते तो जीवन बड़ा आसान हो जाता जीवन की उलझनें सुलझ जाती! समय और उम्र के साथ तोषी की चाहत, उसकी कर्त्तव्यपरायणता के साथ घुलमिल गई और वह बढ़ते, पढ़ते भाईयों को देख-देख कर, अपने लक्ष्य की ओर जोश से बढ़ने लगा।

जब शेखर ने इन्जीनियरिंग की प्रवेश परीक्षा पास की और वह उसके लिए चुना गया तो, तोषी की खुशी नवे आसमान पर थी। वह मिठाई लेकर सीधा माँ के पास पहुँचा और बोला -

लो अम्मा, भोग लगाओ, उनके मुँह में पेड़ा ठूँसते हुए, शेखर और दिवाकर को आवाज देने लगा। माँ बोली - अरे मन्दिर में भी मीठा चढा आया कि नहीं?

तो वह मस्त कलंदर की तरह चिहुँका - अरे छोड़ो भी अम्मा, मेरे लिए तो, मेरा यह घर, आँगन ही मन्दिर है और तुम मेरी भगवान हो। तभी तो सबसे पहले तुम्हें भोग लगाया है।

माँ यह सुनकर प्यार से आँखें तरेरती, रसोईघर में जाकर, तोषी के प्यार से और शेखर के पास होने की खुशी में छलछलाई आँखे पोंछने लगी थी।

*

कुछ वर्ष बाद छोटे भाई दिवाकर के बी.ए. कर लेने पर, तोषी, सुविचारित ध्येय के अनुसा, उसे मर्चेन्ट नैवी की प्रवेश परीक्षा दिलाने मुम्बई गया। छोटे शहर का सीधा-सादा युवक, बड़े शहर की - वह भी मुम्बई जैसी मायानगरी की तड़क भड़क, उलझे यातायात, गगनचुम्बी इमारतों, भीड़ भरी सड़कों, और आँखों से मिनटों में इंसान का एक्सरे कर लेने वाली शैतान आत्माओं से अनजान था। यह उसके जीवन का पहला अवसर था, जब वह छोटे भाई को लेकर मुम्बई गया था। राजधानी एक्सप्रैस से - कंधे पर बैग टाँगे, प्लेटफार्म पर उतरते ही, दोनों भाई सटे-सटे चलते, यात्रियों और कुलियों के धक्के, झटके खाते किसी तरह रेलवे स्टेशन के बाहर पहुँचे, तो टैक्सी वालों ने ललकार लगा-लगा कर, अपनी-अपनी टैक्सी में उन दोनों को ले जाने के लिए घेराबन्दी सी करके, तोषी का दिमाग लगभग खाली ही कर दिया। उसे कुछ भी नहीं सूझ रहा था कि कहाँ से सिटी बस पकड़े। तभी किसी सज्जन ने उसकी मदद की और  वह बेस्ट की बस में चढ़कर, धम्म से सीट पर बैठकर, दिवाकर को अपने पास खींचता सा समेटकर, कुछ निश्चिन्त हुआ। पर यह चैन, आराम भी थोड़े ही पल का था। उसे जहाँ उतरना था, वह जगह कहीं निकल न जाए; सो कन्डक्टर की स्थान संबंधी घोषणा को वह हर बार बड़े ध्यान से सुनता। इन्तजार करते-करते उसका स्टॉप भी आ ही गया। दोनों भाई उतरे और परीक्षा स्थल पर जाकर सारी औपचारिकताएँ पूरी की। फिर पास ही एक कैन्टीन में हाथ मुँह धोकर कुछ खाया पिया। देखते ही देखते समय बीत गया और दिवाकर के परीक्षा हॉल में जाने की घड़ी आ गई। तोषी जब दिवाकर के साथ परीक्षा हॉल तक गया, तो वहाँ अचानक, उसे अपने एक पुराने सहपाठी का छोटा भाई दिखा। वह भी तोषी को देखते ही पहचान गया। एक परिचित को एकाएक उस अनजान शहर में पाकर दोनों भाईयों का कुछ हौसला बुलन्द हुआ। सहपाठी का भाई बोला -

