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05.03.2012
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कपटी
डॉ. दीप्ति गुप्ता


घड़ी में टन से दो बजे और परीक्षा पुस्तिकाएँ जाँचती मृणाल ने झटपट कॉलबैल बजाकर लक्ष्मण से विभाग के साथियों के लिए आठ चाय कैन्टीन से ले आने के लिए कहा। थकी आँखों से चश्मा उतार कर, उसने आँखों को हौले से हथेलियों से ढक कर मानो उन्हें उर्जा देने की कोशिश की। तभी डा. शर्मा ने कमरे में प्रवेश करते हुए मृणाल को आँखें ढके हुए देखकर, चुटकी लेते हुए कहा - क्यों मैडम, ध्यान लगाया जा रहा है?” मृणाल तुरन्त आँखें खोलती बोली -

आइए, आइए, कॉपियाँ जाँचते-जाँचते थक गई थी - सो सोचा दो मिनिट आँखें बन्द करके इन्हें आराम दिया जाए।

इतने में बेला उप्रेती, शान्ति जोशी, सुरेश पाटिल, अतनु चैटर्जी, प्रो.खासनवीस - सभी एक के बाद एक आते गए और कमरे के एक कोने में रखी बड़ी मेज के चारों ओर रखी कुर्सियों पर बैठते ही ताजा खबरों की चर्चाओं में मशगूल हो गए। तभी डा.पाटिल बोले - आजकल छात्रों का मानसिक स्तर कितना गिर गया है!

मृणाल उनकी बात के समर्थन में बोली - जब शैक्षिक स्तर ही नहीं रहा, तो मानसिक स्तर होगा ही कहाँ?”

मृणाल के कथन को अपने पर लेते हुए डा.पाटिल को लगा कि जैसे यह बात उनके अध्यापन पर कही गई है। वे बात काटते बोले - भई, हम तो दिन-रात मेहनत करके, स्वयं को अपड़ेट करके ही छात्रों को पढ़ाते है - तो शैक्षिक स्तर पर तो आप कोई आक्षेप नहीं कर सकतीं।

विचक्षण मृणाल उन्हें शब्दजाल में उलझाती हुई बोली - डा. पाटिल, मैंने शिक्षण स्तर पर तो कोई टिप्पणी नहीं की। मैंने तो शैक्षिक स्तर की बात कही है। आप गलत समझे। हम सब कितना भी अच्छा पढ़ाएँ, पर जब तक पाठ्यक्रम उपयुक्त नहीं होगा, छात्रों में स्वाध्याय की आदत नहीं होगी, स्वयं खोजबीन नहीं करेंगे, विषय की गहराई तक नहीं जायेंगे - तब तक उनकी शिक्षा अधूरी रहेगी और शिक्षा आधी-अधूरी होगी तो मानसिक स्तर कैसे विकसित होगा? जरा सोचिए, मैं क्या गलत कह रही हूँ? अधिकाधिक सन्दर्भ पुस्तकें पढ़ने, विषय की जड़ तक पहुँचने में रुचि होनी चाहिए न? डा. पाटिल थोड़े खिसिसाये से, अपने रजिस्टर के पन्ने उलटने-पलटने लगे।                             

तभी लक्ष्मण ट्रे में कप और गर्मागरम चाय की केतली लेकर आ गया। चाय तो आ गई थी - बिल्कुल ठीक निश्चित समय पर- किन्तु विभागाध्यक्ष डा. आचार्य अपनी पुरानी आदत के अनुसार चाय की मंडली में अनुपस्थित थे। फिर भी सभ्यतावश औपचारिकता निबाहते हुए सबने उनकी प्रतीक्षा की। जब आधा घन्टा बीत गया और सभी का अपनी-अपनी कक्षाओं में जाने का समय भी होने लगा, तो सबने जल्दी-जल्दी चाय पीकर विदा ली। मृणाल भी दो घूँट चाय पीकर, हाजरी रजिस्टर और अभिज्ञान शाकुन्तलम् उठाकर एम.ए. की क्लास लेने चली गई।                                                                   तीन बजे के लगभग विभागाध्यक्ष डा. आचार्य अपनी गीद्ध दृष्टि साथी प्रवक्ताओं के कमरों में ड़ालते, कॉरिडॉर से सीधे अपने कमरे में जा बैठे। पीछे-पीछे, लक्ष्मण भी उनके हिस्से की बची चाय केटली में लिए उनके कमरे में जा पहुँचा।

