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| 06.21.2008 |
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मृत्यु से मेरा तीसरा परिचय |
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पहाड़ी लड़कियों की टोली
जिसमें थी मेरी हमजोली नाम था – उसका "रंगोली" शीतल हवा थी, सुहाना था मौसम तभी वो अल्हड़ 'पिरुल' पे फिसली पहाड़ी से लुढ़की, दूर गहरी, अंधी खाई में एकाएक हो गई गुम ! उसकी चीख चारों और के पहाड़ों से टकरायी दूर अतल में सो गई ! हम सब सहम गईं, हमारी साँसे थी थम गईं, पर - मैं न रोई, न चीखी, न चिल्लाई बुत बन गई, और आँखें थी पथराई, मौत के इस खेल से, मैं थी डर गई, दादी का जाना, चिड़िया का मरना उसमें थी, एक नयी कड़ी जुड़ गई, पहले से मानों मैं अधिक मर गई, लगा जैसे तुम मुझमें घर कर गईं, दिल दिमाग को सुन्न करती जैसे तुम मुझमें बस गईं, मुझे एकबार फिर जड़ कर गईं ! |
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