भाईसाहब परीक्षा के बाद आप दोनों को मेरे साथ घर चलना होगा। घर पास ही हैं।

तोषी को अजित का बड़ा सहारा सा महसूस हुआ। उसने सोचा, इतनी दूर मुम्बई आया है तो छोटी बुआ से मिल आना चाहिए। 10-15 साल हो गए। बुआ जी को भी सुखद आश्चर्य मिलेगा। यह सोचकर उसने अजित से कहा कि परीक्षा के बाद वह दिवाकर को अपने घर ले जाए और वह स्वयं भी  बुआ जी से मिलकर, जल्द से जल्द उसके घर पहुँच जाएगा। बुआ जी के घर के लिए, समय से निकलना भी जरुरी था। बस स्टॉप पर आकर वह घाटकोपर जाने वाली बस के नम्बर की खोज बीन करने लगा। यद्यपि कुछ इलाकों में जाने वाली बसों के नम्बर स्टॉप पर लिखे हुए थे, किन्तु घाटकोपर का नाम उस सूची में नहीं था। किसी से पूछना भी उसे उचित नहीं लग रहा था। मन के भय उसे ऐसा करने से रोक रहे थे, लेकिन दूसरे की मदद के अतिरिक्त, अब कुछ और उपाय भी उसे नजर नहीं आ रहा था। अतः उसने एक व्यक्ति से हिचकिचाते हुए धीरे से पूछा, तो वह तपाक से बोला -

मैं भी घाटकोपर ही जा रहा हूँ, आप मेरे साथ ही उस बस में चढ़िए, जिसमें मैं चढूँगा।

तोषी को सराहा सा मिला। थोड़ी देर में बस आई और वह उसमें, उस अनजान मार्गदर्शक के साथ सवार हो गया। रास्ते भर, वह व्यक्ति तोषी से तरह-तरह के सवाल करता रहा और सारी जानकारी बड़े प्यार और होशियारी से हासिल करके, उसने तोषी को उसकी बुआ के घर तक छोड़ने का बीड़ा उठा लिया। काफी देर हो चुकी थी। तोषी मन ही मन बेचैन था कि इतनी देर बुआ जी के घर तक पहुँचने में लग रही है, उसे वापिस दिवाकर के पास भी पहुँचना है। तब ही वह मीठा, चतुर रहनुमा तोषी से बोला -

उठो, अब हमें यहाँ उतरना होगा। तोषी और वह झटपट उतरे और उस व्यक्ति ने एक टैक्सी रोकी, तोषी बोला -

देखिए, मैं टैक्सी का किराया नहीं दे सकूँगा। मैं पैदल चलने को तैयार हूँ। यहाँ से कितनी दूर चलना होगा?

वह शातिर आदमी तोषी के कंधे को प्यार से थपथपाते हुए बोला -

अरे प्यारे, तुमसे टैक्सी का भाड़ा माँगता कौन है? तुम इस शहर में अपुन का मेहमान हो, चिन्ता नई करने का, अपुन देगा भाड़ा।

बेचारा तोषी मन ही मन उस अजनबी की उदारता से कृतज्ञ सा हुआ, सोच में डूबा, टैक्सी में बैठ गया। कुछ देर बाद टैक्सी एक अजीब से इलाके में पहुँच, गली दर गली गुजरती आगे बढ़ती गई। जिधर भी तोषी की नजर जाती, उसे साज-श्रृंगार करे युवतियाँ ही दिखाई पड़ती। उसका माथा ठनका। उससे रहा नहीं गया, अचकचाकर उसने पूछ ही लिया -

यह कौन सी  जगह है?

अजनबी टेढ़ी मुस्कान के साथ शरारती नजर तोषी पर डालता हुआ बोला - इसे भिन्डी बाजार कहते हैं।

तोषी अचरज से बोला - भिन्डी बाजार ?’