 सबने पाय पी ली”- आचार्य जी ने खोजी वाक्य मुँह से बाहर फेंका।

जी हाँ” - लक्ष्मण बोला। लक्ष्मण ने कप में चाय ड़ाली और बड़े अदब से श्रीमान अध्यक्ष महोदय के सम्मुख रख दी। अपनी ही करतूत से ठण्डी, बदरंग हुई उस चाय को घूरते हुए आचार्य जी का मन हुआ कि उसे लक्ष्मण के मुँह पर दे मारें - पर ऐसा कर नहीं सकते थे। समय पर चाय की लघु अवधि बैठक में न आना, मातहत साथियों को प्रतीक्षा करवाना - इस सब में जो उन्हें आनन्द आता था, उसका बयान तो वे स्वयं भी नहीं कर सकते थे। तभी फोन की घन्टी मिमयायी। आचार्य जी ने लपक कर चोंगा उठाया तो उधर से श्रीमती जी बोली –

आप चश्मा घर पर ही भूल गए है। चपरासी को भेज दीजिए - ले जाएगा।

आचार्य जी बोले - रहने दो, आज का काम मैं चला लूँगा।

अब अपने कमरे में बैठे-बैठे उन्होंने चश्मे के बिना अगले दो-तीन घन्टे कुछ काम न करने का मास्टर प्लान बनाया। 3.20 पर क्लास भी लेनी थी। कुछ जरूरी कागजात पर हस्ताक्षर भी घसीटने थे। उनके खुराफ़ती दिमाग में लगी चालाकी की सूई रफ्तार से इधर-उघर घूम रही थी। तभी समय 3.20 से ऊपर हो जाने पर - ठीक 3.35 पर, कक्षा में प्रतीक्षारत छात्रों में से दो छात्र उनके कमरे में आ पहुँचे और साहस बटोर कर बोले - सर, क्लास नहीं लेंगे क्या?”

आचार्य जी ने नाटकीय ढंग से, मेज पर रखे फालतू पुराने कागजों से सिर उठाते हुए कहा –

 अरे 3.35 हो गया क्या? पता ही नहीं चला। क्या करूँ, एक जरूरी काम आ गया - कुलपति कार्यालय से। अभी पूरा करना आवश्यक है। क्या आप लोग कक्षा में खामोशी से बैठ कर स्वाध्याय करेंगे?”

 छात्र क्या बोलते, उन्हें तो पढ़ने से, 45 मि. के लेक्चर से बिना माँगे छुट्टी मिले, इससे बड़ी मौजमस्ती की बात क्या हो सकती थी? गुरु सेर, तो चेले सवासेर! खुशी को मुँह में भरे सकारात्मक सिर हिलाते वे सरपट कमरे से बाहर हो लिए। आचार्य जी छात्रों को टालकर, मन ही मन अपनी कामचोरी पर खुश होते हुए, खिड़की से बाहर, बराम्दें में आने जाने वालों को तिरछी नजर से देखने में लग गए। तभी उन्हें ध्यान आया कि पास वाले कमरे में, कुछ ही देर में प्रो. खासनवीस आता ही होगा; वह उन्हें इस तरह खाली बैठे देखेगा, तो ड़ायरी में नोट कर लेगा कि मैं क्लास छोडकर यही कमरे में बैठा हूँ। सो अपने को झूठ-मूठ के काम में उलझाने के इरादे से उन्होंने लिपिक सक्सेना को इन्टरकॉम से अन्दर बुलाया। पहले तो दो मिनिट उसे खड़ा रखा, फिर छत की ओर ताकते हुए धीरे-धीरे बोलना शुरू किया -

क्यों, आजकल अपनी सीट पर बहुत कम रहते हो और जितने समय बैठते हो उतने समय में कोई न कोई मिलने वाला आता ही रहता है, यदि ऐसे ही चलता रहा तो विभाग का काम क्या करोग?

बेचारा सक्सेना इस झूठे आरोप को सुनकर तिलमिला गया। फिर भी सफाई देता बोला - सर, मैं तो हमेशा सीट पर रहता हूँ। अभी आपने बुलाया तो सीट पर था कि नहीं? और मिलने वाले कौन आते हैं मेे पास? कई भी तो नहीं।

अच्छा, ऐसा क्या,” - असल में बेला मैडम कह रही थी कि तुम काम कम और बातें ज्यादा करते हो।  सक्सेना मन ही मन बेला मैडम को कोसता, गुस्से से भरा चला गया।

श्रीमान आचार्य, अपनी इस कूटनीति पर गर्व से भर गए। पुनः चश्मे के बिना आगे का समय काटने का चालू नुस्खा खोजने लगे। बराम्दे में आने जाने वालों पर तो उनकी नजर जमी ही थी - तभी उन्होंने देखा कि मृणाल उनके कमरे की ओर आ रही है। उन्होंने चटपट स्वयं को एक फाइल में ऐसा व्यस्त किया कि जैसे वे हर ओर से बेखबर है। मृणाल का स्वर उनके सतर्क कानों से टकराया - क्या मैं अन्दर आ सकती हूँ?” सुनकर भी अनसुना कर श्रीमान आचार्य फाइल के कागज उलटने-पलटने में लगे रहे। मृणाल तो उनकी नस-नस से वाकिफ़ थी, दरवाजा धकेल कर मेज के पास आकर उनके सामने छात्रों की अंक तालिका रखती हुई बोली –

प्रथम प्रश्नपत्र और द्वितीय प्रश्नपत्र से संबंधित सभी प्रवक्ताओं ने अंक मुझे दे लिए है, बस डा. आचार्य आपने ही अभी तक तृतीय प्रश्नपत्र की कापियाँ जाँच कर, उनके अंक मुझे नहीं दिए हैं। एअरगन के छर्रों की मानिन्द मृणाल के मुँह से निकलते वे तीखेपन से भरे नपे तुले शब्द अपराध बोध की भावना से भरे आचार्य जी के जहाँ तहाँ जाकर गड़ गए। उन्होंने हौले से थके-थके, फाइल से सिर उठाकर, चश्मा विहीन चुंधियाई आँखों को मिचमिचाते हुए कहा -

क्या बताए, यह फाइलवर्क इतना थका देता है कि शाम को घर पहुँच कर करेक्शन करने की हिम्मत ही नहीं रहती। ठीक है, फिर भी, कल तक सारी कापियाँ जाँच कर देने का प्रयास करता हूँ।

मृणाल बिना कुछ बोले सधे कदमों से वापिस चली गई। मृणाल की तो खामोशी भी चुनौती से भरी लगती थी आचार्य जी को - अपने दिल दिमाग की कलौंस के कारण। श्रीमान आचार्य मृणाल को देखकर उसके नियमित अनुशासित कार्य से पराजित से हुए, मन ही मन कुढ़ते, अक्सर उसे किसी अनियमितता के जाल में फँसाने की सोचते; पर कभी कोई मौका हाथ ही न लगता था।