नाम सुनकर, थोड़ा यह सोचकर वह सहज हुआ कि यह बड़ा सब्जी मार्केट है - लेकिन एक  ही सब्जी भिन्डी के  नाम पर इसका नाम क्यों रखा गया - या  यहाँ भिन्डी बहुत अच्छी किस्म की मिलती है? लेकिन सब्जी के ढेर, टोकरे वगैरा तो कहीं दिखाई नहीं दे रहे - दूर-दूर तक। उसके प्रश्नचिन्ह बने चेहरे को ताड़कर, वह अजनबी शैतान उस पर ठहठहा कर हँस पड़ा। तोषी पुनः विचलित हुआ। कुछ सिमट कर, मानो अपने आप में  दुबक सा गया। उसका दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। अब उसे समझते देर नहीं लगी कि आज वह गलत फँस गया। सीधे सरल मन, सीधी सरल सोच वाले तोषी ने खामोश रहना ही ठीक समझा। तभी एक झटके से टैक्सी रुकी। भाड़ा चुकाकर वह अजनबी खट-खट सीढ़ियाँ चढ़ता हुआ, उसे बड़े प्यार से एक घर में ले गया। तोषी का दिल एक अनजाने भय से बैठा जा रहा था। सजी-धजी बैठक में बैठते ही, कई जोड़ी आँखे पर्दे हटा-हटा कर इधर से, उधर से, उसे देखने लगीं। तोषी को लगा कि कहीं वह गश खाकर न गिर पड़े। किसी तरह उसने अपने को सम्हाला। जेब से रूमाल निकालकर चेहरे पर छलछला आए पसीने को पोछा। इतने में वह अजनबी रहनुमा दोस्त’, जो अब तक उसकी नजर में राहजन दुश्मन बन चुका था - मैं अभी आया।- यह कहकर चला गया। एक अधेड़ उम्र की औरत और तोषी ही कमरे में रह गए थे। तभी उस औरत ने तोषी को उठने का इशारा किया और अपने साथ दूसरे कमरे में ले चली। वह किंकर्त्तव्यविमूढ़ सा उसके पीछे-पीछे चल पड़ा। दुर्जनों के हाथ पड़ने पर, सिर झुकाकर आज्ञा मानने में ही खैर थी। कमरे के अन्दर पैर रखते ही तीन किशोरियों ने बड़े प्रेम से उसका स्वागत किया। एक ने दरवाजे की सिटकनी चढ़ा कर, पर्दा खींच दिया। पास ही मेज पर रखे ट्रान्सजिस्टर पर बजता एक पुराना मधुर, सलोना गीत - ये रात भीगी भीगी, ये मस्तफजाएँ, उठा धीरे-धीरे वो चाँद प्यारा प्यारा - वातावरण को मखमली और मादक बना रहा था। तोषी के पीले पड़े चेहरे को देख एक किशोरी की तो हँसी ही छूट गई। दूसरी को शायद उसकी बेचारगी पर दया आ रही थी, सो उसने उसे हाथ पकड़ कर हौले से कुर्सी पर बैठाया। तीसरी पास आकर, उसके माथे का पसीना पोंछकर, माथे पर अस्त व्यस्त पड़े बालों को पीछे कर प्यार से उसके बालों में अँगुलियाँ फिराने लगी। तोषी तो ऐसा निर्जीव हो गया - जैसे काटो तो खून नहीं। उसका गला ऐसा सूख गया कि थूक भी नहीं निगला जा सके। उन तीनों ने खिलखिलाकर बातें करके, उसे जितना नार्मल करने की कोशिश की, उसकी हालत घबराहट के कारण उतनी ही बिगड़ती चली गई। अपनी घबराहट दूर करने के लिए तोषी ने, सब कुछ भूलकर अपना ध्यान उस गाने पर केन्द्रित किया और आँखें मूँद कर, उस गाने की मधुरता में खोता हुआ वहाँ के वातावरण से मानसिक रूप से दूर होने का प्रयास करने लगा। उन किशोरियों की तोषी को उत्तेजित करने की सारी कोशिश निष्फल होती जा रही थी। तोषी के सिर्फ हाथ पाँव ही ठण्डे नहीं थे, बल्कि सिर और सारा शरीर ही जैसे सुन्न हो गया था। उन युवतियों को लगा कि इस रूप के हाट में यह पंछी धे से लाया गया है। एकाएक उन कांगनाओं