       किसी तरह शाम के 5 बज ही गए। विश्वविद्यालयी नियमानुसार यद्यपि 5 बजे विभाग बन्द होने का समय हो जाता है किन्तु कभी-कभी विभागीय बैठक यदि देर से यानी 4.00 बजे के आसपास शुरू हो तो, एजेन्डा के मुद्दों पर सोच विचार व चर्चा करते-करते 7 बज जाना आम बात होती है। इस तरह के आवश्यक कार्य हेतु, देर तक रुकने में किसी को भी आपत्ति नहीं होती, भले ही महिला प्रवक्ताओं को नौकरी के साथ-साथ घर की भी जिम्मेदारियाँ निष्ठा से निबाहने के कारण परेशानी जरूर महसूस होती है, किन्तु फिर भी दोनों सीमाओं पर खड़ी कर्मठता से कर्त्तव्य वहन करने से वे पीछे नहीं हटती। पर कभी-कभी जब आचार्य जी बिना बात, बिना आवश्यक कार्य के यूँ ही अपने कमरे में सबको बैठाकर 6-7 बजाया करते हैं - तो सभी इस हरकत से मन ही मन परेशान और नाराज हो जाते हैं। क्योंकि आचार्य महोदय तो एक बजे से 3 बजे तक कैम्पस में अपने घर जाकर भोजन भी करते है, उसके बाद आराम भी फरमाते हैं, तदनन्तर आराम से कार में बैठ कर विभाग में कुर्सी तोड़ने के लिए आ जाते हैं। एक बार जो वे अपने कमरे की कुर्सी पर जमे तो, अपनी कक्षाएँ भी पढ़ाने के लिए कम ही जाते हैं या जाते ही नहीं। कोई न कोई काम का बहाना कर अपने कमरे में बैठे जम्हाईयाँ लिया करते हैं। कभी-कभी तो जब छात्र-संख्या 8-10 होती है तो वे अपने ही कक्ष में क्लास लेकर छात्रों को कृतज्ञ कर देते हैं। इतना ही नहीं, अनेक बार तो श्रीमान जी 11 बजे विभाग में आते हैं और कुलपति कार्यालय के किसी काम के बहाने से 12 बजे ही घर भाग जाते हैं। अब स्टॉफ, इतनी तो खोज बीन करने उनके पीछे-पीछे जाता नहीं कि ऑफिस के कौन से अर्जेन्ट काम के लिए वे विभाग से 12 बजे से गायब है - किन्तु उनके झूठ अक्सर खुद-ब-खुद किसी न किसी मौके पर स्वयं उजागर हो जाते हैं, तब वे उन्हें छुपाने के लिए, दो-तीन झूठ उन पर लपेट कर, ढकने का असफल और हास्यास्पद प्रयास करते हैं। बातों को ताडने की पैनी दृष्टि उनके मातहत भी रखते हैं। यदि वे अक्ल से पैदल ही होते तो, विभाग में प्रोफैसर, रीडर और प्रवक्ता होने के बजाय कहीं चपरासगिरी कर रहे होते। सब श्रीमान अध्यक्ष महोदय की चालबाजयों पर इकट्ठे बैठने पर खूब हँसते हैं और जमकर उनकी खिल्ली उड़ाते हैं। यह तो सबकी शराफ़त है कि वे आचार्य जी को उनकी हरकतों के लिए ज़लील नहीं करते, वरना यदि विभाग में एक भी तेज़ तर्रार प्रवक्ता हो तो वह खड़े-खड़े नंगा कर दे ऐसे चालबाज़ को।

 

 

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डा. शर्मा 12.30 की क्लास लेकर विभाग में आए तो क्या देखते हैं कि बराम्दे में अध्यक्ष के कमरे के सामने छात्र-छात्राओं की भीड़ लगी है। उनके पास पहुँचते ही डा. शर्मा ने पूछा- आप लोग यहाँ कैसे खड़े हैं?”

सभी एक स्वर में खीझे से बोले - सर, दो दिन से हम सुबह दो-तीन घन्टे, फिर दोपहर को भी दो-दो घन्टे अपने फार्म्स पर आचार्य सर के हस्ताक्षर लेने के लिए यहाँ आते हैं, पर सर हमें अपने आने का, मिलने का निश्चित समय बता कर भी, कभी नहीं मिलते। हम अपनी कक्षाएँ छोड़ कर, यहाँ इन्तजार करते-करते थक जाते हैं। हमारा समय, शक्ति और पढ़ाई - सभी कुछ यूँ ही चला जाता है। आप बताइए, हम क्या करें?”

छात्रों से शिकायत सुनकर, डा. शर्मा को आचार्य जी के प्रति मन में बड़ी वितृष्णा पैदा हुई। सोचने लगे कैसा व्यक्ति है - इंसानियत का नाम ही नहीं। स्वयं महाशय बच्चों को अनुशासन, समय की महत्ता, चरित्र निर्माण और वचनबद्धता का बड़ा बड़ा लेक्चर झाड़ते हैं - लेकिन स्वयं क्या करते हैं इन छात्रों के साथ? तीन दिन तक एक हस्ताक्षर देने के लिए, रोज छात्रों को 4-4 घन्टे इन्तजार करवाना, यानी प्रत्येक छात्र के तीन दिन में 12 घन्टे इस बराम्दे में सिर्फ यूँ ही बैठे-बैठे, और टहल करते बर्बाद हो जाते हैं! वाह क्या आदर्श है, क्या कर्त्तव्य निष्ठता है आचार्य जी की! वाह रे देश के भावी कर्णधारों के भाग्य निर्माता! डा. शर्मा को छात्रों से बड़ी सहानुभूति हुई। उन्होंने कहा- आप लोग चिन्ता न करें और अपनी कक्षाएँ बिल्कुल न छोड़ें। आज चाय के समय, मैं आचार्य जी से बात करके, आपके लिए उनसे कल का दिन निश्चित करता हूँ। फिलहाल आप सब जाएँ। कल आप ठीक 11.00 बजे यहाँ आ जाएँ। दो बजे सब चाय के लिए इकठ्ठे हुए तो डा. शर्मा ने छात्रों के व अपने कर्त्तव्य के प्रति आचार्य जी के गैर जिम्मेदाराना रवैये व विभाग में फालतू की भीड़ और शोरगुल का मुद्दा साथियों के सामने रखा। सभी ने एक स्वर से छात्रों को इस तरह तंग करने पर श्रीमान आचार्य की भर्त्सना की। प्रो. खासनवीस ने भी खाली पीरियड में डा. शर्मा के साथ आचार्य जी से इस मुद्दे पर बात करने का बीड़ा उठाया। बातें तो चाय पीते वक्त भी हो सकती थीं, पर आचार्य जी कभी भी चाय की बैठक में हाज़िर ही नहीं होते थे।

आज तो आचार्य जी 3.00 के बजाए 3.25 पर घर से विभाग में लौटे। प्रो. खासनवीस ने जैसे ही अपने कमरे की चिक से उन्हें आते देखा, वे तुरत-फुरत, शर्मा जी के साथ उनके कमरे में जा धमके। आचार्य जी का माथा ठनका किन्तु बड़ी विनम्रता से, मिश्री सी घोलते बोले - आइए, आइए, बैठिए।

जब कोई साथी प्रोफैसर छाती तानकर, तीखे तेवरों के साथ आचार्य जी के सामने जा खड़ा होता है, तो आचार्य जी अन्जाने भय से, घिघियाये स्वर में उसका स्वागत कर कुर्सी पर बैठन की मिन्नत सी करने लगते हैं। वे यूँ भी कभी किसी को जोर से आदेश नहीं देते। बस दूसरों पर मीठे-मीठे, दबे-दबे स्वर में घटिया बातों के झूठें आरोपों के वार परोक्ष रूप से किया करते हैं और फिर आरापों से आहत साथियों का तिलमिलाना देखकर मन में बड़े आनन्दित और सन्तुष्ट हुआ करते हैं। जब सामने बैठा व्यक्ति क्रोध में फुंकारता सा बोलता है तो माहौल गर्माते देख, वे स्वयं ही शान्ति दूत बनकर ठण्डी-ठण्डी बातों के छीटें मारने शुरू कर देते हैं। उनके शातिर शब्द कुछ इस तरह के होते हैं –

अच्छा, अच्छा, जो आप कह रहे हैं, मैं वहीं मानूँगा। मुझसे तो फलां व्यक्ति ने कहा तो,  मैंने तथ्य को आपके सामने रख दिया।

चालाकी से हर बार इस तरह की सफाई देने पर एक बार बेला उप्रेती ने ऐसा भिगोकर उन्हें जवाब दिया था कि उस दिन आचार्य महोदय खुद तिलमिलाकर रह गए थे। बेला तड़क कर बोली थी –

इसका मतलब तो यह हुआ कि आप अपने नहीं, दूसरों के कानों से सुनते हैं। जिसने जो कहा आपने अपने विभागीय साथियों के लिए रस ले-लेकर सुन लिया और फिर साथियों को सुनाकर, उन्हें जूता सा मार दिया, और जब हम उस झूठे आरोप की धज्जियाँ उड़ा देते हैं, तो आप हमारी बात स्वीकार करने का नाटक शुरू कर देते हैं। क्या आप देखते भी दूसरों की आँखों से हैं? आप में अपने विभागीय साथियों को स्वयं समझने की क्या लेशमात्र भी क्षमता नहीं है - या आप उन्हें समझकर, उन्हें जानकर भी, न जानने का नाटक करते हैं? यदि दूसरे विभाग के लोगों को हमारे बारे में आपसे अधिक पता है तो यह वैसे भी आपके लिए शर्मनाक बात है। क्योंकि आपके अनुसार, इस विभाग रूपी परिवार के आप संरक्षक है और इस परिवार के बारे में, इसके सदस्यों के बारे में आपको तिनका भर नहीं पता। उनके बारे में जानकारियाँ आपको दूर बैठे लोगों से प्राप्त होती हैं। वाह, क्या कूटनीति है!