के मन में तोषी के लिए कोमल भावनाएँ जागने लगीं। वे उसके प्रति नारी सुलभ स्वेदना और सहानुभूति से भर उठीं। उनके पेशेवर हाव-भाव और कामुक भावनाएँ, तोषी के गुम होशहवास और बेचारगी से एकाएक वात्सल्यपूर्ण भावों में बदलने लगे। तीनों ने आँखों ही आँखों में तय किया और तोषी को 50 रुपये अपने पास से मदद के रूप में देकर छज्जे के पिछले दरवाजे से निकाल कर, गली में पहुँच कर, टैक्सी से फटाफट गायब हो जाने की सलाह दी। उस पेशेवर, भोग और विलास के इलाके की इस इंसानियत पर आश्चर्य से भरा, मन ही मन ईश्वर को लाख-लाख धन्यवाद देता, खैर मनाता, पिंजरे से आजाद पंछी की भाँति, तोषी लम्बे-लम्बे डग भरता, चलता गया और उस गली, उसके मोड़ के बिल्कुल पीछे छूट जाने पर ही, उसकी साँस में साँस आई। एकबारगी उसने पीछे मुड़कर, चारों ओर अच्छी तरह दृष्टि डालकर देखा कि कोई उसका पीछा तो नहीं कर रहा या कहीं वही चालबाज अजनबी तो कहीं उसके पीछे फिर से नहीं आ रहा? उसका दिल परेशान था, तरह-तरह के हैवानी ख्यालों की दशहत से फटा जा रहा था। उस इलाके से, उसकी हवा से तुरन्त दूर हो जाने की तीव्र इच्छा से उसने अगले बस स्टॉप तक के लिए टैक्सी कर ली। अजित का पता जेब में था। टैक्सीवाले  से दादर  तक  जाने वाली  बस  का  नम्बर  पूछकर  वह स्टॉप पर उतर गया। मन ही मन उसने तौबा कर ली थी कि वह अब इस मायानगरी में कभी किसी से अता-पता नहीं पूछेगा। शाम घिरने लगी थी। उसे दिवाकर की भी चिन्ता हो रही थी। सौभाग्य  से उसे बस की  अधिक देर तक प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी। बस के आते ही वह फुर्ती से चढ़कर, आगे वाली सीट पर झपट कर बैठ गया, जिससे दादर आने पर, वह शीघ्रता से अगले दरवाजे से उतर कर दिवाकर के पास पहुँच जाए। उसकी मनोस्थिति अजीबोगरीब हो रही थी। वह एक बड़े खतरे, एक दुर्घटना से, सुरक्षित बचकर सही सलामत निकल आया था। उसके अन्तर्मन में लगातार चिन्तन, मनन चल रहा था कि अब आगे - इस शहर से अपने शहर पहुँचने तक क्या-क्या सावधानी बरतनी चाहिए, दिवाकर के साथ कभी ऐसा न घटे; क्या कोई इंसान इतना घटिया और कुरूप भी हो सकता है कि बेवजह दूसरे इंसान को - ऐसी घिनौनी स्थिति में फँसा करा चलता बने? अपनत्व से भरे, अपने सीधे, सच्चे, भोले भाले शहर की छोटी सी दुनिया में पले बढ़े तोषी का मेट्रो सिटी का पहला अनुभव बड़ा ही वितृष्णापूर्ण रहा। दादर आ चुका था। तोषी उतरा। उसकी नजर फुटपाथ पर बिकने वाले नगर की मार्गदर्शक पुस्तिका पर पड़ी। उसने बिना किसी देरी के एक पुस्तिका खरीद ली। काश! यह पुस्तिका उसे पहले मिल गयी होती, तो वह उस अजनबी के चंगुल में न फँसता। 7 बजते-बजते वह अजित के घर पहुँच गया। वर्षों बाद अजित की माँ से मिलकर तोषी खुश होने के साथ-साथ; अपने साथ ताजी घटी दुर्घटना के कारण कुछ अधिक ही भावविह्वल हो गया। अपने शहर के कम परिचित लोग भी, अचानक किसी अजनबी शहर में मिल जाने पर, कितने अपने लगते है - यह तोषी ने पहली बार जाना।

क्रमशः--

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