उस दिन बेला के लम्बे समय से दबे गुबार का ऐसा विस्फोट हुआ कि आचार्य तो आचार्य, साथी प्रवक्ता भी उसे देखते रह गए। किन्तु सही और सटीक बातें कहने के लिए उन्हें अपनी साथी बेला पर बड़ा गर्व महसूस हुआ। आचार्य जी की स्थिति उस सर्प भाँति थी - जिस पर नेवला वार करता है तो फिर उसका अन्त करके ही छोड़ता है। वे अपनी इज़्ज़त बचाने के इरादे से ऐसे निरीह, ऐसे मायूस से हो गए कि यदि कोई बाहर का अतिथि व्यक्ति एकाएक आ जाता और उस दृश्य को देखता तो - बेला को वह बदतमीज़, बदज़ुबान समझता और आचार्य जी को महा सीधा सादा, सहनशील। जबकि वस्तुतः स्थिति एकदम विपरीत थी। निःसन्देह, आँखों देखी सदा सच नहीं होती। प्रोफैसर खासनवीस और डा. शर्मा ने हौले से कुर्सियाँ खींची और आचार्य जी से छात्रों के लिए बातचीत हेतु तैनात हो गए। आचार्य महाशय दोनों के तने चेहरे देखकर, मन ही मन सीधे हो चले थे। डा. शर्मा बोले - आचार्य जी, आज 10.00 बजे से छात्र आपकी प्रतीक्षा में भीड़ लगाए, शोरगुल करते बराम्दे में जमा थे। उनसे मैंने बातचीत की तो पता चला पिछले तीन दिन से 4-4 घन्टे सुबह शाम आपके हस्ताक्षर हेतु, वे अपनी क्लासेज छोड़ कर, आपकी बाट जोहते रहते हैं। बड़े नारज और खीझे हुए थे।

बोलने के लिए उतावले, खासनवीस बीच में दखल देते बोले - देखिए, आचार्य जी, आपसे यह कहते हमें अच्छा नहीं लगता, लेकिन विवश होकर कहना पड़ रहा है कि युवा शक्ति को इस तरह खिझाना एक तो वैसे भी ठीक नहीं, दूसरे उनकी शक्ति और क्षमता को इतने छोटे-छोटे कार्यों के लिए  इस बरबाद करना, नैतिक दृष्टि से देश की प्रगति में रोड़ा अटकाने जैसा ही है। विभाग का माहौल भीड़-भाड़ से बिगड़ता अलग है। सो, आप इस कार्य को कल निबटा दीजिए। यदि आप ठीक समझे तो हम आपको सहयोग दे सकते हैं। आचार्य जी सिर हिलाते, चश्में से गोल-गोल आँखें घुमाते बोले --अरे, नहीं-नहीं मैं अकेला ही बहुत हूँ, इस काम के लिए। ल हो जायेगा यह कार्य। हाँ, बाहर ीड़ लगनी भी ठीक नहीं है रोज-रोज। कल छात्र कितने बजे आयेंगे?”

“11.00 बजे” - डा. शर्मा बोले।                                   

ठीक है, कल मैं 10.30 पर आ जाऊँगा सुब्ह “- आचार्य जी कर्त्तव्यनिष्ठ बने से बोले।

अगले दिन आचार्य जी ठीक 10.30 पर विभाग में पहुँच गए,यह सोचकर कि कहीं बात तूल न पकड़ ले तथा प्रो. खासनवीस व शर्मा की जानकारी में आया यह मुद्दा उनकी छवि पर एक बदनुमा दाग न बन जाए। छात्र भी समय से आ गए और देखते ही देखते 11.30 तक काम निबट गया। छात्र एक-एक करके, आचार्य जी के कमरे से निकलते और पास ही कमरे में बैठे डा. शर्मा और प्रो.खासनवीस को धन्यवाद देकर चले जाते। आचार्य जी एक आँख से हस्ताक्षर करते तो, दूसरी आँख से टेढ़े-टेढ़े, जाने वाले छात्र को खासनवीस के कमरे की ओर मुड़ते  देख  कर मन ही मन  कुढ़ कर रह जाते।

गे - 1, 2



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